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अमरीका का वह निराला कवि

स्मरण

 

अमरीका का वह निराला कवि

भारत यायावर


चन्द्रबली सिंह अंग्रेजी के परम विद्वान होकर भी हिन्दी के साधक थे. वे रामविलास शर्मा के सानिध्य में काफी लम्बे समय तक आगरा के बलवंत राजपूत स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापन करते रहे. चन्द्रबली सिंह अपनी साइकिल की डंडी पर रामविलास जी को बैठाकर, गपशप करते हुए, महाविद्यालय आते-जाते थे. रामविलास शर्मा ने अपनी रामचन्द्र शुक्ल पर लिखी आलोचना पुस्तक को चन्द्रबली सिंह को अ-भूतपूर्व आलोचक कहकर समर्पित किया है. वे लम्बे-छरहरे थे. पान अधिक खाने से उनके दाँत काले पड़ गए थे, किन्तु उनकी वाणी में मिठास थी. जो भी उनके पास आता था, उनका हो जाता था. वे सरल और सहृदय थे. उन्हें लिखने से अधिक बतरस में आनंद आता था. मैं भी बहुत कम उम्र से ही उनसे मिलता रहा था और उनका मुरीद था. आज जब वे नहीं हैं, उन्हें याद करके दिल में एक टीस-सी उठती है.

वाल्ट ह्निटमन

उन्होंने जो आलोचनात्मक निबंध लिखे हैं, वे उनकी दो पुस्तकों में संकलित हैं- ‘लोकदृष्टि और हिन्दी साहित्य’ तथा ‘आलोचना का जनपद’. चूँकि वे अंग्रेजी कविता के मर्मज्ञ थे, छठे दशक में नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद किए थे, जो पुस्तकाकार ‘हाथ’ शीर्षक से छपा था. साहित्य अकादेमी से उनकी पाब्लो नेरूदा की कविताओं का एक संचयन प्रकाशित हुआ था. अपनी मृत्यु के पूर्व उन्होंने एमिली डिकिन्सन, वाल्ट ह्निटमन एवं बर्तोल्ट ब्रेख्त की कविताओं के अनुवाद किए थे, जो महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के सहयोगी से वाणी-प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है. खेद का विषय यह है कि वे इन किताबों को प्रकाशित रूप में नहीं देख पाए.

वाल्ट ह्निटमन अमरीका के राष्ट्रीय कवि हैं. वे कविता में मुक्तछंद के जन्मदाता हैं. ‘घास की पत्तियाँ’ उनकी अमर कृति है, जिसकी लोकप्रियता देश-देशान्तर में है. चन्द्रबली सिंह युवावस्था से ही उनकी कविताओं के मर्मज्ञ अध्येता रहे हैं. उन्होंने ह्निटमन की कविताओं का लन्मयता में डूबकर हिन्दी में रूपान्तर किया है. यह पुस्तक चन्द्रबली सिंह की उम्र भर की साधना का प्रतिफल है.

वाल्ट ह्निटमन अमरीका के पहले कवि थे, जिनकी ओर हिन्दी के साहित्यकारों का ध्यान गया था. मई, 1913 की ‘सरस्वती’ में पहली बार उनपर पूर्ण सिंह का निबंध ‘अमरीका का मस्तयोगी वाल्ट ह्निटमन’ छपा. इस निबंध में पूर्ण सिंह ने ह्निटमन के व्यक्तित्व का जीवंत शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है. इसकी कुछ पंक्तियाँ देखें- ”अमरीका के वन में नहीं, जीवन के अरण्य में यह कौन जा रहा है? यह प्रकृति का बंभोला है कौन ? यह वन का शहदौला है कौन ? यह इतना शरीफ़ ? अमीर होकर ऐसा रिन्द फ़कीर है कौन ? अमरीका के वही मूर्ख, तत्त्वहीन, मशीनरूपी नरक में यह जीता-जागता ब्रह्मज्ञानी रूपी स्वर्ग कौन है? इसकी उपस्थिति मात्रा से मनुष्य की आभ्यंतरिक अवस्था बदल जाती है. अमरीका की बहिर्मुख सभ्यता को लात मार कर, बिरादरी और बादशाह से बाग़ी होकर, कालीनों को जलाकर, महलों में आग लगाकर यह कौन जाड़ा मना रहा है? प्रभात की फेरी वाला, जंगल का जोगी, अमरीका का स्वतंत्रा और मस्त फ़कीर वाल्ट ह्निटमन अपनी काव्य-रचना करता हुआ जा रहा है. वह कोमल और ऊँचे, लम्बे और गहरे स्वरों में एक संदेशा देता जा रहा है. सभ्यता के नगरों से यह जोगी जितना दूर होता जाता है, उसका स्वर उतना ही गम्भीर होता जाता है. पूर्ण सिंह ने उनकी कुछ कविताओं के भी अनुवाद किए हैं -

”ओह! कैसे रचूँ आनन्दभरी, रसभरी, दिलभरी कविता
राग भरी, पुंसत्व भरी, स्त्राीत्व भरी, बालकत्व भरी,
संसार भरी, अन्न भरी, फल भरी, पुष्प भरी!

वाल्ट ह्निटमन की उपर्युक्त पंक्तियों में उनकी कविता का मर्म छुपा है, साथ ही अपनी कविता को जीवन से भरपूर बनाने की तड़प भी है.

जून, 1920 में महावीरप्रसाद द्विवेदी ने वाल्ट ह्निटमन पर ‘सरस्वती’ में एक जोरदार लेख लिखा. वे लिखते हैं- ”वह प्रजापक्ष का कवि कहा जाता है, क्योंकि उसने जन-साधारण के हृदयगत भावों को अच्छी तरह व्यक्त किया है. उसने न तो किसी का अनुकरण किया है और न स्वयं कोई नियम बनाने की परवाह की है. उसके विचार विचित्र हैं और उसकी शैली विलक्षण है. चाहे कोई उन विचारों से सहमत हो, चाहे न हो, पर इसमें संदेह नहीं कि वह वाल्ट ह्निटमन की कृति का आदर अवश्य करेगा. वाल्ट ह्निटमन की उच्छृंखलता का प्रमाण हमें उसकी कृति में खूब मिलता है.

उसका कहना है कि कविता-कामिनी से शब्दों का भार वहन कराकर उसे हंसगामिनी मत बनाओ. उसे अपनी स्वाभाविक गति से स्वच्छंदतापूर्वक चलने दो, साहित्याकाश में उसे निर्बंध पक्षी की तरह उड़ने दो, भाव-सिन्धु में उसे मछली की तरह तैरने दो. उपमा आदि अलंकारों की कोई जरूरत नहीं. उसका प्राकृतिक सौंदर्य इन अलंकारों से नष्ट हो जाता है. कविता में न तो तर्क से काम लो और न विवाद से. उसमें तुम रहो, तुम्हारा प्रतिबिम्ब न रहे. उसमें प्रकृति रहे, प्रकृति की छाया न रहे.“
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