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एडवर्टोरियल: छत्तीसगढ़

एडवर्टोरियल: छत्तीसगढ़

 

सहकारिता से साकार होता समृद्धि का सपना

डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़


सहकारिता आधुनिक समाज में आम जनता की रचनात्मक संगठन शक्ति का पर्याय बन गयी है। भारत में भी किसानों, श्रमिकों और आम नागरिकों के जीवन में बेहतर बदलाव के लिए सहकारिता आंदोलन की भूमिका और उपयोगिता लगातार बढ़ती जा रही है। सहकारिता आंदोलन 'एक सबके लिए और सब एक के लिए' और 'बिन सहकार नहीं उध्दार' की भावना पर आधारित है। यह मानव जीवन में तरक्की और खुशहाली लाने के लिए जनता की सामूहिक शक्ति का प्रतीक है।

छत्तीसगढ़ में इस रचनात्मक आंदोलन की एक ऐतिहासिक और समृध्द परम्परा है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए लाखों और गरीबों और जरूरतमंद परिवारों को सस्ते अनाज की आपूर्ति, किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब मूल्य दिलाने के लिए समर्थन मूल्य नीति के तहत धान खरीदी की पारदर्शी व्यवस्था और वनवासियों को अतिरिक्त आमदनी तथा मौसमी रोजगार का बेहतर माध्यम दिलाने में छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है। प्रदेश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को आज अगर राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श प्रणाली के रूप में पहचान और प्रशंसा मिल रही है, सर्वोच्च न्यायालय और योजना आयोग भी छत्तीसगढ़ की इस वितरण व्यवस्था तारीफ कर रहे हैं, तो इसका श्रेय भी सहकारी समितियों को दिया जाना चाहिए। किसानों का एक-एक दाना धान समर्थन मूल्य पर खरीदने वाला छत्तीसगढ़ का देश का इकलौता राज्य है। कृषि, मछली पालन, डेयरी, लघु वनोपज संग्रहण, गृह निर्माण, हाथ करघा उद्योग आदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रदेश में सात हजार 508 सहकारी समितियां पंजीकृत हैं, जिनके माध्यम से लोगों के जीवन और समाज में समृध्दि का सपना तेजी साकार होता जा रहा है।

सहकारिता आंदोलन आज हमारे छत्तीसगढ़ में किसानों के जीवन में खुशहाली का एक महत्वपूर्ण जरिया बन गया है। हमारे यहां सहकारिता की जड़ें बहुत गहरी हैं। प्रदेश में इसका एक गौरवशाली इतिहास है। मुझे विगत 24 अक्टूबर 2011 को जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक दुर्ग के शताब्दी समारोह में शामिल होने का अवसर मिला। जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रायपुर की स्थापना के एक सौ वर्ष जनवरी 2013 में पूर्ण होने जा रहे हैं। इस बैंक का शताब्दी समारोह प्रारंभ हो चुका है। दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1912 के आस-पास छत्तीसगढ़ में किसानों की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय हो गयी थी। प्रसिध्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित वामन बलिराम लाखे ने उन दिनों किसानों को सस्ते ब्याज पर ऋण दिलाने के लिए रायपुर में प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर इस पर विचार विमर्श किया और सहकारी बैंक स्थापना का प्रस्ताव रखा।

लाखे जी के सुझाव को सबने स्वीकारा और दो जनवरी 1913 को इस बैंक का पंजीयन हुआ, जिसके प्रथम अध्यक्ष राय साहब जे.एल.सरकार हुए। बैंक के संचालक मंडल की पहली बैठक चार मई 1913 को हुई। पहले ही वर्ष में इस बैंक के अन्तर्गत 72 सहकारी समितियों का गठन किया गया, जिनकी सदस्य संख्या एक हजार से कुछ अधिक थी। उन्हें उस जमाने में 27 हजार रूपए का ऋण दिया गया। उन दिनों इस बैंक की कुल कार्यशील पूंजी 43 हजार 735 रूपए थी। आज की स्थिति में इस बैंक में सदस्य किसानों की संख्या चार लाख से अधिक और कार्यशील पूंजी बढ़कर एक हजार 669 करोड़ रूपए तक पहुंच गयी है। जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रायपुर की बुनियाद रखने वालों में स्वर्गीय श्री वामन बलिराम लाखे अग्रणी थे, जिनकी प्रतिमा का अनावरण इस बैंक के परिसर में बीस जनवरी 1951 को देश के महान स्वतंत्रता सेनानी राजर्षि पुरूषोत्तम टंडन द्वारा किया गया। तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री बृजलाल वर्मा तथा अन्य अनेक जाने-माने समाज सेवियों का नाम सम्पूर्ण गरिमा के साथ इस बैंक से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने में दुर्ग और रायपुर के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों ने एक ऐसा इतिहास और कीर्तिमान बनाया है, जिस पर हम सबको गर्व है।

स्वर्गीय श्री वामन राव लाखे और त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसी महान विभूतियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ सहकारिता की भावना को भी जन-जन तक पहुंचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। सहकारिता आंदोलन छत्तीसगढ़ में भी आम जनता के लिए कल्याणकारी साबित हुआ है। राज्य में सहकारी समितियों के माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उचित मूल्य दुकानों के संचालन और किसानों से समर्थन मूल्य नीति के तहत धान और मक्का खरीदी का कार्य सुव्यवस्थित रूप से किया जा रहा है। प्रदेश के किसानों को खेती के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से मात्र तीन प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण सुविधा दी जा रही है।

सहकारिता के माध्यम से छत्तीसगढ़ में किसानों को खेती के लिए सस्ते ब्याज पर ऋण सुविधा देने का उल्लेखनीय कार्य प्रदेश सरकार ने किया है। राज्य निर्माण के समय वर्ष 2000-01 में हमारे यहां जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों के माध्यम से किसानों को दिए जाने वाले ऋणों पर वार्षिक ब्याज की दरें तेरह से पन्द्रह प्रतिशत तक हुआ करती थी। वर्ष 2003-04 तक इसी भारी भरकम ब्याज दर पर किसानों को ऋण लेना पड़ता था। दिसम्बर 2003 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के प्रथम आम चुनाव के बाद राज्य की पहली निर्वाचित सरकार ने कार्यभार संभाला तब इस पर गंभीरता से विचार मंथन हुआ। प्रथम निर्वाचित सरकार ने प्रदेश के किसानों के व्यापक हित में वित्तीय वर्ष 2004-05 में कृषि ऋणों पर ब्याज की दर घटाकर नौ प्रतिशत कर दी। इसके बाद वर्ष 2006-07 में इसे और कम करते हुए सात प्रतिशत, वर्ष 2007-08 में छह प्रतिशत और वर्ष 2008-09 से अब तक हम लगातार अपने मेहनतकश किसानों को मात्र तीन प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर खेती के लिए ऋण सुविधा दे रहे हैं।
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