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उस साँवले समय में चितकबरी मनुष्यताओं का भी एक कोना था

विचार

 

उस साँवले समय में चितकबरी मनुष्यताओं का भी एक कोना था

मनोज कुमार झा

मनोज झा

डॉ.लाल रत्नाकर


वे सुस्त और साँवले दिन थे. अभी चीजों और चलंत रिश्तों ने गाँव में मील के पत्थर नहीं गाड़े थे. माइल स्टोन एक बाहर से आया शब्द था, जिसे गाँव के लोग न अपने विकट श्रम के बीच रख पाते थे न उत्कट आलस के. फटाफट माइल स्टोन और झटपट इंटरनेशनल होने के मार्केट मंत्र अभी इस जीवन-सरिता के उस पार थे. सब कुछ सुंदर और सलोना नहीं था, उस जीवन में कई सीवनें और गाँठें थीं मगर एक शै जो सुकून देती थी, वह यह था कि यहाँ कई तरह के लोग खप जाते थे. और यह खपना महानगरों में बेचेहरा होकर खपने से बिल्कुल अलग था.

खूब गाढ़ी शहद की तरह अंधेरी रात में सियार वनविलाव आदि हमारे साथी थे, और तारे भी और वो कमबख्त चोर भी जो कई-कई रात भटकने के बाद भी प्लास्टिक का एक जोड़ी जूते नहीं खरीद पाते थे और अक्सरहाँ परदेस में रहने वाले बच्चे से अपने पाँव बचाने की गुहार करते थे.

खपना कोई सामान्य क्रिया नहीं था, यह एक उम्मीद था जो गाँव थोड़े ढ़ीले ढ़ाले मोटे मिजाज के लोगों की खिदमत में पेश करता था. शहर का भी झोपड़पट्टी ही ऐसे लोगों को पचा पाती हैं, वरना एटीकेट, डेलीकेट, एटीच्यूड, मल्टीच्यूड, हाइब्रिडिटी, डाइवर्सिटी वे चक्करदार सीढ़ियाँ हैं जिस पर सयाने भी लुढ़क जाते हैं. ये सारे प्यारे शब्द हैं मगर इनकी पहुँच के बाहर, जिनके शहर में आने से ये शब्द विकसित हुए.

ऐसे ही एक खपे हुए साहब थे श्रीकांत. हमारे किशोरावस्था के गँवइ जीवन से जो मन का जल-थल निर्मित ही रहे थे, उसी में जाति, वर्ग इत्यादि चीजों के साथ-साथ नॉर्मल-अबनॉर्मल के खिलंदड़ मेल से बनी चितकबरी मनुष्यताएँ पैबस्त हो रही थी. श्रीकांत की मनुष्यताएँ अबनार्मल थी. गाँव की भाषा में कहें तो इसका माथा विशेष हो गया था.

लोग उसके बारे में सौ तरह की बातें करते थे. कुछ कहते थे कि यह बहुत बड़े घर का है, कोई कहता कि इसका एक भाई कलक्टर है. इस तरह लोग उसके लिए सुरक्षा-कवच बना रहे थे कि उस का मान बना रहे. ये भी कहा जाता था कि उसकी सौतेली माँ ने नमक पढ़वा कर खिला दिया, इसलिए वह सनक गया.

श्रीकांत कम से कम एक लाख लोगों को पहचानता होगा. वह सौ से ऊपर गाँवों में घूमता था और उसके सारे महिलाओं-पुरूषों को जानता था. वह माँग कर खाता था और माँगे हुए में से बाँटता भी था- कभी किसी को नींबू तो कभी किसी को मूली.

उन दिनों मैं दरभंगा में रहकर पढ़ता था. एक दिन अपने गाँव के चौक पर उतरा तो देखा श्रीकांत बैठा हुआ है, बोल नहीं पा रहा है, बोलने की कोशिश करता तो गों-गों की आवाज आती, पास में चवन्नियाँ, अठन्नियाँ बिखरी हुई थीं. यह मेरे लिए असह्य था- कहाँ गई वो कड़क आवाज जिसमें आशीर्वाद से लेकर श्राद्ध तक के मंत्र शुद्धता- अशुद्धता के बीच की रेखा को पार करते हुए पढ़ा करता था, खुश होने पर आशीर्वाद का और नाराज होने पर श्राद्ध का मंत्र. तो क्या यह अपनी तरह घुमक्कड़ अब इन गाँवों की सरहदों को पार कर चला जाएगा. बहुत दूर. पता नहीं क्यों मुझे किसी अपने को खोने का अहसास हुआ.

और कुछ दिन बाद पता चला वो मर गया. वही बदरंग मौत. गाँव के लोग कहा करते हैं कि हम पके आम हैं, पता नहीं कब गिर पड़ें. पर बदकिस्मती कि अधिकांश पक कर नहीं सड़ कर गिरते हैं. और श्रीकांत भी गिर पड़ा. औरतें रो रहीं थी, पता नहीं श्रीकांत के घर के लोग रो रहे थे या नहीं.

लोग कहते हैं कि उनके घर भी खबर भेजी गई पर पता नहीं वो खबर पहुँची या अपरिचय के दीवार से टकराकर लौट आई. इच्छा होती है कि श्रीकांत के अंत्येष्टि स्थल पर जाऊँ और देखूं कि वहाँ किसी जंगली फूल का पौधा उगा या नहीं पर डरता हूँ, खिसका हुआ न समझा जाउँ.


17.12.2012, 21.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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