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रति सक्सेना की कविताएं

साहित्य

 

रति सक्सेना की 3 कवितायें

 

बावन घण्टे का निर्वासन

रति सक्सेना

(कृत्या के बहीखातों से उलझते हुए)

बावन घण्टे,
पूरे बावन घण्टे
मैं उन संख्याओं पर
झुकी हुई, उन्हें समझने की कोशिश में
अपने चश्मे के शीशों को साफ कर रही थी

आश्चर्य से देख रही थी
शून्य के रहस्य को
जिसका ना होना
उतना ही चमत्कारी है
जितना कि होना

अपनी इस दुनिया में वे
जितने कंधों से जुड़ते
उतने ही शक्तिशाली बनते जाते

उनका अकेला रूप मेरी शब्दों की
दुनिया में जितना ताकतवर
इन अंको की दुनिया में उतना ही निरीह

बारह घण्टे
मैं पढ़ रही थी, लिख रही थी
अंकित कर रही थी
और सो भी रही थी
इन्हीं अंको के बिस्तरे पर
वे चुम्बित करते हैं,
इस तरह की
मात्र वे रह जाते हैं
तिजोरी में भर लेते हैं
आसमान को
बही खातों में समन्दर
एक पल कंपा देते हैं
मात्र एक लकीर से
दूसरे पल खुश कर देते हैं
मात्र दो लकीरों से

वे चाल चलते है
साँप बन निगलते हैं
सीढ़ी बन
चढ़ा देते हैं
सातवें आसमान पर

बावन घण्टे
बावन घण्टे मैं
कैद खाने में थी

फिर
मेरे भीतर के शब्दों ने
इस तरह पलटी मारी कि
वे शतरंज के तख्ते की तरह उलटा गए
जब तक कि वे सम्भलें

मैं मुक्त थी
बावन घण्टे के निर्वासन से
शब्दों की दुनिया के

लेकिन अब
मैं कुछ सन्देह से
शब्दों की ओर देख रही हूँ...

समय सारिणी
मुझे एक समय सारिणी दो
जिसमें मेरा अपना समय ही ना हो

फिर मुझे ऐसी समय सारिणी दो
जिसमें केवल मेरा अपना समय हो

मैं दोनों समय सारिणियों को
आमरस की तरह घोंट कर पी जाऊँगी

फिर समय मेरे भीतर होगा
और मैं मुक्त समय से

देहान्तर
सात मंजिल ऊपरी जमीन पर तलवे टिकाते ही
मैं उस ठंडक को उतार कर रख देती हूँ
जो गोबर से लिपे आंगन से
मेरे साथ-साथ चली आई है
और स्वेटर की तरह, खिड़कियों, अलमारियों
और दीवारों से घिरे उस कमरे को पहन लेती हूँ
धीरे-धीरे आसपास मेरी देह पर बेल की तरह चढ़ जाता है

एक घर से निकल कर दूसरे तक जाते हुए
पिछले घर के कुछ रेशे मेरी देह पर रह जाते हैं

मेरे दूसरे घर की दीवारें, धूप से बनी हैं
अंधेरे के साथ खो जाती हैं
इस घर को पहनना मेरे लिए
नींद-सा सपनदार होता है
मैं सपने से हकीकत की ओर चलना शुरु करती हूँ

इस अन्तिम घर में मेरा इंतजार करता है
एक तकिया, बिस्तरे का एक हिस्सा
और दक्षिण की और खुलने वाली खिड़की

दक्षिण मृत्यु का घर है
मैं इसे अपनी देह बना कर अपने तकिए पर ले जाती हूं

अब दक्षिण दिशा को अपनाने के लिए
पूरी तरह से तैयार हूँ

26.10.2012, 19.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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