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अनवर सुहैल की तीन कविताएं

कविता

 

अनवर सुहैल की तीन कविताएं


एक

kavita


बेशक तुम नही बाँचोगे इन पंक्तियों को
बेशक तुम ऐसे जुते घोड़े हो जिसकी आँखों में पट्टियाँ बंधी हैं
बेशक तुम उतना ही सुनते हो जितना सुनने का तुम्हे हुक्म है
और महसूस करने का कोई जज्बा नही तुममे
और मुहब्बत करने वाला दिल नही है....

तुम इंसान नही एक रोबोट बना दिए गए हो
जिसपर अपना कोई बस नही
दूसरों के हुक्म सुनकर तुम दागते हो गोलियां
घोंपते खंज़र अपने भाइयों की गर्दनों पर
तुम्हारे शैतान आकाओं ने
आसमानी किताबों की पवित्र आयतों के तरजुमें
इस तरह तैयार किये हैं
कि कत्लो-गारत का ईनाम जन्नत-मुकाम है

ओ विध्वंस्कारियों
तिनका-तिनका जोड़कर
एक आशियाना बनाने का हुनर तुम क्या जानो
कब तक तुममे जिंदा रहेगा
आशियाने उजाड़कर खुश होने का भरम
क्या यही तुम्हारा मज़हब
क्या यही तुम्हारा धरम....

दो

जान लो मूर्ख बर्बरों....
अनपढ़-गंवार नही
अब विश्व-मानस
और कातिलों को
नही बर्दाश्त करेगा कोई

भले ही कितना तर्क-संगत करो
इन खूंरेज़ कारनामों को
इंसान अब भेड़-बकरियों का झुण्ड नही है
इंसान सूचनाओं के लिए अब तुम्हारी
ऊटपटांग व्याख्याओं पर निर्भर नही है
भले से तुमने चुराई हों पंक्तियाँ पवित्र किताबों से
अपने मन-माफिक उद्धहरण चुनकर
मासूमों की जान लेने के लिए
न्यायसंगत बनाने चाहते हो अपने दुष्कृत्य...

जान लो मूर्ख बर्बरों
अब तुम घिर रहे हो
अपने ही बुने जाल में
कि दुनिया में सीधी लडाइयां अब नही लड़ी जाएँगी
राजनितिक, कूटनीतिक, लोकतान्त्रिक तरीके से
आओ, कि इस रास्ते में इंसानियत का
बहता नही खून
और पवित्र किताबें
संदेह के घेरे में नही आतीं.......

तीन

उसकी आवाज़ में दम है
उसके पास ताकत है
मिरी खामोशियाँ अक्सर
मुझको पस्त करती हैं II

वो चाहे जो कहें उनको
कोई फ़तवा नही देता
मिरी सरगोशियों को
उनके खुफिया भांप लेते हैं II

लगा रहता हूँ फिर भी मैं
बुना करता हूँ तरकीबें
गढा करता हूँ तदबीरें
कि भाषा हो मिरी ऐसी
जिसे समझें हमारे लोग
न समझे वे अहंकारी.....

02.01.2015, 18.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित