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समय में तुम

कविता

 

समय में तुम

मनोज शर्मा

मनोज शर्मा

लाल रत्नाकार


आजकल समय
घड़ी से बंधा नहीं है
अपंग हो गया है
प्रिय!
तुम लेकिन यूं ही सुंदर बनी रहना...

चाहे सारे फूल मुर्झा जाएं
और चांद को ग्रस लें ग्रहण
चाहे सच को टीका लगाने वाले
न बचें
तुम अपनी पेशानी बचाए रखना...

शोर बहुत बढ़ गया है
कोयलें कूकना गयी हैं भूल
हमारे रास्ते के दोनों ओर
खतरनाक इश्तिहार आस्तीनें चढ़ा रहे हैं
बस तुम
मुस्कराना नहीं भूलना...

सुबह
जो सूरज उगा
उसमें एक राजनीति मिली
दोपहर
जो चली हवा
वहां कुछ ताकतें, समाधियों पे जमा हो रहीं थीं
रात
जो तारे चमके
उनमें से पुरखे एकदम गायब हो गए...

प्रिय!
बस तुम इतना करना
खोलना अपना जूड़ा
और गर्दन को दाएं-बाएं घुमाना
शीशे में झांकते, अपनी आंखें ही नहीं
चमकीले दांत भी देखना ज़रूर
और फिर ठठाकर हंस देना वैसे ही
जैसे पहली बार हंसी थी...

इस समय
जैसे खरगोश दुबक गए हैं और पक्षी तमाम
और ज़िंदगियां पानी-पानी हुई हैं
और अखबार भी
जैसे खामोश हो लिए हैं रिश्ते
तो तुम इनके सर पर बस
अपने हाथ रख देना

प्रिय!
जीवन एक खाली पड़ी जगह हो गया है
किसका कब्ज़ा कब हो जाए, किसे पता...
तुम अपनी निश्चल सी हंसी हंसना
कि हंसी तो हमेशा से महकती आयी है
और समय की घड़ी में
खुद को करती आयी है दर्ज़
साधिकार.

13.11.2012, 22.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

प्रदीप कांत [kant1008@rediffmail.com] इन्दौर - 2013-02-15 15:38:14

 
  तुम अपनी निश्चल सी हंसी हंसना / कि हंसी तो हमेशा से महकती आयी है और समय की घड़ी में / खुद को करती आयी है दर्ज़ / साधिकार. इस उदास समय की बेहद ज़रूरी पंक्तियाँ हैं 
   
 

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' [devendra.mahroom@gmail.com] कटनी ,मध्यप्रदेश - 2013-01-25 14:36:28

 
  इस कातिल कुसमय मेँ जब शाम घिरते ही छोड़ जाता है साथ साया भी पंद्रह साल का किशोर भी औरत के मांस से खेलना चाहता है चाहे वह नाऩी दादी की उम्र का हो ऐसे दुर्दिनोँ मेँ तुम समय की गति लय से बाहर जो कविताइ के मुगालते पाले मुझसे उम्मीतेँ पाल रहे हो असंगत है कि मैँ उस प्रदर्शन मेँ शामिल हूँ जो औरतोँ के लिए मर्दो के लिए है मैँ यहाँ चाहती हूँ तुम्हारी भागीदारी प्रतिरोध के समवेत गान की लयतान मेँ कचरा कविताई से परे. 
   
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