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सामाजिक बदलाव फिल्मों का काम नहीं

फिल्म का उद्देश्य सामाजिक बदलाव नहीं है

 

 

श्याम बेनेगल किसी के पीछे चलने वाले निर्देशकों में नहीं हैं. और सच कहा जाए तो किसी में उनके पीछे चलने का साहस भी नहीं है. अपने समय से मुठभेड़ करने वाले श्याम बेनेगल की हरेक फिल्म ने एक नया मुहावरा गढ़ा है, सबसे अलग. हिंदी जगत में उनकी फिल्में आसमान में एक पत्थर उछालने की तरह लगती है. श्याम बेनेगल से रविवार की बातचीत के अंश

 

आपकी पहचान एक ऐसे निर्देशक के तौर पर रही है, जिसे एक खास किस्म की फिल्मों का मास्टर माना जाता रहा है. वह एक दौर था. अब क्लासिकल, आर्ट फिल्म, यथार्थवादी सिनेमा, नया सिनेमा, समानांतर सिनेमा और इससे मिलते-जुलते शब्द लगभग हाशिए पर हैं. इस पूरे दृश्य को आप किस तरह देखते हैं ?

हरेक फिल्म अपने-अपने समय को दर्शाती हैं और उस हिसाब से बनती हैं. फिल्में स्थानीय पसंद को दर्शाती हैं. फिल्म अखबार की तरह ही हैं. आज का जो अखबार है, वो बहुत ही ताज़ा लगता है और कल का जो अखबार है वो बहुत ही बासी.

श्याम बेनेगल


जब आप कोई फिल्म बनाते हैं तो वो रुचि की स्थानकता को दिखाती है. जैसे-जैसे लोगों की रुचि बदलती है, उनका नज़रिया, उनके जुड़ाव और आकांक्षाएं बदलती हैं, उसी तरीके से फिल्में भी बदलती रहती हैं.

बंगाल में 1950 में और हिंदी में 1970 के आसपास नये सिनेमा का दौर शुरु हुआ था और उस सिनेमा ने कई मायनों में एक आर्टिकुलेट मध्यम वर्ग, जो बहुसंख्यक नहीं बल्कि अल्पसंख्यक था; की रुचि को दर्शाया. उसकी जो सामाजिक चिंताएं थीं, वो फिल्मों में प्रतिबिंबित होने लगीं. अब उस मध्यम वर्ग की चिंताएं, उसके सरोकार ही बदल गए हैं इसीलिए इस किस्म की फिल्मो को कोई देखने नहीं आता है.

अभी भी सामाजिक सरोकार की फिल्में बनती हैं, लेकिन वो सामाजिक सरोकार ही बदल गए हैं. दूसरी बात ये है कि पहले ग्रामीण भारत में हम लोग बहुसंख्यक थे. यानी ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कमाते-खाते थे पर अब वो संतुलन भी बदल रहा है. तो स्वाभाविक है कि फिल्म उस बदलते संतुलन को दर्शाएगी.

तो क्या हम ये मानें कि आज वो दर्शक नहीं है, जो ऐसी फिल्में देखना चाहता है...

नहीं, मैं रुचि के बारे में भी कह रहा हूं. क्योंकि इस तरह की फिल्म में एक छोटे वर्ग की रुचि है. फिल्म बनाते वक्त ये भी तो ध्यान में रखना पड़ता है कि कितने लोगों की रुचि ऐसी फिल्मों में है ? क्योंकि आप फिल्म पर पैसा लगाते हैं तो उससे कमाई के बारे में भी देखना पड़ता है. फिल्म बनाना चित्रकारी या कविता लिखने जैसी कोई चीज़ नहीं है. फिल्म बनाने में बड़ा खर्चा है और उससे कमाई भी होनी चाहिए. जिस किस्म की फिल्मों की हम बात कर रहे हैं, उनसे पैसा वसूली आसान नहीं है.

आजकल तो कई माध्यम हो गए हैं पैसा कमाने के जैसे टीवी चैनल हैं, इंटरनेट है, मोबाइल फोन है, डीवीडी आ गए हैं तो कई सारे तरीकों से कमाई हो सकती है. इसलिए अब ये फिर से मुमकिन है फिल्म बनाने वालों के लिए कि ऐसी फिल्में बनाएं जो कि वो बनाना चाहते हैं. उस तरह की फिल्मों में ऐसा नहीं है कि लोगों की रुचि नहीं है पर वह इतनी काफी नहीं कि एक निरंतर बाज़ार बना कर रख पाए.

दर्शकों का एक बड़ा वर्ग मान कर चल रहा है कि आजकल जो फिल्में बनती हैं वो मल्टीप्लैक्स के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं.

क्योंकि मल्टीप्लैक्सैस की वजह से पैसा वसूली जल्दी होती है. मल्टीप्लैक्सैस में टिकट के दाम काफी ज्यादा हैं दो सौ, डेढ़ सौ से उपर. अब आप एक ही स्क्रीन वाले थियेटर में जाइए तो वहां कितना आपको देना होगा ? ज्यादा से ज्यादा 25 रुपये. यहां आठ लोगों को आप बैठाएंगे तब उतना पैसा पाएंगे जितना मल्टीप्लैक्स का एक आदमी दे जाता है. स्वाभाविक रूप से मल्टीप्लैक्स का जो दर्शक है, उसकी जेब में ज्यादा पैसे होते हैं.

हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार, देवानंद और राज कपूर का जो दौर था, तीनों बड़े नायक थे, सुपर स्टार थे. इन तीनों के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं, वो तीनों ही सुपरस्टार थे, तीनों ही बहुत बड़े नायक थे, तो उनकी एक्टिंग स्किल या उनकी फिल्में...

आप देखेंगे, आज़ादी के समय एक नया जोश था, आजादी और भविष्य को लेकर. किस किस्म का भविष्य हिंदुस्तान को चाहिए, इस तरह का आइडियलिज्म फिल्मों में भी था. जो फिल्में भी बनती थी उस जमाने में, उसी किस्म के कैरेक्टर के करीबी थीं.

देवानंद | राजकपुर | दिलीप कुमार

लंबे समय तक भारतीय सिनेमा का दर्शक इन तीनों अभिनेताओं में अपने और अपने आसपास को तलाशने की कोशिश करता रहा.


दिलीप कुमार जैसे एक्चुअली रोमांटिक रोल करते थे और रोमांटिक मतलब ट्रैजिक रोमांस. मूल रुप से इसी किस्म के रोल वे किया करते थे. वे अपने इसी तरह के अभिनय पर कंसंट्रेट करते थे. हाल ये था कि देवदास जैसे ट्रैजिक हीरो के रुप में उनकी पहचान बन गई थी.

देवानंद कॉलेज स्टूडेंट के लेवल पर, एडोलेसेंट लेवल पर काफी लोकप्रिय थे. खासतौर पर शहरों के युवा वर्ग में उनकी गजब की पकड़ थी.

राज कपूर का मामला इन दोनों से अलग था. वे एक अभिनेता से बड़े निर्देशक थे. अभिनेता के रोल में उन्होंने हमेशा आम आदमी को उभारने की कोशिश की. एक सामान्य आदमी को गढ़ने में उन्होंने अपनी पूरी प्रतिभा लगा दी. आर के लक्ष्मण का जो एवरी मैन है, वे उसी तरह के चरित्र किया करते थे. एक बहुत सामान्य आदमी, किस तरह देश और समाज के भीतर के बदलावों को समझता है, कैसे वो इस दुनिया को देखता है, उस किस्म के रोल्स उन्होंने करने शुरु किए.

यह बात आप आवारा और श्री 420 जैसी फिल्मों को देखते हुए भी महसूस कर सकते हैं. 10-12 सालों तक उन्होंने इसी तरह की फिल्में बनाईं. इसी तरह की फिल्मों के सहारे वे एक अभिनेता के साथ-साथ एक सशक्त निर्देशक के रुप में उभर कर सामने आए.

तो ये तीनों का जो एक स्टाइल था, अब समझिए कि वो दैट स्टाइल रिमेंड क्योंकि हमारे जो हिंदुस्तानी ऑडियेंसेस थे, उनके लिए जो ये तीन प्रतिरुप थे, जो युवा और समकालीन थे. ये कुछ समय तक चला,और तब बंद हुआ जब एक किस्म का रियैलिटी चेक (जांच) जिदंगी में आया. ये बात साफ हुई कि हम उतने बढ़िया तरीके से विकास नहीं कर रहे थे जैसा कि हमें करना चाहिए था. परदे पर जो दृश्य बन रहा था, उसका धरातल से कोई रिश्ता नहीं बन पा रहा था.

उसी समय अमिताभ बच्चन का जो एंग्री यंग मैन का रोल था, वह शुरु हुआ. वो एक किस्म की सामाजिक नाइंसाफी के खिलाफ जवाब था. यह सब कुछ लगभग 20 साल तक चला. 1970 की शुरुवात से लेकर 1990 तक वो एक एंग्री यंग मैन का प्रतिरूप बन गए थे, जो कि न्याय के लिए लड़ रहा है और जिसको न्याय नहीं मिले तो मैदान में कूद पड़ता है औऱ वो गलत को सही बना देता है.

पहले हम देखें तो राज कपूर का, देवानंद का, दिलीप कुमार का सिलसिला चला. दिलीप कुमार तो काफी ज्यादा समय तक चले और देवानंद भी, पर राज कपूर कुछ कुछ जगहों पर बदले भी, वो रोज के आदमी बन गए और एक चार्ली चैपलिन किस्म का कैरेक्टर उन्होंने कई तरीकों से दिखाया.

अमिताभ बच्चन का जो कैरेक्टर बहुत समय तक चला यानी लगभग बीस साल, उनके बीच में एक रोमांटिक हीरो का कैरेक्टर राजेश खन्ना ने किया. वे दिलीप कुमार की परंपरा में थे.

राजेश खन्ना जो थे, वो मैटिनी आइडल थे. अपने जमाने के रोमांटिक हीरो थे वो. टाप आईडल होते हैं, उस किस्म के प्रसिद्ध आईडल थे वो फिल्म में. और एक किस्म का हिस्टीरिया था उनके लिए. आजकल भी होता है ये सब. जैसे शाहरुख खान के लिए जिस किस्म के प्रशंसकों की भीड़ जुटती है, वह कुछ-कुछ राजेश खन्ना के जैसे ही है. वैसे देखा जाए तो अमिताभ बच्चन के भी प्रशंसकों की तादात कम नहीं है. दक्षिण भारत में रजनीकांत हैं, उनके प्रशंसक तो अविश्वसनीय हैं, ऐसा शायद किसी औऱ स्टार मैंने नहीं देखा.

अमिताभ बच्चन शाहरुख ख़ान

एक लंबे समय तक चले अमिताभ के एंग्री यंग मैन के चरित्र को शाहरुख खान ने थाम लिया.


अब अमिताभ बच्चन के बाद 90 के दशक में फिर से भारत बदला, नई नीतियां आ गईं और समझिए विकास की ओर जाने के रास्ते बदले, सरकार के हाथ में जो नियंत्रण हुआ करता था, वो सब खत्म होने लगा.

एक किस्म का जो रेगुलराइजेशन, वैश्वीकरण होने लगा तो उसकी वजह से नए चेहरों की जरुरत पड़ी. हिंदुस्तान में जो हो रहा था उसे दर्शाने के लिए नए चेहरों की जरुरत पड़ी. तो फिल्मों में जो तीन खान हैं शाहरुख, सलमान और आमिर खां का आना शुरु हो गया. और एक लंबे समय तक चले एंग्री यंग मैन के अमिताभ के चरित्र को शाहरुख खान ने थाम लिया. वे आज के वैश्विक भारतीय के चरित्र को दर्शाते हैं. वे एक युवा वैश्विक भारतीय को दिखाते हैं जो कि हर स्थिति में सुखद स्थितियों में है. जिसकी कोई सीमाएं नहीं हैं, उसने सारी सीमाएं और बंधनों को तोड़ दिया है. वो विश्व में कहीं भी काम कर सकता है, उस किस्म का जो नया आशावादी, सकारात्मक चरित्र जो है और डेविल मे केयर एटीट्यूड भी है. पर वो साथ ही साथ बहुत होशियार भी है. 90 के दशक से शुरु होकर यह अभी तक चले जा रहा है.

आज़ादी के बाद से अब तक की फिल्मों को अलग-अलग स्तर पर आप किस तरह देखते हैं.

विषयवस्तु में तो आप सब जानते हैं कि किस किस्म के बदलाव हुए हैं. लेकिन तकनीक में भी बहुत बदलाव आए हैं. पिछले दस साल में जो तकनीकी बदलाव हमारी फिल्मों में आए हैं, स्वर, पिक्चर क्वालिटी, मिक्सिंग, संपादन में उसका कोई मुकाबला नहीं है.

हालत ये है कि अब तो पश्चिम में बनी हुई किसी फिल्म में इस्तेमाल की गई सबसे उन्नत तकनीक और हमारे हिंदुस्तान में जो फिल्में बन रही हैं उनमें कोई फर्क नहीं है. सबसे उन्नत तकनीक जो आपको पश्चिम की फिल्मों में नज़र आती थी अब हमारी फिल्मों में नज़र आने लगी है. अब इसमें कोई फर्क नहीं है.

50-60 के दशक में फिल्मों के सामाजिक सरोकार भी हुआ करते थे...

वो एक दौर चला था उस जमाने में 1947 के बाद. खासकर 1950 और 60 के दशक में. जैसे बी आर चोपड़ा की जो फिल्म है नया दौर, महबूब की फिल्म थी मदर इंडिया, राज कपूर की जो फिल्में थी श्री 420, आवारा ये सब वो उस समय के आशावाद को दिखाती थीं. फिर एक किस्म की निराशा भी आने लगी जो प्यासा जैसी फिल्मों में दिखाया गया. मतलब समाज के द्वारा सही करने का न्याय, ये जो समाज के बारे में फिक्र जो है, ये फिक्र अमिताभ बच्चन के आने तक चला. जब उदारीकरण की शुरुआत हुई तो ये फिक्र कम महत्वपूर्ण होने लगे.

आप जिस दौर की बात कर रहे हैं, उसी समय एक फिल्म बनी थी- मदर इंडिया. यह पहली फिल्म थी, जो ऑस्कर के लिए नामांकित हुई. मदर इंडिया में आप ऐसा क्या अलग पाते हैं दूसरी फिल्मों से ?

मुझे पता नहीं है कि मदर इंडिया बनाते समय महबूब साहब की मंशा क्या थी. लेकिन एक चीज़ तो जरूर थी कि मदर इंडिया कई मायनों में ऐसी फिल्म बनी जो कि देश का प्रतिनिधित्व करती थी. उस जमाने की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती थी. मदर इंडिया एक किस्म से आदर्श बनी और इस आदर्श की लोगों ने फिर नकल करनी शुरु की. इस फिल्म में जो चरित्र थे वे बिल्कुल आदर्श थे और वे आने वाली फिल्मों के लिए परंपरा की तरह हो गए.

आज के निर्देशक क्या समाज को सही-सही परदे पर उतार पा रहे हैं या उनके अंदर भी वही जज्बा है, जो आज़ादी के समय के निर्देशकों में था ?

फिल्म बनाने वाले कोई संस्कारक नहीं हैं औऱ उनको संस्कारक बनने की जरूरत भी नहीं है. फिल्म मेकर जो हैं, वो मनोरंजन करने वाले हैं. उनका पहला काम मनोरंजन करना है, उसके बाद वो कलात्मक हो सकते हैं, अगर वो चाहे तों. अगर उनमें अभिप्रेरणा है कि उन्हें कोई कला पेश करनी है और अगर उन्हें कोई स्थैतिक चैतन्यता इसमें दिखाना है तो वो भी हो सकता है.

अगर आखिर में आप इस माध्यम को सामाजिक बदलाव के लिए एक अत्प्रेरक जैसा देखना चाहें तो वो भी हो सकता है. लेकिन फिल्म का ये मुख्य उद्देश्य नहीं है, यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है.


04.05.2008, 00.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Vishwa Mohan Tiwari (onevishwa@gmail.com) NOIDA

 
 "अगर आखिर में आप इस माध्यम को सामाजिक बदलाव के लिए एक अत्प्रेरक जैसा देखना चाहें तो वो भी हो सकता है. लेकिन फिल्म का ये मुख्य उद्देश्य नहीं है, यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है."
श्याम बेनेगल एक गंभीर विचारक भी हैं. किंतु उनकी सोच भी बाज़ारवाद में ढलकर बात कराती है. फिल्म चाहे मनोरंजन के लिए बनाएं वे दर्शकों पर प्रभाव तो डालती ही हैं और उनकी जीवनदृष्टि भी बदल सकती है. फिल्म जैसे माध्यम का उपयोग कुछ व्यापारी किस्म के लोग पैसे कमाने के लिए कर सकते हैं. किंतु कुछ तो गंभीर फिल्मकार होने चाहिए यदि किसी समाज को जीवंत तथा सूचनाएं वाला बनाए रहना है, अन्यथा हम पश्चिम के बाज़ार ही बने रहेंगे. भारत अन्य देशों से अपनी सास्कृतिक धरोहर के कारण ही तो भिन्न है. जय भारत.
 
   
 

Gautam Sachdev

 
 Shyam Benegal is right in many ways and I am one of his admirers, but I would beg to differ with them regarding his emphasises. The Bollywood films do reflect our society, but they emphasise much more on glamour, affluence and a stereotyped dreamworld of yore than the real global world. The common man is more at the margins, than ever before and the real concerns of the majority are lost in sexy dances and songs. These films convey an imagined life. 
   

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