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कुतुब एक्सप्रेस

पुस्तक अंश

 

कुतुब एक्सप्रेस: रामकुमार तिवारी

कुतुब एक्सप्रेस


कहानी संग्रह
प्रकाशक: सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरू मार्ग, दाउजी रोड, बीकानेर, राजस्थान
मूल्य: 200 रुपये.


पते की तरह

रमन ने बस में जलती हल्की नीली रोशनी में ऊंघते-सोते यात्रियों को गर्दन घुमाकर देखा. उसकी नज़र बायीं ओर खिड़की के पास बैठे आदमी पर अटक गई, जो सो नहीं रहा था, जाग रहा था. आदमी की आंखों में थकान, रात और नींद का कोई अंश नहीं था-एक नि:स्पृहता थी, जिसे देखकर रमन को अजीब-सी अनुभूति हुई. उसने आदमी के चेहरे से नज़रें हटा लीं और खिड़की से बाहर देखने लगा. बस हिचकोले लेती चली जा रही थी.

पस्ता फॉरेस्ट चेक-पोस्ट पर बस रूकी. सड़क किनारे, छोटी-सी हटमेंट में लालटेन टिमटिमा रही थी. हटमेंट के अंदर से हाथ में टार्च लिये फॉरेस्ट विभाग का कर्मचारी निकला. उसने बस के ऊपर चढक़र सरसरी तौर से जांच की. जांच के बाद बैरियर खुलते ही बस फिर चल पड़ी.

रमन ने पलटकर बायीं ओर खिड़की के पास बैठे आदमी की ओर देखा. वह उसी मनोदशा में बैठा था. रमन को तसल्ली हुई. न जाने क्यों, रमन को लगातार यह लगता रहा था कि जहां भी बस रूकेगी, वह उतर जायेगा और उसे पता भी नहीं चलेगा कि कहां उतर गया है. रमन फिर खिड़की से बाहर अंधेरे में छिपे आकारों को देखने लगा. वह वर्षों के बाद रामानुजगंज जा रहा था. अंधेरे में पस्ता के पहाड़ उभर आए. वह उन्हें अपलक देखने लगा.

रमन एक बार रामानुजगंज से अंबिकापुर जाते समय पस्ता में ही उतर गया था. वे बरसात के दिन थे. पहाड़ों पर बादल उतरे थे और पस्ता में चारों ओर उड़ रहे थे. सीढ़ीनुमा खेतों में धान की रोपाई हो रही थी. पानी ऊपर के खेतों से नीचे के खेतों में छोटे-छोटे झरनों की तरह बह रहा था. नम हवा में सरगुजिया गीतों के स्वर घुले थे. सीतापुर पाट की ओर से बगुले, पहाड़ों के नीले स्याह में झिलमिलाते, वर्तुल उड़ान भरते, खेतों में उतरकर छिप जाते थे. बीच-बीच में उनके उडऩे से धान के हरे में झक्क सफेद फड़फड़ा उठता था.

वह दिन-भर बादलों-सा उड़ता, पानी-सा बहता, धान-सा झूमता, गीतों-सा उठता घूमता रहा. शाम कब हो गई पता नहीं चला. उस दिन उसे शिशु की-सी अनुभूति हुई थी, जो मां की गोद में लेटा टुकुर-टुकुर चारों ओर देखता है और जिसे देखकर मां के चेहरे पर सुख की आभा छाई रहती है.

बस बलरामपुर में रूकी. बायीं खिड़की के पास बैठा आदमी परछाईं-सा उठा और अंधेरे में रहस्यमय ढंग से गायब हो गया, रमन देखता रहा गया.

रात के दो बजने को थे. ड्राइवर ने बस से नीचे उतरकर अंगड़ाई ली. उसकी चाय रोज की तरह ढाबे की भट्ठी में पहले से ही खौल रही थी. रमन ने भी भट्ठी के पास जाकर ढाबे वाले से अपने लिए एक चाय का संकेत दिया. भट्ठी से जलती लकड़ी खींचकर ड्राईवर ने बीड़ी सुलगाई. बीड़ी सुलगाते समय उसका चेहरा आग की रोशनी में किसी नाटक के किरदार-सा दिखा. बीड़ी सुलगाकर उसने लकड़ी को वापस भट्ठी में फेंक दिया. भट्ठी से आग की एक लपट भभककर अंधेरे में घुल गई. खुले में सर्द हवा बह रही थी. पत्तों की सरसराहट से रह-रहकर अंधेरा बज उठता था. किसी पक्षी की आवाज़ कहीं तैर जाती थी.

एकाएक दूर अंधेरे से स्त्रियों का सामूहिक रूदन सुनाई दिया. कैसा हृदय विदारक रुदन था, जिसने अंधेरे को चीरकर समय को दु:ख की ऐसी घड़ी में पहुंचा दिया, जहां सिर्फ दु:ख ही सत्य होता है. स्त्रियों का रुदन हमें कैसी वेदना में ले जाता है, जैसे उसे सहना ही जीवन की कथा हो और हम निरूपाय अपने होने से विस्मृत होते जाएं.

क्या बायीं खिड़की के पास उठकर चले गये आदमी का घर वहीं था, जहां से रुदन उठ रहा था? क्या उसके यहां से उसका कोई अपना बिना उसकी प्रतीक्षा किये हमेशा-हमेशा के लिए उसे छोड़कर चला गया और घर का दु:ख उसकी अनुपस्थिति में घर के लोग थामे रहे, जो उसको देखते ही फूट पड़ा?

हार्न की आवाज़ से रमन अपने में लौटा. उसने आवाज़ वाली दिशा में देखने की असफल कोशिश की, फिर बस में आकर बैठ गया. बस चल दी. वह खिड़की से उसी अंधेरे को देखने लगा, जिसमें मनुष्य के रुदन और दु:ख घुले थे और जिसमें बस से उतरकर बायीं खिड़की वाला आदमी खो गया था.

रमन बाहर देखते-देखते अपने अंदर डूब गया. जब हम पर दुख का पहाड़ टूटता है, हम अपने घर, परिजनों की ओर भागते हैं- एक-दूसरे को थामने, घर की दीवारों से टिककर, घर में घिरे शून्य में किसी के न होने को देखते हैं. धीरे-धीरे वही शून्य हमें अपने अंक में ले लेता है और हम उसी को पकड़े-पकड़े चलने लगते हैं. कुछ समय बाद, हमें पता भी नहीं चलता कि वही शून्य हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन गया है. शायद हम जीवन में इसी तरह खोते जाते और खो-खोकर पाते जाते हैं. एक दिन जब यह खेल हमारी समझ में आ जाता है, हमें बुद्ध की याद आने लगती है. हम अपने अंदर उस अव्यक्त को अनुभव करते हैं, जो चुपचाप दुखों को मौन में बांधकर, हमारे होने की सृष्टि में सहज बनाता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दीपेन्द्र कुमार शुक्ल [deependrashukla500@gmail.com] बिलासपुर - 2014-08-03 17:33:59

 
  सचमुच बहुत रोचक कहानी है। इस पुस्तक को पूरा शेयर किया जाता तो और अच्छा होता। क्योंकि कई पाठकों को पुस्तक उपलब्ध नहीं हो पाती या वे इतने मंहगें पुस्तक को खरीद नहीं पाते। क्योंकि मुझे भी यह लेख बहुत पसंद आई पर मुझे यह मिलेगी नहीं। 
   
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