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लाल्टू की तीन कविताएं

कविता

 

लाल्टू की तीन कविताएं

पढ़ो

(वेंडी डॉनिगर को समर्पित)

द हिंदू


तुम्हारी किताबें छीन ली जाएँगी
जला दी जाएँगी

पढ़ते हुए तुम बंजारा हो
घर गली मुहल्ले गाँव शहर राज्य
देश महादेश धरती ग्रह सूरज
तारों
तारा-मंडलों के परे
अंजान इलाकों में सैर करते हो

अनेक जो दृश्य दिखते
नहीं भी दिखते जो अनेक
अनेक जो आवाज़ें सुनतीं
नहीं भी सुनतीं जो अनेक
पढ़ते हुए तुम सराबोर खेलते हो

गीत गाते हो
नाचते हो झूमते हो।

दो

एक नहीं
रंग अनेक हैं
अनेक राग अनेक कण पराग
जो मिलता है सुर हमारा
वह एक नहीं बनता होता बहुधारा
अनेक पेड़ अनेक डाल हर एक डाल के अनेक पत्ते
अनेक दाने
अनेक पक्षी जो उन्हें चुगने आते

अनेक कविताएँ तुम्हारी लिखीं
अनेक तस्वीरें तुम्हारी आँकीं

तुम एक नहीं कोशिकाएँ अनेक खयाल हो अनेक
सिमटे नहीं एक में तुम हो विशाल हो अनेक

छीन ली जाएँगी अनेक किताबें छीने जाएँगे अनेक संसार
पढ़ो
और पढ़ो बार बार।

तीन

पढ़ते हुए
उमड़ आता है
तुममें प्यार
तुम हँसते हो रोते हो
जहाँ चल रही होती हैं जंगें
बीच में तुम जाकर नाचने लगते हो

तुम कृष्ण और तुम ही राधा
तुममें उफनता प्रेम

तुम बासु तुम ही यशोदा
वात्सल्य में खो जाते तुम
पढ़ते हुए जागते तुम्हारे अंदर
हकीकी और मजाज़ी प्रेत
सभी माँएँ सभी पिता बंधुश्च सखा
आ बैठते तुम्हारे अंदर

प्यार की हत्या की जाएगी
सभी पाठ छीन लिए जाएँगे।

14.02.2014, 02.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi ( Himachal Pradesh) - 2014-09-25 02:15:15

 
  ये कविताएं सांप्रदायिक विचारधारा का बौद्धिक और रचनात्मक प्रतिरोध हैं. 
   
 

Madhurima Prasad [] Allahabad - 2014-07-07 13:51:21

 
  कविताएं तीनों बहुत अच्छी हैं. गहन चिंतन को दृष्टि देती हैं. 
   
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