भगवत रावत की तीन कवितायें
स्मरण
भगवत रावत की तीन कवितायें
इतनी बड़ी मृत्यु
आजकल हर कोई, कहीं न कहीं जाने लगा है
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1939 - 2012 |
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भगवत रावत नहीं रहे. 25 मई 2012 को भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली. यहां हम उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये उनकी तीन कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं. |
हर एक को पकड़ना है चुपके से कोई ट्रेन
किसी को न हो कानों कान ख़बर
इस तरह पहुँचना है वहीं उड़कर
अकेले ही अकेले होता है अख़बार की ख़बर में
कि सूची में पहुँचना है, नीचे से सबसे ऊपर
किसी मैदान में घुड़दौड़ का होना है
पहला और आख़िरी सवार
इतनी अजीब घड़ी हैं
हर एक को कहीं न कहीं जाने की हड़बड़ी है
कोई कहीं से आ नहीं रहा
रोते हुए बच्चे तक के लिए रुक कर
कहीं कोई कुछ गा नहीं रहा
यह केवल एक दृश्य भर नहीं है
बुझकर, फेंका गया ऐसा जाल है
जिसमें हर एक दूसरे पर सवार
एक दूसरे का शिकार है
काट दिए गए हैं सबके पाँव
स्मृति भर में बचे हैं जैसे अपने घर
अपने गाँव,
ऐसी भागमभाग
कि इतनी तेज़ी से भागती दिखाई दी नहीं कभी उम्र
उम्र के आगे-आगे सब कुछ पीछे छूटते जाने का
भय भाग रहा है
जिनके साथ-साथ जीना-मरना था
हँस बोलकर जिनके साथ सार्थक होना था
उनसे मिलना मुहाल
संसार का ऐसा हाल तो पहले कभी नहीं हुआ
कि कोई किसी को
हाल चाल तक बतलाता नहीं
जिसे देखो वही मन ही मन कुछ बड़बड़ा रहा है
जिसे देखो वही
बेशर्मी से अपना झंडा फहराए जा रहा है
चेहरों पर जीवन की हँसी कही दिख नहीं रहीं
इतनी बड़ी मृत्यु
कोई रोता दिख नहीं रहा
कोई किसी को बतला नहीं पा रहा
आखिर
वह कहाँ जा रहा है।
मेधा पाटकर
करुणा और मनुष्यता की ज़मीन के
जिस टुकड़े पर तुम आज़ भी अपने पांव जमाए
खड़ी हुई हो अविचलित
वह तो कब का डूब में आ चुका है
मेधा पाटकर
रंगे सियारों की प्रचलित पुरानी कहानी में
कभी न कभी पकड़ा जरूर जाता था
रंगा सियार
पर अब बदली हुई पटकथा में
उसी की होती है जीत
उसी का होता है जय-जयकार
मेधा पाटकर
तुम अंततः जिसे बचाना चाहती हो
जीवन दे कर भी जिसे ज़िंदा रखना चाहती हो
तुम भी तो जानती हो कि वह न्याय
कब का दोमुंही भाषा की बलि चढ़ चुका है
मेधा पाटकर
हमने देखे हैं जश्न मनाते अपराधी चेहरे
देखा है नरसंहारी चेहरों को अपनी क्रूरता पर
गर्व से खिलखिलाते
पर हार के कगार पर
एक और लड़ाई लड़ने की उम्मीद में
बुद्ध की तरह शांत भाव से मुस्कुराते हुए
सिर्फ़ तुम्हें देखा है
मेधा पाटकर
तुम्हारे तप का मज़ाक उड़ाने वाले
आदमखोर चेहरों से अश्लीलता की बू आती है
तुम देखना उन्हें तो नर्मदा भी
कभी माफ़ नहीं करेगी
मेधा पाटकर
ऐसी भी जिद क्या
अपने बारे में भी सोचो
अधेड़ हो चुकी हो बहुत धूप सही
अब जाओ किसी वातानुकूलित कमरे की
किसी ऊंची-सी कुर्सी पर बैठ कर आराम करो
मेधा पाटकर
सारी दुनिया को वैश्विक गांव बनाने की फ़िराक में
बड़ी-बड़ी कंपनियां
तुम्हें शो-केस में सजाकर रखने के लिए
कबसे मुंह बाये बैठी हैं तुम्हारे इंतज़ार में
कुछ उनकी भी सुनो
मेधा पाटकर
खोखले साबित हुए हमारे सारे शब्द
झूठी निकलीं हमारी सारी प्रतिबद्धताएं
तमाशबीनों की तरह हम दूर खड़े-खड़े
गाते रहे दुनिया बदलने के
नकली गीत
तुम्हें छोड़कर
हम सबके सिर झुके हुए हैं
मेधा पाटकर ।
हमने उनके घर देखे
हमने उनके घर देखे
घर के भीतर घर देखे
घर के भी तलघर देखे
हमने उनके
डर देखे।
25.05.2012, 11.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित