पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

यारों का यार अनिल जनविजय

व्यक्ति चित्र

 

यारों का यार अनिल जनविजय

भारत यायावर

अनिल जनविजय


अनिल ! दोस्त, मित्र, मीत, मितवा ! मेरी आत्मा का सहचर ! जीवन के पथ पर चलते-चलते अचानक मिला एक भिक्षुक को अमूल्य हीरा. निश्छल-बेलौस-लापरवाह-धुनी-मस्तमौला-रससिद्ध अनिल जनविजय ! जब उससे पहली बार मिला, दिल की धड़कने बढ़ गईं, मेरे रोम-रोम में वह समा गया. क्यों, कैसे? नहीं कह सकता. यह भी नहीं कह सकता कि हमारे बीच में इतना प्रगाढ़ प्रेम कहाँ से आकर अचानक समा गया? अनिल को बाबा नागार्जुन मुनि जिनविजय कहा करते थे. उन्होंने पहचान लिया था कि उसके भीतर कोई साधु-सन्यासी की आत्मा विराजमान है. वह सम्पूर्ण जगत को प्रेममय मानकर एक अखंड विश्वास और निष्ठा के साथ उसकी साधना करता है, जिस तरह तुलसीदास इस जगत को राममय मानकर वंदना करते थे -
जड़ चेतन जग जीव जल - सकल राममय जानि
बंदऊँ सब के पद कमल, सदा जोरि जुग पानि

वह प्रेम का राही है ! जो भी प्यार से मिला, वह उसी का हो लिया. इसके कारण उसने जीवन में बहुत दुख-तकलीफ उठाई है, काँटों से भरी झाड़ियों में भी कभी गिरा है, कभी अंधेरी खाइयों में. कई बार वह बेसहारा हुआ है. धोखा खाया है, ठगा गया है - पर कभी किसी को आघात नहीं पहुँचाई है, किसी का नुकसान नहीं किया है. ठोकर खाकर भी फिर ठोकर खाने के लिए तैयार खड़ा रहता है. वह अक्सर शमशेर बहादुर सिंह का यह शेर गुनगुनाता रहता है -
जहाँ में और भी जब तक हमारा जीना होना है
तुम्हारी वारें होनी है, हमारा सीना होना है

28 जुलाई, 2012 को वह पचपन साल का हो गया, तो मुझे आश्चर्य हुआ. पचपन साल की उम्र कम नहीं होती. आदमी बूढ़ा हो जाता है. तन और मन शिथिल. पर उसका तन अब भी जवान है और मन एक बालक की तरह तरल, सरल, विकार रहित. उसमें अब भी एक भोलापन है वह बेपरवाह है. झूठ-बेईमानी से वह कोसो दूर रहता है.

बचपन उसका अभावों से भरा था. असमय माँ की मृत्यु हो जाने से मानो उसकी हरी-भरी दुनिया ही लुप्त हो गई. एक बंजर और बेजान मनोभूमि में लम्बे समय तक रहकर भी उसने अपनी पढ़ाई को जारी रखा. फिर पढ़ाई करते हुए वह कविताएँ लिखने लगा. कविता ने उसे संबल दिया और एक जीवन-दृष्टि दी. 1977 में बीस वर्ष की उम्र में उसने एक कविता लिखी - ‘मैं कविता का अहसानमंद हूँ’. यह एक युवा कवि की अद्भुत कविता है. इसे आप भी पढ़िए - “यदि अन्याय के प्रतिकार स्वरूप तनती है कविता, यदि किसी आनेवाले तूफान का अग्रदूत बनती है कविता, तो मैं कविता का अहसानमंद हूँ.”

उसकी कविताएँ पहली बार 1977 ई॰ में ‘लहर’ में छपीं और 1978 ई॰ में ‘पश्यंती’ के कविता-विशेषांक में. वह दिल्ली से प्रकाशित उस समय की ‘सरोकार’ नामक पत्रिका से जुड़ा था और उसमें पहली बार उसके द्वारा अनूदित फिलीस्तीनी कविताएँ छपी थीं. यहीं से उसकी कविता और काव्यानुवाद का सिलसिला शुरू हुआ और साथ ही साथ 1978 ई॰ के प्रारम्भ से ही मेरे से पत्र-व्यवहार शुरू हुआ.

मैं भी तब नवोदित था और हजारीबाग से ‘नवतारा’ नामक एक लघु-पत्रिका निकालता था. अनिल ने दिल्ली में हुई एक साहित्यिक गोष्ठी की रपट मुझे भेजी थी, जिसे मैंने प्रकाशित किया था. फिर उसकी कुछ लघुकथाएँ भी मैंने ‘नवतारा’ में प्रकाशित की थी. हमलोगों में पत्राचार के द्वारा जो संवाद शुरू हुआ, वह बाद में प्रगाढ़ आत्मीयता में बदल गया. उससे पहली बार भेंट 1980 ई॰ के अक्टूबर महीने में हुई जब मैं रमणिका गुप्ता (जी) के साथ दिल्ली गया था और कस्तूरबा गांधी रोड में उनके पति के निवास पर ठहरा था. तब अनिल का पता था - 4483, गली जाटान, पहाड़ी धीरज, दिल्ली - 6, इसी पते पर वह पत्राचार करता था. यहाँ उसकी बुआ रहती थी, जो अनिल को अपने बेटे की तरह मानती थीं.

मैं खोजते-खोजते जब वहाँ पहुँचा तो अनिल तो नहीं मिला, किन्तु उसकी बुआजी अनिल के नाम लिखे मेरे पत्रों को पढ़ती रहती थीं और मुझे बखूबी जानती थीं. जब मैंने अपना नाम बताया, तब उन्होंने मुझे नाश्ता-चाय करवाई और देर तक बातचीत की.

अनिल ने तब जे॰एन॰यू॰ के रूसी भाषा विभाग में अपना दाखिला ले लिया था और सप्ताह में एक दिन अपनी बुआ से मिलने आता था. मैंने अपना दिल्ली-प्रवास का पता वहाँ लिखकर छोड़ दिया. उस समय राजा खुगशाल से भी मेरा पत्राचार होता था. वह नेताजी नगर में रहता था. वहाँ पहुँचा तो मालूम हुआ कि शकरपुर में नया किराये का आवास ले लिया है और वहीं चला गया है. पड़ोसी ने बताया कि अभी कुछ सामान ले जाना बाकी है, इसलिए वे फिर आएँगे. मैंने राजा के नाम भी एक पत्र वहाँ छोड़ दिया. कुछ ही दिनों बाद अनिल और राजा दोनों मेरे से मिलने आए. अलग-अलग. अनिल मुझसे मिला और मुझे अपने साथ जे॰एन॰यू॰ ले गया. उसी समय हमने केदारनाथ सिंह का इण्टरव्यू लिया. मैंने तब एक लम्बी कविता लिखी थी - ‘झेलते हुए’.

अनिल ने ही उसे शाहदरा से तीन-चार दिनों के भीतर छपवा दी थी और उस कविता पर एक छोटी-सी टिप्पणी भी लिखी थी जो इस प्रकार है:
“1980 कविता के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है. एक तरह से इस वर्ष कविता पुनः साहित्य की मुख्य विधा के रूप में उभर कर आयी है. न केवल आज के प्रमुख कवियों की कविताएँ बल्कि अनेक पुराने और बेहद पुराने कवियों के संग्रह भी इस वर्ष आये हैं. कविता के ऐसे समय में किसी नये कवि के लिए अचानक उभरना और साहित्य में अपना स्थान बना लेना बेहद कठिन है.

भारत यायावर अपनी कविताओं की प्रखरता की बजह से इस संघर्षविपुल वर्ष में ही उभर कर आये हैं. यायावर ने बहुत कम लिखा है; पर जो भी लिखा है, जितना भी लिखा है, उसमें उनकी चेतनासम्पन्न संवेदनशीलता के चलते वे सभी स्थितियाँ उजागर होती हैं, जिनसे आज का आम आदमी जूझ रहा है. हमारे देश का तथाकथित जनतंत्र और निठल्ली व्यवस्था किस तरह व्यक्ति को सामर्थ्यहीन और दुर्बल बना देती है, इसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति वे अपनी कविताओं में कर पायें हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mahesh darpan [darpan.mahesh@gmail.com] delhi - 2012-09-29 11:56:08

 
  अनिल पर भाई भारत का व्यक्ति चित्र पढ़कर अच्छा लगा. दरसल अनिल को पढ़ाना और समझाना आसान कम नहीं है. जिन दिनों मैं अनिल के साथ मास्को में था, तब और भारत के अनिल में मुझे कोई फर्क नज़र नहीं आया. विदेश पलट दोस्तों में मुझे यह बात कम ही में नज़र आई है. मैं उसे जैसा जानता हूँ वह काफी कुछ भारत यायावर के अनिल से मिलता है. जो उसे मेरी नज़र में जानना चाहें, वे मेरी किताब पुश्किन के देस में पढ़ सकते हैं.  
   
 

Alfred Animesh [alfredyayawar@rediffmail.com] ranchi - 2012-09-23 03:46:09

 
  अनिल जनविजय और भारत यायावर की दोस्ती बेमिसाल है. इनको देखने से मुझे शोले फिल्म के जय और वीरू की दोस्ती याद आ जाती है. I love Anil Janvijay and his photo with Yayawar. 
   
 

स्वप्निल श्रीवास्तव [swapnil.sri510@gmail.com] फैजाबाद - 2012-09-14 08:42:43

 
  अनिल के बारे मे भारत ने अदभुत बतकही की है अनिल है ही ऐसा प्रेमरस से भरपूर और जीवंत वह मेरा भी मीता है, हमारे समय मे रिश्ते तेजी से बदलते जा रहे है उन्हे बचाना जरूरी है उन्हे लिखकर भी बचाया जा सकता है उम्मीद है भारत इस क्रम को जारी रक्खेगे दोनो को बहुत याद. 
   
 

deepak mishra [deepishan@gmail.com] chandigarh - 2012-09-13 11:21:01

 
  एक बेहद खुशगवार , बेफिक्रे , मस्त , दरियादिल नेक इन्सान की समीपता ही आपको जो भीतरी ख़ुशी देती है, वैसा ही कुछ इस संस्मरणात्मक स्म्रतिचित्र को पढ़ कर प्रतीत हुई. जैसा कि अनिल अनलहातु ने स्पष्ट किया है- यह संस्मरण की विधा का अतिक्रमण है- आप उससे बहुत आगे निकल गए हैं. मैत्री निसंदेह- इन्सान को हासिल सबसे कीमती नेमतो में से एक है- उस निष्कपट , निश्चल , उदात , निस्वार्थ मैत्री की इतनी प्रगाढ़ बानगी- निसंदेह कहीं बहूत गहरे में भीगों देती है. भारत यायावर हिंदी के उन गिने चुने रेखा चित्र-शब्द शिल्पी हैं जो आपके मर्म को इतने गहरे में छू लेते हैं, यह कहना बहुत नाकाफी है | 
   
 

Anil Analhatu [aksinghccso@gmail.com] - 2012-09-10 17:33:25

 
  उत्तर आधुनिकता की अन्य तमाम विशेषताओं में से सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है - end of classification अर्थात वर्गीकरण का खात्मा. मतलब आकाश की तरलता.. fluidity of the space. स्पेस अब ठोस नहीं रहा. कोई भी आकार या वर्गीकरण, चौखटा फिक्स्ड नहीं है. इसी तरह साहित्य की विभिन्न विधाओं का आकार, प्रकार, खांचा भी टूटा. हिंदी में इसकी शुरूआत काशीनाथ सिंह ने की.... काशी का अस्सी.. लिखकर कुछ इसी तरह भारत यायावर जी ने संस्मरण की विधा का अतिक्रमण करते हुए कवि अनिल जनविजय पर संस्मरणनुमा व्यक्ति चित्र की तरह कहानी लिखी है.इस आलेख के जरिये भारत जी ने न सिर्फ अनिल जनविजय के व्यक्तित्व को उकेरा है बल्कि 1975 से 1984 तक के साहित्यिक समय को भी पेंट किया है. दो मित्रों के बीच के इस मानवीय ऊष्मा एवं गरिमा से परिपूर्ण समय एवम संबंध को अद्भुत वाणी दी है. भारत जी इसके लिये कोटिशः साधुवाद के पात्र हैं. आने वाली पीढ़ियां शायद ऐसी दोस्ती देखने से मरहूम हो जायेंगी..... ऐसा खुलूस ..इतनी मुहब्बत तो कोई अपनी मह्बूब से भी नहीं करता. 
   
 

चुन्नीलाल कैवर्त [clkaiwart@yahoo.com] सोनपुरी,बिलासपुर (छत्तीसगढ़) - 2012-09-09 16:38:56

 
  अनिल जनविजय जी की कवितायें जितनी सरल,सरस और उन्मुक्त हैं,उतने उनके व्यक्तित्व सहज,सरल और सह्रदय हैं।रेडियो मास्को से प्राय: प्रतिदिन उनकी आवाज मेरे कानों में शहद घोलती है। 
   
 

prataprao kadam [pratapraokadam@yahoo.com] khandwa [m.p] - 2012-09-09 16:18:10

 
  मै आपकी राय से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ. इस तरह से साहित्य और मित्रों से लगाव , दो संस्कृतियों को जोड़ने में भी असाधारण योगदान, अनिल की सहजता सचमुच असाधारण है. 
   
 

शैल अग्रवाल [] य़ू.के. - 2012-09-09 15:18:31

 
  अच्छा लगा दो सहज दोस्तों से मिलकर। 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in