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तेज तूं- चित्रकार हकू शाह से बातचीत

तेज तूं

 

सुप्रसिद्ध चित्रकार हकु शाह से पीयूष दईया की बातचीत

 

 

जनवरी से जून, दो हज़ार सात के दरमियान पीयूष दईया द्वारा सुप्रसिद्ध चित्रकार हकु शाह के साथ उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पर एकाग्र लगभग सत्तर घंटों का वार्तालाप संपन्न हुआ था. उन्हीं वार्ता-रुपों से एक पुस्तक बनी- मानुष. यहां पेश है उसका एक अंश

 

 

 

 

 

 

 

अहमदाबाद में हिन्दू मुस्लिम दंगे शुरू हो गये थे. और गोधरा-कांड के दिनों में मेरा बेटा पार्थिव भी यही अहमदाबाद में था. जब हम दंगाग्रस्त इलाक़ों की ओर गये तो हमने मकानों को जलते और चारों ओर धुआं उठते देखा. माहौल बहुत तनावग्रस्त था. वह सब एक भयानक दु:स्वप्न था जिसकी वेदना अभी तक मेरे मन में है. यह एक ऐसा जख्म है जिस पर वार्ता करना भी मेरे लिए बहुत कठिन है. अपने अन्दर के पायो तक में स्वयं को विचलित महसूस करता हूं - ऐसा सुना था कि एक गर्भवती स्त्री के पेट से बच्चा निकाल कर मार दिया था यह अकल्पनीय है. हृदयविदारक है. क्यों नहीं सभी सम्प्रदायों के लोग आपस में मिल बैठ कर आनन्द से रहते, एक दूसरे के यहां खाना-पीना करते, मेलजोल रखते.

 

कई महीनों तक यह सिलसिला चला था. मैं बहुत अशान्त था और मेरे मन में बारबार यह आ रहा था कि मैं क्या कर सकता हूं कि क्या करूं. धर्म के नाम पर कलाकार के नाते सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का तो यह बहुत अच्छा अवसर था लेकिन मैं चुप रहा. इस तरह की पब्लिसिटी के खयाल मात्र से मुझे मितली आती है. फिरकापरस्त पैंतरेबाजी के बजाय इस गम्भीर मुद्दे को मैंने अपने चित्र-कर्म से जोड़ा और बतौर नागरिक यह अपना स्वधर्म समझा कि मैं साम्प्रदायिक तत्वों के प्रतिरोध में खड़ा होऊं, सीधी व सक्रिय हिस्सेदारी करूं.

कई सालों से मेरे मन में हिन्दू मुस्लिम की बात, झगड़े की, प्रेम की, धर्म की आती रहती है. लेकिन मानव में छिपी हिंसा व क्रोध का मुझे ज्यादा पता नहीं है. शायद मैं अभागा रहा हूं कि इसका अनुभव नहीं कर सका हूं. अपने जीवन में सारे समय मैं प्रेम, अपनापन व सद्भाव के बारे में ही सोचता रहा हूं. यह सच है - पता नहीं क्यों - कि मेरे चित्र-संसार में जीवन के निषेधात्मक पहलू ज्यदा नहीं आते जबकि यूं मेरा जीवन सामाजिक व मानवीय सरोकारों से एकमेक है. मुझे लगता है कि मनुष्य का मनुष्यत्व धर्म से भी ऊपर है. धर्म मानव को मानव बनाये रहने में साधन मात्र है, साध्य नहीं. धर्म के नाम पर हमने जितनी हिंसा की है वह पशु से भी बदतर है क्योंकि पशु को तो धर्म का साधन मिला नहीं है.

तब मेरा कलाकार मन लगातार विकल रहा और “हमन है इश्क” (2002) का बीज मेरे मन में अंकुरित हुआ. मेरी इस चित्र-प्रदर्शनी को हिंसक शक्तियों के विरूद्ध मेरे सविनय प्रतिरोध की तरह भी लिया जाना चाहिए. ऐसे भी आप देखें कि बहुत बार जब कोई व्यक्ति मुझसे बात करता है तो मैं बोलता हूं कि क्या आप वह सुन रहे हैं जो मैं बोल रहा हूं तो वह कहता है - “हां”. जबकि वह सिर्फ अपने बारे में बात कर रहा होता है-सिर्फ अपनी समस्याओं के बारे में. हम आपस में एक दूसरे को सुनते तक नहीं. लोग कहते हैं कि हां सुन रहे हैं पर वे सुनते नहीं. दोनों के बीच में संवाद जैसा होता ही नहीं.

हम बात करते हैं प्रकृति की और मसरूफ़/डूबे रहते हैं दूसरी चीज़ों में. हिंसा और क्रूरता की समस्याएं मेरे मन में आती हैं - करुणा का मथामण भी बहुत होता है कि मनुष्य ऐसा क्यों करता है, क्या करता है. इस सब का असर मेरे मन में बराबर बना रहता है लेकिन चित्रफलक पर जो होता है वह इससे भिन्न है.

अन्तत: ध्येय समान है कि दुखी हो या सुखी हो लेकिन मेरे चित्रों को देखकर देखनेवाला स्वयं को बेहतर महसूस करे.

मैं अमेरिका में न्यूयॉर्क में था जब मैंने टैक्सी ड्राइवर से कहा कि मैं वहां हारलेम जाना चाहता हूं. वह बोला-रात में दस बजे उधर कोई नहीं जा सकता. मेरा जवाब था- क्या आपको आदमी में आस्था/भरोसा नहीं. वह बोला-क्या आप भारतीय है मैंने कहा- “हां” तब वह मुझे ले गया और वहां जिनसे मुझे मिलना था वह एक अश्वेत लडका था जिसने एक गोरी लड़की के साथ शादी की थी. वे कवि थे. उन्होंने दरवाज़ा खोला और वह ड्राइवर तब तक इंतज़ार करता रहा जब तक कि मैं अंदर नहीं चला गया. यह बहुत सुंदर था.

तो मेरा कहना यह है कि सिर्फ़ हिंसा ही नहीं है, इस तरह के लोग भी है.

गांधी पर एकाग्र चित्र-श्रृंखला “नूर गांधी का मेरी नज़र में” के अपने पडाव के बाद जब “हमन है इश्क” का बीज मुझ में पनप रहा था तो मुझे लगा कि कला की पावन/हॉलिस्टिक दृष्टि में फिर से जाना चाहिए. आप देखें कि भारत की सामासिक संस्कृति व बहुलतावादी परम्पराओं में कितनी गहरी रचनात्मकताएं छिपी हैं जिन्हें हमने अभी तक ठीक तरह से पहचाना नहीं है. दूसरी एक बात मेरे मन में कला के विचार से जुड़ी हुई है. वह यह है कि कला के प्रति हमारा रूझान बहुत एकतरफ़ा है. इस मायने में आप देखे कि हमारी परम्परा कितनी समृद्ध रही है. संगीत चित्र से जुड़ा मालूम पड़ता है. मेरी नीरू बहिन हमेशा आख्यान पूरा गाती थी, रसोई करते समय.

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