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आना पलामू

कहानी

 

आना पलामू

श्याम बिहारी श्यामल

मैंने कागज-कलम को समेटते हुए एक तरफ किया. उठने को हुआ तो पांव झिनझिनाहट से झन्ना उठे थे. एक पल के लिए तो ऐसा लगा जैसे खड़ा ही नहीं हो सकूंगा. धीरे-धीरे संभलकर उठा. बायां पांव फर्श पर रखना कष्टप्रद. जैसे इसमें जान ही नहीं बची हो! पांव को आहिस्ता- आहिस्ता हरकत में लाने का क्रम शुरू किया. कुछ अंतराल के बाद रक्तसंचार सामान्य हो सका. घड़ी पर नजर डाली तो चार बजकर बारह मिनट हो रहे थे. लिखने का काम पांच घंटे से भी ज्यादा चला था. यानी पूरी रात. ऐसे में पांव भला क्यों नहीं सुन्न होते! मुझे अपनी लापरवाही पर थोड़ा खेद हुआ लेकिन दूसरे ही क्षण यह गहन संतोष भी कि यात्रा के दौरान होटल के इस कमरे में एक ही बैठक में इतना लंबा काम कर सका.

आना पलामू

खिड़की के पास आकर हिलते झिल्लीदार परदे को हटाकर पल्ला खोला. फटता हुआ अंधेरा और उसे रौंदती भोर की हवा. बाहर का पुराना परिचित इलाका एकबारगी नया-नया- सा लगा. मैंने दूर-दूर तक टिमटिमाती रोशनियों के बीच अपनी जानी-पहचानी जगहें टटोलनी शुरू की. उधर निचले इलाके में विद्या भाई का प्रतिमान प्रेस होगा, इधर आगे टैगोर हिल और उस तरफ रांची रेडियो स्टेशन व बस स्टैण्ड! कहां पहले शुद्ध कस्बा लगने वाला यह इलाका और अब कहां दिल्ली के करोलबाग जैसी इसकी यह नई लूक! यह सचमुच ऐसा हो भी गया है या मेरा कोई भ्रम है! कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा यह अहसास दशक भर बाद इस क्षे़त्र को थोड़ा और विकसित रूप में देखने के कारण हो या अलग झारखंड राज्य की राजधानी के रूप में इससे पहली बार मुखातिब होने के किसी जाने-अनजाने मनावैज्ञानिक दबाव के चलते! मैं कुछ तय नहीं कर सका.

इच्छा हुई कि बाहर निकलकर मार्निंग वाक जैसा कुछ कर लिया जाये. छोटा-सा पुराना होटल, कोई तामझाम नहीं. गेट पर ही सोया बूढ़ा नाइट गार्ड एक आवाज में उठ बैठा. गेट खोलते हुए घर के बुजुर्ग की तरह हिदायती अंदाज में बुदबुदाया- अभी सबेर नहीं हुआ है, अंधरिया में कहां टहलने जायेंगे? ...अच्छा, ठीक है स्टैण्ड तरफ चले जाइये, उधर कोई दिक्कत नहीं है!

कमरे में था तो जगह का नाम याद नहीं आ रहा था. करीब पहुंचा तो जुबान पर एकबारगी रेंग गया- रातू रोड बस स्टैण्ड. सड़क पर ही दूर से दो-तीन बसें खड़ी दिखीं. एक स्टार्ट थी. खलासी चिल्ला रहा था- कुड़ू, मांडर, चंदवा, लातेहार, डाल्टनगंज! जल्दी... जल्दी... जल्दी आइये! आइये... आइये... आइये! साढ़े चार का टैम है!

अपने बचपन-कैशोर्य व किसी हद तक युवा काल के दिनों की थाती यादों से जुड़े स्थानों के नाम इस तरह सुनना गजब प्रीतिकर लगा. मन तृप्त हो गया. जैसे कोई पुराना भूला-बिसरा प्यारा स्वाद अचानक जीभ पर उतर आया हो! खिंचाव, प्रगाढ़ता व जुदाई के भावों से छलछलायी भावुकता की अजीब मिली-जुली तरल अनुभूति हृदय में छलछलाने लगी. खाली-खाली रातू रोड पर चलते हुए पांव जैसे नर्म-कोमल स्मृतियों की हरी दूब पर पड़ रहे थे.

स्टैण्ड के गेट के कोने में एक गुमटी दिखी. चिनगारी फेंकता सुलगता चूल्हा, उठता धुंआ. आसपास खड़े दो- चार लोग. चाय की केतली व कांच के ग्लासों के रखने-उठाने की पहचानी-सी खन्-खन् ध्वनियां. करीब पहुंचते हुए लगा जैसे युगों-युगों से अपनी ही जुदा जड़ों की ओर लौट रहा हूं! यहां चप्पे-चप्पे पर बिछी टिमटिमाती यादें अचानक एकबारगी जैसे आंखों के सामने आकर साकार रेंगने लग गयी हों! कॉलेजी दिनों की कितनी ही कहकहों-भरी शामें और विचार-घर्षणों की कितनी ही पैदल टहलती अधमुंदी सुबहें. एक लम्बा बीता कालखण्ड जैसे औचक सामने आकर खड़ा मुस्कुरा रहा हो! रोम-रोम पर रेंगती स्मृतियां.

करीब पहुंचते ही दुकानदार ने लप-से गि‍लास यों पकड़ा दिया गोया आने से पहले चाय निकालकर मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा हो. स्टैण्ड के परिसर में अंधेरे में बसें कतार से खड़ी दिखीं. उनका समय संभवतः बाद में हो, उनके आसपास कोई चहल-पहल नहीं. एक कम क्षमता का बल्ब अपर्याप्त रोशनी से अपना दायित्व ढोता दिखा. इतने बड़े स्टैण्ड को इस एक कमजोर बल्ब के भरोसे किस हिसाब से छोड़ा गया है!

पहली ही चुस्की ली थी कि लगा, कोई निकट चला आ रहा है. सचमुच एक सज्जान, मुझी से मुखातिब होते-से. चेहरा गमछा से ढंका, हाथ में भारी-सा कोई सामान. वे चेहरा उघारते हुए सामने होकर करीब आ गये. मुझे चुपचाप गौर से घूरते हुए. मैं सिहर गया, लेकिन नीम अंधेरे में चेहरा पहचाना-सा लगा. यानी यह व्यक्ति अपना ही कोई पुराना परिचित मित्र-बंधु है! तब तक एक जमाने से गुम चिरपरिचित आवाज गूंजी- ''...के हो... हरिकिशोर? तूंऽ ? इहांऽ ? कहां सेऽ ? ''

आवाज से मैंने भी तुरंत उसे पहचान लिया. तो, यह अवधकिशोर है! उसके बारे में हाल के दिनों की जानकारी का स्मरण होते मैं पल भर के लिए एकबारगी सहम-सा गया. तो क्या उसके बारे में जो कुछ सुना गया है, वह सब सही भी हो सकता है! इस लिहाज से नजर डालने पर उसका बेतरतीब दाढ़ी से भरा कठोर चेहरा, भारी आवाज, बरसाती गरमी में भी गमछे से चेहरा ढंकने जैसा अंदाज... सब संदिग्ध लगा. इसका मतलब कि उसके बारे में सुनी बातें हवा-हवाई नहीं हैं! अब क्या किया जाये! कहीं इसके साथ यह मुलाकात परेशानी का कोई सबब न बन जाये!

''..काऽ हो, हमरा नाऽ पहिचानलऽ काऽ? '' मन में आ रहे ऐसे सारे भाव उसकी एक ही हांक पर हवा हो गये.

'' ...कौन! तुम अवध हो न? '' मैं संभला.

वह अपना नाम सुन थोड़ा असहज हुआ. अपने दायें हाथ में झूलते भारी झोले को दूसरे हाथ में पकड़ते हुए अगल-बगल की उपस्थितियों का मुआयना करने लगा. बोला, '' ..हां यार! एक जमाने के बाद भेंट हो रही है! लगता है स्कूल के दिनों के बाद सीधे अब! अरे, कहां हो, क्या कर रहे हो? कहां से आ रहे हो, कहां जा रहे हो? डाल्टनगंज चल रहे हो काऽ? ''
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