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लाल्टू की चार कविताएं

कविता

 

लाल्टू की पाँच कविताएं


एक

प्यार


हमेशा प्यार करो खूब प्यार करो
एक स्त्री स्त्री से जितना प्यार कर सकती है
या एक पुरुष पुरुष से जितना प्यार कर सकता है
स्त्री और पुरुष परस्पर जितना प्यार कर सकते हैं
उतना प्यार करो.

दो

(खबर : समलैंगिकों को सामान्य बनाया जाएगा : गोवा के मंत्री)

मंत्री एक अश्लील शब्द है
इसे लिखना पड़ा इसके लिए मैं सबसे माफी माँगता हूँ

एक स्त्री स्त्री को प्यार करते हुए
उसके बदन पर फैल जाती है
और वक्त रुक जाता है
पुरुष पुरुष की नग्नता को
ज़मीं आस्मां में बुनता है
स्त्री और पुरुष कहानी कहानी कहानी

इतना प्यार करो कि हवा रुक जाए
पुरुष पुरुष का मिलन
धरती की करवटों में
उल्लास की हल्की चीखें बन गूँजता है
स्त्री स्त्री को पी जाती है
जैसे समंदर में नदी हों
स्त्री और पुरुष मिल कर एक नया लिंग बन जाते हैं

हमेशा प्यार करो खूब प्यार करो
ऐसे ही रहो
कंधों से नितंबों तक
प्यार की खरोंचों से भरी नई भाषा लिखो
उंगलियों को खुला छोड़ दो
कि वे हर रोएँ को बजा सकें
हर दर्रा हर घाटी तराश सकें

जब साथी का न होना तकलीफ दे तो उसे खुद में ढूँढो. रात-रात जग कर उसे ख़त लिखो - लिखो कि वह तुममें समाया है.

कहो कि साथिन मैं तुममें हूँ, इसलिए तुम दूर रहकर भी ज़िंदा हो. तुम ज़िंदा रहना कि मैं तुम्हें निगल जाऊँ जब तुम मुझे मिलो. जान, जानो कि मैं तकलीफ में हूँ, पर इस तकलीफ में भी मैं नाच रही हूँ कि तुम हो, तुम इस ब्रह्मांड में हो, तुम मुझमें हो.

इस भाषा में उस अश्लील शब्द को मत लिखना जो मंत्री है

तुम्हारे साथ
हवा, लहरें, पाखी, वक्त
हर कोई प्यार कर रहा है
हमेशा प्यार करो खूब प्यार करो.

तीन

वे जीवन को कैदखाना मानते हैं
कि आप को एक बिस्तर मिला है
उसी पर लेटे रहिए
जब तक कि शरीर के अणु परमाणु
विस्फोटों से गुज़र कर
अंतरिक्ष में खो न जाएँ

उन्होंने खिड़कियाँ भी बंद रखी हैं
कि उनकी बीमारी से हम बच न पाएँ
हम चाहत जैसे सुंदर शब्द को छोड़कर
उनकी अश्लीलता अपना लें

अब हम भी ऐसे कि हम तो
क़ैद में लेटे भी शरीर चाहते हैं
अपने शरीर के अहसास में जीते हैं
उसको जिससे हमें प्यार है
हम देते हैं अपना शरीर और मन
टुकड़े-टुकड़े.

चार

जहाँ अश्लील मंत्री रहें
हम उस इलाके में नहीं जाएँगे
हम समंदर में जंगल में
शहर की सड़कों पर
नंगे नाचेंगे कि
मुझमें जो स्त्री है वह स्त्री के साथ नंगी नाचेगी
जो पुरुष है वह नंगा गलबँहियों में लपेटेगा पुरुष को
हम छिपकलियों से एक दूसरे से चिपटे रहेंगे
स्त्री स्त्री से
और पुरुष पुरुष से
इस तरह हम होंगे खुले समंदर, जंगल और शहर की सड़कें
अश्लील खयालों वाले मंत्री को
कूरिए सेवा से दवा भेज देंगे
कि वह धीरे-धीरे प्यार करने लगे खुद को.

पाँच

सोचा था कि एक मौसम और इंतज़ार कर लें कि हालात बदल जाएँगे
मौसम दर मौसम इंतज़ार करते रहे
अब याद नहीं कि हम कैसे हालात चाहते थे
हम चाहते थे कि कविता में नए रंग खिलेंगे
हम चाहते थे कि हम प्यार के बारे में लिखेंगे

अब जो हो सो हो हमेशा प्यार करो खूब प्यार करो
एक स्त्री स्त्री से जितना प्यार कर सकती है
या एक पुरुष पुरुष से जितना प्यार कर सकता है
स्त्री और पुरुष परस्पर जितना प्यार कर सकते हैं
उतना प्यार करो.

13.02.2015, 18.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Kamal Jeet Choudhary [kamal.j.choudhary@gmail.com] Jammu,Samba - 2015-02-14 19:45:44

 
  लाल्टू जी मेरे प्रिय कवियों में से हैं. बहुत ही अच्छी कविताएं ... आभार. 
   
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