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इला कुमार की तीन कविताएं

साहित्य

 

इला कुमार की तीन कविताएं


ऊपर उठी शाखाओं के पीछे

इला कुमार


ऊपर उठी शाखाओं के पीछे है
शाम का आसमान
लम्बी पूंछ वाली चिड़िया एक एक शाख
नीचे उतरती है
उसकी भंगिमा में है थोड़ी हिचकिचाहट
थोड़ा संकोच

वह धीमें से झुककर पत्तों के बीच
थोड़ा रस पीने की चेष्टा करती है
उसके पंखों की छूअन में छिपी है कोमलता
खूब सारी कोमलता

इच्छा होती है कि आए वह यहाँ
कार की खिड़की के अन्दर
आकर बैठ जाए यहीं कहीं

छू लेने दे अपनी कोमल हिचकिची भंगिमा
मन की आकांक्षा आकाश की सतह पर
स्वयं को अंकित करने बढ़ चलती है.

एक पेड़

एक पेड़
गैरेज के पार्श्व में बड़ा होता है
महलनुमा गृह के अहाते में

घर की माँ
उसे काजू-वृक्ष समझकर खरीद लाई थी
दूर देश के मेले से

हर वर्ष बसंत-पतझड़ के दिनों को गिनता हुआ
साल-दर-साल
बाल्टी-बाल्टी पानी सोखता हुआ

वह तथाकथित काजू का वृक्ष
बढ़ता जाता है
पत्तियों का मुकुट संभाल, दरख्ती पत्तों की बाहें फैलाए

डालियों से डाल
डाल से डालियों को बार-बार पसारता हुआ
सालों-साल गुजरने के बीच

कई बार घर के मालिकनुमा बेटे की नजरों में
वह पेड़ खुभ जाता है
घूरती निगाहों से वृक्ष को चेतावनी-
“इस साल न फले
तो कटवा दिए जाओगे!”

आह!

धमकियों के बीच फिर भी वह पेड़ बढ़ता है
सालों के बाद बसंत में
घर की माँ आशान्वित नजरों से
उसकी कोख पर गहरी नजर डालती है

आखिरकार
एक सुंदर सलोने समय के बीच
पेड़ की शाखों पर, डालियों पर
नवे अंकुर झूम आए
वृक्ष ने स्वयं को रच डाला
नन्हीं फलियों को काजू जैसी मुरकनी झोपी में सजा

वह बादाम के स्वादवाली फलियों के संग
जग के सामने प्रस्तुत हुआ

वे फल
फल तो थे
लेकिन वे फल काजू न थे

घर की नन्हीं बिटिया को
अचरज है
दुःख से भरकर वह सोचती है

फला-फूला हुआ
वह फलदार दरख्त
आखिर क्यों कटवा दिया गया.
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