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कल्लोल चक्रवर्ती की चार कविताएं

साहित्य

 

कल्लोल चक्रवर्ती की चार कविताएं


गीतफरोश

कल्लोल चक्रवर्ती


सुरेश झा ‘निराला’ महज पच्चीस पैसे में बेचते थे अपने गीत
उनमें अपने गीतकार होने का गुमान नहीं था।
वे जिस इलाके में पैदा हुए,
वहां कला की वैसी कद्र नहीं थी
शायद आज भी नहीं है।
इसीलिए स्टेशनों पर खुद अपने ही गीतों को
गा-गाकर बेचते देखा जाता था उन्हें।

उनमें भाषा का भदेस था
छिपाए नहीं छिपती थी तुकबंदी की कोशिशें
उन्हें अमर नहीं होना था
यह इच्छा नहीं थी कि मरने के बाद
साहित्य की पोथियों में उनका नाम रहे।
गला अच्छा था, तुकबंदी आती थी
जिससे मिल जाता था कुछ पैसा।

आज सुरेश झा ‘निराला’ नहीं हैं
जब नवगछिया और खरीक स्टेशनों पर रुकती है गाड़ी
केवल पुराने लोगों को अचानक याद आती है उनकी
वे देखते हैं इधर-उधर
अब भी कहीं दिख जाएं जर्जर धोती में
पान चबाते सुरेश झा ‘निराला’
नए लोगों को क्या पता कि
यशाकांक्षा से विरत एक ऐसा कवि भी था
जिसने ‘जनता का धन सेठ निचोड़े जैसे पक्का आम’
जैसी पंक्तियां लिखी थीं
और जो अपने विफल एकांत में एक दिन गुम हुआ।

भात

भात के देस से आई वह लड़की
सपने देखती है भात के।

उसके बदरंग टीन के बक्से में
छोटे भाई के अन्नप्राशन की एक तसवीर है कुछ-कुछ बदरंग हो चुकी
दूसरे क्लास की उसकी एक कॉपी जो जगह-जगह से फट चुकी है
अब पता और मोबाइल नंबर लिखने के काम आती है
मां की एक साड़ी है वर्षों पुरानी
जिसे खोलते ही फैल जाती है सीलन भरी पुरानी गंध
और स्मृतियों में लौट आता है सुंदरबन
इसके अलावा उस बक्से में
कई घरों से छिपाकर उठाए गए कुछ सामान हैं
जैसे एक लेडीज रिस्ट वॉच, बिंदी की कई पत्तियां, लेडीज रूमान
लिपस्टिक और पेपर नैपकिन।

जिस देस में वह आई है
वहां दोपहर में बिलकुल नहीं आती भात पकने की गंध
न ही यहां भात पैमाना है लोगों की अमीरी मापने का
बड़ी-बड़ी कोठियों में महीनों तक नहीं पकता भात
बाघ और पानी का तो यहां आतंक ही नहीं है।
उसे आश्चर्य होता है कि उसके दादा यहीं क्यों नहीं आकर बस गए थे
तब दादी और पिता को नहीं होना पड़ता बाघ का शिकार
न ही मां के गाल पर बाघ के पंजे का वह अमिट दाग होता।
अगर पिता जिंदा होते तो पेट के लिए हजारों किलोमीटर दूर
ऐसे देस में वह आती ही क्यों
जहां भात के लिए तरस जाती है वह।
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