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अंतिम इच्छा

कहानी

 

अंतिम इच्छा

रामजी यादव

सांवां

सभी पेंटिंग: डाक्टर लाल रत्नाकर के


जंगबहादुर सिंह एक दिन मुंबई के बहुत बड़े बिल्डर बन गए और पिछले 50 वर्ष से अथाह दौलत कमाई लेकिन अब मरने के कगार पर पहुँच गए थे. शुरू से ही खाने पीने के बहुत शौकीन रहे लेकिन अब लीवर थक गए थे. दो अटैक पड़ चुके थे. काफी कमजोर हो गए थे. पथ्य के नाम पर दो फुकई और पनीली दाल ही चल पाती. सब्जी के नाम पर लौकी-करैला, बस. छप्पनों व्यंजन धरे रह जाते लेकिन अब उनकी आंतों में दम ही बाकी न रहा. जीवन में तीन चीजें न हो पाएँ तो प्राणी के आखरी दिन करीब मानकर उससे करुणापूर्ण व्यवहार शुरू कर देना चाहिए– अगर प्राणी से कुछ खाया जाना असंभव हो, अगर उससे खाकर पचाया जाना असंभव हो, अगर उसे पचाकर बाहर निकालना असंभव हो. पानी न हो तो प्राणी कुछ दिनों होंठ चाट लेता है और फिर उसका खून ही पानी में बदल जाता है. अगर भोजन न हो तो कुछ दिन तक आँतें कुलबुलाती हैं और फिर शरीर में जमा चर्बी ही भोजन बनने लगती है. हवा अगर बंद हो जाय तो मजबूत फेफड़े उसे वायुमण्डल के आखिरी कोने से भी खींच लेते हैं लेकिन अगर फेफड़े ही अपने अंदर की हवा न निकाल पाएँ तो जीवन के विस्तार के बारे में शंका करना विद्वता की निशानी है.

असल में जंगबहादुर सिंह इस हालत के कगार पर थे. डॉकटर ने दवा को वाहियात कह दिया था और बच्चों को सेवा का मंत्र दे दिया था. बच्चे भी बड़े पितृवत्सल थे. चार बेटियाँ और तीन बेटों ने जब यह सुना तो उन्होंने पिता को अपना सर्वोत्तम स्नेह देने का निर्णय किया. डाक्टर के कहने से पिता की इच्छा के अनुसार उनकी सेवा-सभाखन में लग पड़े. बेटियाँ अपने घर से प्रायः आ जातीं और दिन भर पिता की दिलजोई और गमगुसारी करके शाम तक वापस चली जातीं. सुबह-सुबह बेटे पहुँचते और पिता के तलवे सहलाते और आहिस्ता-आहिस्ता उनकी उँगलियाँ फुटकाते. बहुयेँ एक पाँव पर खड़ी रहतीं और नाती-पोतों को भी इतना समय मिल जाता कि अक्सर दादा को देख और बतिया आते. सभी जंग बहादुर सिंह से पूछते कि उनका क्या खाने का मन है ? जंगबहादुर सिंह स्नेह से भींगते हुये अपनी आँखें मूँद लेते. थोड़े समय बाद लगता कि वे सो गए हैं. इस अवस्था में सारी इच्छाएं भोजन से ही पूरी हो जाती हैं बल्कि यह कहा जा सकता है कि इससे अधिक बड़ी कोई चीज ही नहीं होती है. अपने जीवन के अंतिम मंजिल की ओर अग्रसर यात्री से कोई नहीं पूछता कि आप क्या बनना चाहते हैं, क्योंकि बनना भी दरअसल भोजन की गारंटी पाना है.

ऐसे ही एक दिन जंग बहादुर सिंह ने बात करते हुये अपने बड़े बेटे से साँवाँ का भात खाने की इच्छा प्रकट की और कहने लगे कि 60 बरस पहले जब वे जौनपुर से चले थे तब माँ ने साँवाँ का भात और आलू की तरकारी बनाया था लेकिन गाड़ी छूटने के डर से वे बिना खाये ही चले आए. तब से फिर कभी मौका ही न मिला. जब गाँव जाते तो माँ गेहूं के पकवान बनाती लेकिन साँवाँ का भात कभी नहीं बना. अगर तुम लोग मुझे दो कौर ओखली में कूटा हुआ साँवाँ का भात खिला देते तो सुख से परलोक जा सकूँगा.

दूसरे बच्चों ने यह सुना तो चकरा गए. पोतों को तो आश्चर्य हुआ कि यह क्या होता है ! किसी ने पहले यह नाम तो सुना ही नहीं था. जंगबहादुर जब गाँव से आए थे तब उनकी शादी हुई थी, गौना नहीं हुआ था. बाद में तो वे जमने लगे थे और मुंबई में इतने व्यस्त हो गए कि सब बच्चे यहीं पैदा हुये. उनमें से कोई भी अपने गाँव के बारे में नहीं जानता. बेशक उन लोगों ने दर्जनों गाँवों को उजाड़कर शहर बना डाला था लेकिन साँवाँ के बारे में तो उन्होंने कभी किस्सों में भी नहीं जाना.

“अब क्या होगा भैया ? साँवाँ नाम तो हमने कभी सुना ही नहीं. बाबूजी भी क्या मांगे हैं, जो चीज हम जानते भी नहीं.” मझले बेटे आनंद बहादुर सिंह ने कहा तो बड़े बेटे अमर बहादुर ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया ---“नहीं आनंद, बाबूजी की इच्छा चाहे जिस चीज की हो वह हमारे लिए पत्थर की लकीर है. चाहे पाताल खोद देना पड़े. चाहे समुंदर छानना पड़े. उसे पूरा करना ही होगा. बाबूजी ने हमें इस हैसियत तक पहुँचाने के लिए इतना किया है कि हम उसकी कीमत नहीं दे सकते है दस जन्म में भी.” कहते-कहते वे भावुक हो उठे और आवाज रुँध गई. माहौल में उदासी भर गई. आनंद बहादुर ने अपराधबोध से गर्दन झुका ली. अचानक उनके बेटे खंग बहादुर ने कहा–“ गो टू गूगल डैड. विकिपीडिया पर यूं .....साँवाँ यूं ... ” उन्होंने चुटकी बजाते हुये कहा. पल भर में उदासी उम्मीद में बदल गई. अमर बहादुर सिंह ने अपने भतीजे को बड़ी हसरत से देखा. खंग बहादुर ने अपने मैनेजर को आदेश दिया- कांबले, अभी सक्सेना को फोन करो कि वह पूरा विकिपीडिया और नेट खंगाल डाले और साँवाँ के बारे में जितनी जानकारी मिलती है, तुरंत लेकर हाजिर हो.”

एक आदेश की देर थी. सक्सेना आनन-फानन में अपने लैपटॉप को खोल बैठा और नेट कनेक्ट कर के साँवाँ की तलाश करने लगा. वैसे तो मालिकान हमेशा कोई न कोई आदेश देते ही रहते हैं लेकिन इस अजीब सी चीज के बारे में सुनते ही वह समझ गया था कि यह कोई खास मामला है. सरकारी हों या असरकारी, सभी कर्मचारी ऐसी स्थिति में आकाश-पाताल एक कर डालते हैं.

सबसे पहले साँवाँ की अंग्रेजी ढूंढनी थी ताकि उसके बारे में विवरण तलाशा जा सके क्योंकि नेट पर अधिकांश जानकारियाँ इसी भाषा में होती हैं. दुर्भाग्य से सक्सेना को इतनी अंग्रेजी नहीं आती थी. उसने शब्दकोश का सहारा लिया लेकिन साँवाँ की अंग्रेजी नहीं मिली. फिर उसने हिन्दी में साँवाँ टाइप किया तो कई शीर्षक खुल गए. धोखा देने वाले अनेक शीर्षकों के बीच उसे साँवाँ के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी मिल गई- साँवाँ- एक अनाज जो भारत के कई हिस्सों में बोया जाता है. बस इतना ही. उसने अन्य शीर्षक खोला- मोटाञ्जा, साँवाँ, कोदो. आखिर वह झुँझला गया- क्या मुसीबत है. लेकिन मालिकान के सामने यह बात वह कैसे रखेगा. वे उसे नितांत गब्दू और नकारा समझ लेंगे. कहीं उसके वेतन को अधिक न समझने लगें. मुंबई शहर और यह महंगाई. बाप रे, कितना अच्छा होता कि इस समय वह किसी और जगह होता और यह काम वे लोग किसी और के मत्थे मढ़ते. लेकिन तभी उसे खयाल आया कि कंपनी से मिला मोबाइल और नेट सहित लैपटाप दिखाने के लिए नहीं मिला है. अब जाकर समझ में आया कि ये सब दरअसल मालिकान की सहूलियत के लिए हैं. आठों याम चौबीसों घंटे किसी भी आदेश को पाने और काम कर देने को बाध्य करने वाले यंत्र. चाहे जो हो अब तो सक्सेना को साँवाँ के बारे में जानकारी इकट्ठा करनी ही है. गलवा मत फुलावा बुढ़ऊ डोलिया ढोवै के पड़ी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Radha [radhavin2006@gmail.com] - 2013-08-30 07:10:59

 
  बहुत अच्छी कहानी है, बचपन याद आ गया. हमारे गांव में कोदा, सांवा होता था. बचपन में बहुत खाया था आज कहीं नहीं मिलता. 
   
 

दिगम्बर [] दिल्ली - 2013-05-11 20:11:59

 
  बहुत समय बाद एक बढ़िया कहानी पढ़ने को मिली. धन्यवाद रामजी भाई. 
   
 

रवीन्द्र कात्यायन [katyayans@gmail.com] मुंबई - 2013-05-02 19:26:45

 
  भाई रामजी यादव की कहानी कहानी नहीं, इक्कीसवीं सदी में विलुप्त होती भारतीयता, आम आदमी का पेट भरने वाले साधारण अन्न `साँवाँ` के माध्यम से प्रकट हुई विकास की विडंबना और किसान तथा ग्राम्य जीवन को विरूपित करने वाली व्यवस्था का बयान है. ज़मीन से जुड़ी हुई और समकालीन ग्रामीण यथार्थ को सबके सामने जस का तस रखने वाली यह कहानी इस बात का संकेत है कि अभी तो शुरुआत है... आगे-आगे देखिये क्या-क्या बचता है, क्या-क्या खोता है... बेहतरीन कहानी के लिए रामजी को बधाई... 
   
 

सुमन सारस्वत [] मुंबई - 2013-03-02 10:57:05

 
  एक शानदार कहानी के लिए धन्यवाद् रामजी यादव जी. विसंगतियों की त्रासदी का दस्तावेज है कि किस तरह गाँव से गाँव ही बेदखल हो गया है. शहरवालों को लगता है कि सभी दुर्लभ चीजें गाँव में मिल जाएँगी. मगर गाँव का रंग- ढंग निराला हो गया है.कितनी सहजता से आपने गाँव की कटु सच्चाई को अपनी कहानी के माध्यम से दर्शाया है. कथा-शैली,शब्द-संयोजन,घटनाओं का ताना-बाना,वाकय-विन्यास,चरित्रों का गठन ,भाषा-प्रवाह- सब कुछ आदर्श एवं अद्भुत है. एक लेखक को अपनी कथा का निर्वाह कैसे करना चाहिए,यह आपकी लेखन-कला का नमूना है. बधाई आपको ! 
   
 

Smt.Rashmi Nair [rashmi.nair67@gmail.com ] Mira Road - 2013-02-10 05:35:15

 
  अपने पिताजी की अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिए किए गए प्रयास वाकई प्रशंसनीय है. पर सांवा भात के बदले किसी और को सावाभात बताकर देना, एक विडंबना है. बड़ी मुश्किल होती है जब ऐसी अनोखी फरमाइश होती है. रामजी यादवजी को बधाई कि उन्होंने सच्चाई को बहुत खूबसूरती से दर्शाया है. 
   
 

manju [mishramanju79@gmail.com] katni - 2013-02-09 14:53:24

 
  ये कहानी आज के युवा को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का सहज और जीवंत उदाहरण है. परिवर्तन के परिवेश में हमारे बुजुर्गों और जीवंत उदाहरण है. परिवर्तन के परिवेश में हमारे बुजुर्गों और उनकी धरोहरों के लिए निष्ठा, कर्तव्य की पूर्ति सहित अब समय आ गया है कि हम अपनी नींव बचाने का प्रयत्न करें. 
   
 

Sudha Arora [sudhaarora@gmail.com] Mumbai - 2013-02-01 13:03:47

 
  यह कहानी साँवाँ जैसे विलुप्त हो चुके अन्न के बहाने उस पूरी संस्कृति के ही विलोप होने का संकेत देती है जिसे हम ग्रामीण संस्कृति कहते हैं . एक तरह से यह कहानी विलोप होती संस्कृति का विलाप भी है.इस कहानी में भूमंडलीकरण के बाद भारतीय किसानों पर लगातार गहराते संकटों के अक्स देखे जा सकते हैं . मसलन खेती में नकदी के बोलबाले के साथ ही बहुत बड़ी आबादी का खेती से भाग कर शहरों में शरण खोजना और अपनी स्मृतियों में बसी पुरानी चीजों को भी विस्मृत कर देनेवाली स्थितियों तक पहुँच जाना . जंगबहादुर सिंह जिन लोगों के लिए जिए वे लोग जब उनकी अंतिम इच्छा पूरी भी करते हैं तो पूरे छद्म के साथ . ज़ाहिर है वे इस बात से अनजान नहीं थे कि जो चीज वे अपने मरणासन्न पिता जंगबहादुर सिंह को दे रहे हैं वह साँवाँ नहीं है . लेकिन जब असली चीज गायब है तब भी अपराधबोध से वे सच नहीं बोल पाते बल्कि एक झूठ में मुंह छुपाने की कोशिश करते हैं . गाँव पर इतनी धारदार कहानियां बहुत कम लिखी गयीं हैं जो पढने के बाद ज़ेहन में दर्ज रह जाएँ ! कथाकार को बधाई ! 
   
 

Sudha Arora [sudhaarora@gmail.com] Mumbai - 2013-01-31 16:43:45

 
  इस कहानी में भूमंडलीकरण के बाद भारतीय किसानों पर लगातार गहराते संकटों के अक्स देखे जा सकते हैं. मसलन खेती में नकदी के बोलबाले के साथ ही बहुत बड़ी आबादी का खेती से भाग कर शहरों में शरण खोजना और अपनी स्मृतियों में बसी पुरानी चीजों को भी विस्मृत कर देनेवाली स्थितियों तक पहुँच जाना. साँवाँ जैसे विलुप्त हो चुके अन्न के बहाने यह कहानी उस पूरी संस्कृति के ही विलोप होने का संकेत देती है जिसे हम ग्रामीण संस्कृति कहते हैं. एक तरह से यह कहानी विलोप होती संस्कृति का विलाप भी है . जंगबहादुर सिंह जिन लोगों के लिए जिए वे लोग जब उनकी अंतिम इच्छा पूरी भी करते हैं तो पूरे छद्म के साथ. ज़ाहिर है वे इस बात से अनजान नहीं थे कि जो चीज वे अपने मरणासन्न पिता जंगबहादुर सिंह को दे रहे हैं वह साँवाँ नहीं है. लेकिन जब असली चीज गायब है तब भी अपराधबोध से वे सच नहीं बोल पाते बल्कि एक झूठ को प्रोजेक्ट करते हैं. गाँव पर इतनी धारदार कहानियां बहुत कम लिखी गयीं हैं जो पढने के बाद ज़ेहन में दर्ज रह जाएँ ! 
   
 

manju sharma [mnjs64@gmail.com] srinagar - 2013-01-31 11:33:34

 
  विकास अपनी कीमत मांगता है, हमारा देश विकास की जो कीमत चुका रहा है,उसके एक पहलू का सटीक वर्णन बहुत ही सहज,सरल,व रोचक शैली से किया है। कहानी पढने में बड़ा आनंद आया. साधुवाद.  
   
 

Manoj Krishna [manaujkrishna@gmail.com] Mumbai - 2013-01-30 12:14:42

 
  अद्भुत रचना है. हृदय से बधाई. दूसरी बार उसी उत्साह से पढ़ा. मैं इस कहानी से ज्यादा जुड़ाव महसूस कर रहा हूं क्योंकि मैंने सावां का भात खाया है. इसकी लहलहाती फसल को देखआ है. गाँव का परिवेश सचमुच बहुत तेजी से बदला है. गेंहू धान के अतिक्रमण के दौर में सावां गरीबों का अनाज मान लिया गया. बचपन में माँ बनाती थी तो कई बार अनख जाता था – नहीं खाऊंगा. ये 1984-85 की बात है. अगले पाँच साल में ये ही फसल गाँव से लुप्त हो गई. अब तो सिर्फ यादों में है लहसुन-मिर्च-नमक की चटनी, सरसों का तेल, सावां का भात. कभी-कभी आलू की रसेदार तरकारी. हॉस्टल से जाकर लौटने के बाद माँ को कहा कि वही भात बनाओ. मगर माँ कभी भी बना नहीं सकी क्योंकि सावां होता ही नहीं था. कहानी का मूल्यकथ्य न सिर्फ हमें झझकोरता है बल्कि ये सोचने पर मजबूर करता है कि इस तरक्की की बुनियाद में हमारी क्या-क्या बहुमूल्य चीजें दफन है. मुद्दे को संपूर्णता के साथ उठाया गया है. इस बहाने गाँव और शहर के बीच की कड़ियों को टटोला गया है. सूखती नदी, खोते संसार, टूटते रिश्ते, पलायन की टीस सब कुछ मुद्दे के जीवंत विस्तार के अनिवार्य अंग से लगते है. व्यक्तिगत तौर पर इधर कुथ सालों में इतनी शोधपरक, मूल्यपरक, गाँव और महानगर की तथाकथित प्रगति को एक प्लेटफॉर्म पर तुलनामात्मक रूप से लेके खड़ी कर देने वाली कहानी नहीं पढ़ी थी. एक बार फिर से धन्यवाद. 
   
 

amber [ambi.sidd@gmail.com] kolkata - 2013-01-25 14:31:12

 
  सांवां की खोज अपने आप में बहुत अद्भुत हो चली है. और उसकी खोज के बहाने गांव के वकृत होते चेहरे की बड़ी करीबी तस्वीर दिखाती है. बाबूजी के याददों के गांव यादों में ही जिंदा हैं. वास्तविकता की तस्वीर बड़ी सुंदर तरीके से रखी गई है कहानी में. Cultural Attack - Reverse Cultural Attack के बीच घूमती सुंदर और सहज रचना के लिए रामजी को बधाई. कुल मुला के कोदो देर दिया आपने सांवां खोजवा के. 
   
 

ravindra prabhat [ravindra.prabhat@gmail.com] Lucknow - 2013-01-25 13:32:41

 
  बहुत दिनों के बाद एक अच्छी कहानी पढ़ने को मिली है ....गाँव की समस्या का सही चित्रण ।  
   
 

lalitya lalit [lalitmandora@gmail.com] new delhi - 2013-01-25 04:18:06

 
  खूबसूरत रचना है भाई, बधाई.  
   
 

shashi bhooshan dwivedi [shashibd1@gmail.com] delhi - 2013-01-24 12:24:02

 
  लाजवाब कहानी है, बड़े दिनों के बाद एक अच्छी कहानी पढ़ी, रामजी को बधाई. 
   
 

राजीव कुमार [] देल्ही - 2013-01-23 11:37:01

 
  लाजवाब कहानी है! गाँव की फसलों के बेदखली की कहानी. तब जब हरित क्रांति का दिंधोरा पीटा जा रहा था. ग्लोबलाइजेशन और नियोलिबरल नीति के मध्य हरित क्रांति का सच तीसरी दुनिया का भूगोल भुगत रहा है... इसे एक सुगठित भाषा शैली में व्यक्त करने के लिए साधुवाद. 
   
 

malikrajkumar [] delhi - 2013-01-23 10:07:11

 
  वाह जन्मपत्री चल रही है , गाँव का हाल बुरा है. पर सावाँ नहीं है... वाह री विडंबना .. बहरहाल कहानी अच्छी बन पड़ी है. 
   
 

kanchan [kumari.kanchan617@gmail.com] bhopal - 2013-01-21 19:23:01

 
  कहानी दिल को छू गई. गांव कैसे खत्म हो रहे हैं, आपने उसका मार्मिक वर्णन किया है. 
   
 

kanchan [kumari.kanchan617@gmail.com] bhopal - 2013-01-21 14:34:30

 
  हरित क्रांति के बाद नकारात्मक पक्ष को बहुत कम लोगों ने लिखा. शायद ये कहानी इसे समझाने में सहायक होगी. मन को छू गई. 
   
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