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रेणु का भूत

स्मरण

 

रेणु का भूत

भारत यायावर

फणीश्वर नाथ रेणु


रेणु के देहावसान के बाद उनके साथ होने का अवसर मुझे मिला और धीरे-धीरे मैं इस तरह रेणु-मय होता चला गया कि बरसों मुझे यह होश नहीं रहा कि मैं रेणु से परे या अलग हूँ. कोई ऐसा दिन नहीं, जब रेणु की चर्चा न करता. भूत-प्रेतों पर अविश्वास करनेवाले, जिनमें मैं भी हूँ- विश्वास अवश्य करेंगे! रेणु का प्रेत जो मुझ पर सवार हुआ, अब तक जमा है. उतरने का नाम ही नहीं लेता. मैंने बार-बार कोशिश की पर यह असंभव लगा. मेरे मित्रों ने, शुभ-चिंतकों ने बार-बार समझाया- रेणु के भूत से पीछा छुड़ाओ और अपना कोई मौलिक रचनात्मक लेखन करो! रेणु के पीछे पागल मत बनो. मेरे निंदकों ने मुझ पर रेणु को लेकर तरह-तरह के इलजाम लगाये, परेशान किया. मैंने रेणु के प्रेत से बस इतना ही कहा, ज्यादा कहते नहीं बना- ‘तुम्हारे लिए, मैंने लाखों के बोल सहे’.

यही बात रेणु ने अपने प्रथम कहानियों के संग्रह ‘ठुमरी’ के समर्पण में लिखी है, और यही बात मैंने रेणु के प्रेत से कही. वह ठठाकर हंसा और बोला - जिससे प्रेम करोगे और प्रेम ऐसा, जिसमें तन-मन-धन सब अर्पित तो लाखों के बोल तो सुनने ही पड़ेंगे. और सच कहूँ, जो यह मेरी छवि बन गयी है- ‘रेणु के खोजी भारत यायावर’ उससे स्वयं को विलग करना अब इस जीवन में असंभव है. कुछ और होने की लालसा भी नहीं, फिर भी यहाँ रेणु के विषय में जो भी कह रहा हूँ, उनके प्रेत से थोड़ी देर के लिए मुक्त होकर.

जैसा कि रेणु को जानने वाले सभी जानते हैं, रेणु का जन्म पूर्णिया जनपद के औराही-हिंगना ग्राम में 4 मार्च, 1921 को हुआ. उस वक्त पूर्णिया को बिहार का कालापानी कहा जाता था. कोशी कवलित भूमि- जहाँ के लोग एक तरफ बाढ़ और अकाल जैसी विपदाओं से हर वर्ष जूझते, दूसरी ओर हैजा, मलेरिया, प्लेग, काला आजार जैसी बीमारियों से आक्रांत होते. अस्तित्वरक्षण की इन विषम परिस्थितियों ने उनमें जीवटता, संघर्षशीलता और अदम्य जिजीविषा का संचार किया. मिथिला और बंगला की संयुक्त संस्कृति ने विषम परिस्थितियों में भी उन्हें हंसने, मुस्कुराने और गाते रहने को उत्प्रेरित किया. रेणु के रचनाकार-मन का निर्माण इसी लोक-भूमि में हुआ था.

उनके पिता शिलानाथ मंडल कांग्रेस से जुड़े थे. असहयोग आंदोलन से जुड़े स्थानीय नेताओं का आना और ठहरना उनके घर में होता. पूर्णिया क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना पैदा करनेवाले और रेणु के गुरु रामदेनी तिवारी ‘द्विजदेनी’ उनके घर आते, रेणु से हिन्दी और बंगला रामायण का सस्वर पाठ सुनते. इन्होंने उसी समय घोषणा कर दी थी- यह बालक विलक्षण प्रतिभा का निकलेगा और इस दलित-पिछड़ी भूमि का गौरव बनेगा.

शिलानाथ मंडल राजनीति के साथ ही साहित्य में भी गहरी रुचि रखते थे. वे उस समय की महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें मंगवाते. सरस्वती, सुधा, माधुरी, चांद, हिंदूपंच, वेंकटेश्वर समाचार, विशाल भारत आदि पत्रिकाएँ नियमित उनके घर आतीं. रेणु जब दस-बारह वर्ष के थे, तभी से वे नियमित इन पत्रिकाओं को पढ़ते. कविता करने की शुरुआत भी यही से हुई. ‘द्विजदेनी’ जी ने उनके घरौवा नाम ‘रिनुवा’ को परिवर्तित कर ‘रेणु’ कर दिया था. रेणु ने तुकबंदियाँ करनी शुरू की- ‘कवि रेणु कहे, कब रैन कटे, तमतोम हटे ....’ सिमरबनी स्कूल से निकलनेवाली पत्रिका ‘खंगार सेवक’ में उनकी कविताएँ 1932 से ही प्रकाशित होने लगीं. उस समय की एक महत्वपूर्ण घटना, जिससे उनकी ख्याति उनके पूरे इलाके में फैल गयीं, रेणु की जुबानी ही बयान कर रहा हूँ-

यह घटना सन् 1931-32 की है, मेरी उम्र जब दस वर्ष के लगभग रही होगी और मैं फारबिसगंज हाई स्कूल का विद्यार्थी था. वहीं हॉस्टल में रहता और सप्ताह में छुट्टी के दिन गाँव आ जाता. फारबिसगंज से एक स्टेशन सिमराहा. वहाँ गाड़ी से उतरकर पांव-पैदल औराही-हिंगना, यानी अपने गांव! पिताजी किसान थे और इलाके के स्वराज्य-आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता. खादी पहनते थे, घर में चर्खा चलता था. ‘तिलक स्वराज्य-फंड’ वसूलते थे और दुनिया-भर की पत्र-पत्रिकाएँ मंगाया करते थे.

एक दिन अचानक ही थाने के दारोगा-पुलिस को अपने दरवाजे पर उपस्थित पाकर हमलोग ‘अचरज’ में पड़ गये, मैं भी फारबिसगंज से गाँव आया हुआ था और उन दिनों किसी गाँव में दारोगा-पुलिस का पहुंचने का मतलब होता था पूरे गांव के लोगों का ‘अंडर-ग्राउंड’ हो जाना, यानी लोग अपने-अपने घरों के दरवाजे भीतर से बंद कर छिप जाते थे- पता नहीं किसे बांधकर दारोगा-पुलिस चालान कर दे.

दारोगा दरवाजे पर आकर सीधे पिताजी के सामने रुके और बोले- हमें खबर मिली है कि आपके पास ‘चांद’ का ‘फांसी अंक’ आया है. आप उसे तुरंत मेरे हवाले कर दो, नहीं तो बेकार में हमरा के खानातलासी करे के पड़ी.

पिताजी घबराये नहीं, बड़ी ही निश्चिंतता के साथ ही उन्होंने कहा- आया तो था जरूर! और ‘चांद’ का फांसी अंक ही क्यों, ‘हिंदू पंच’ का बलिदान अंक तथा ‘भारत में अंग्रेजी राज’ पुस्तक भी मेरे पास थी. कोई कुटुंब-संबंधी पढ़ने को ले गये हैं. आप खानातलाशी ले लीजिए.

पिताजी साफ झूठ बोल गये. मैं वहीं खड़ा था. पिताजी को इस तरह झूठ बोलते कभी नहीं देखा था, लेकिन मुझे समझते देर नहीं लगी कि वे क्यों झूठ बोल रहे हैं. उपरोक्त पत्रिकाओं के अंक और ‘भारत में अंग्रेजीराज’ नाम की पुस्तक एक झोले में लपेटकर उनके बिछावन के सिरहाने रखी है, इस बात की जानकारी मुझे थी, पिताजी ने फिर से अपने वाक्य दुहराये- ‘चांद’ के फांसी अंक के अलावा अन्य पत्रिका-पुस्तक की जानकारी आप लोगों को मैंने इसलिए दे दी कि आज-न-कल आपको फिर खबर मिलेगी कि वह सब भी मेरे यहाँ आया है और आपको नाहक दौड़ना पड़ेगा. चलकर खानातलाशी ले लीजिए.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anant [infinitivecreation@gmail.com] Patna - 2012-07-20 11:55:04

 
  रेणु के जीवन का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत किया है, दरअसल सर ने रेणु क जीवन को समझने मे अपना जीवन लगा दिया है, इसलिए रेणु का भूत वो लिख पाए. 
   
 

nirala [niralabidesia@gmail.com] patna - 2012-07-13 19:06:45

 
  रेणु के बारे में इतनी सारी नई जानकारियां एक साथ दी है यायावर जी ने. उनका ये कहना कि वह रेणु में ही रहते हैं, 100 प्रतिशत सही है. 
   
 

shashi shekhar [jagransports@gmail.com] bhopal, mp - 2012-06-25 14:42:31

 
  इस आलेख को पढने के बाद जो कुछ रेणु जी के बारे में पता नहीं वो जान पाया। वैसे किताबों और उनके जानने वालों से बहुत कुछ सुन चुका हूं। लेकिन उनके बारे में जितनी जानकारी मिलती मन में और जानने की इच्‍छा पैदा होती है। इस आलेख को उपलब्‍घ करवाने के लिए धन्‍यवाद।  
   
 

ramlila rawani [ramlilarawani@gmail.com] ranchi - 2012-06-08 06:44:14

 
  रेणु हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकार हैं. इन्होंने प्रेमचंद की कहानियों का विस्तार दिया है. जो डान कोशी पढ़ने में स्पष्ट होती है. आंचलिकता का ठप्पा लगा इसे कम नहीं किया जा सकता. भारत यायावर जी की हिंदी साहित्य में रेणु को प्रतिष्ठित करने में महती भूमिका है. सच है कि इन पर रेणु का भूत सवार है. 
   
 

दीपक मिश्र [kolsyd@gmail.com] चंडीगढ़ - 2012-05-30 09:44:07

 
  प्रेमचंद के बाद रेणु हिंदी साहित्य के सबसे बड़े हस्ताक्षर हैं - अपनी अप्रतिम शैली , भाषा , तेवर , जमीनी पृष्ठभूमि और एक विलक्षण \"अन्चालिकला \" को लिए हुए | और हिंदी में उनको , उनका स्थान दिलाने मैं भारत यायावर जी की बेमिशाल भूमिका रही है | रेणु के साथ और उनके बाद , उनके बिखरे साहित्य को एक सूत्र में पिरोने और रेणु रचनावली को सामने लेन मैं भारत जी का जो अवदान रहा है - हिंदी साहित्य उससे कर्ज मुक्त नहीं हो सकता | 
   
 

murari singh [murarihzb@gmail.com] hazaribag - 2012-05-29 08:31:36

 
  रेनू के बचपन से जुड़े प्रसंगों को बड़े ही रोचकता के साथ प्रस्तुत किया गया है. इस लेख में कई तथ्य ऐसे हैं जो अन्यत्र अनुपलब्ध हैं. खासकर रेणुजी की अंग्रेजी और हिंदी मिलकर की गई तुकबंदी को पढ़कर उनकी चुहलबाजी का भान हुआ. पुलिस की लाठी मर खाने बे बाद भी न टूटना, इस तथ्य को नहीं जनता था. रेनू को जानने की इक्छा रखनेवालों के लिए लेख बड़ा महत्वपूर्ण है. लेख के बाबत कहूं तो रेनू को समझने के लिए यह लेख कंप्यूटर के mouse की तरह है. जिधर क्लिक करो और वंचित जानकारी हासिल करो. रेनू को और जानने के ललक बूढी है. साधुवाद....  
   
 

श्‍यामबिहारी श्‍यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] सी. 27 / 156, जगतगंज, वाराणसी (उप्र), भारत - 2012-05-25 01:25:44

 
  वाह... हिन्‍दी के सिरमौर कथाशिल्‍पी फणीश्‍वरनाथ रेणु के व्‍यक्तित्‍व और उनके मन-मिजाज को चि‍त्रित करती अद्भुत सामग्री। इसका सर्वाधिक तृप्तिकर हिस्‍सा तो वह अंतिम भाग है जिसमें प्रश्‍न और उत्‍तर के रूप में रेणु जी मुखातिब हैं। शैली रोचक और प्रशंसनीय। लेखक भारत यायावर को बधाई तथा उपलब्‍ध कराने के लिए \'रविवार\' का हार्दिक आभार...  
   
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