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मीरांकालील समाज में स्त्री जीवन

विचार

 

मीरांकालीन समाज में स्त्री जीवन

माधव हाड़ा


(मध्यकालीन समाज में स्त्रियों की खराब हालत के विवरण देना बौद्धिक समाज में रिवाज बन गया है, जबकि वस्तुस्थिति एकदम अलग है. मीरां की जीवन समाज पर एकाग्र वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से सद्य प्रकाशित माधव हाड़ा की पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री का एक अंश) 
 

स्त्रियों के संबंध में मीरांकालीन समाज का नजरिया पर्याप्त गतिशील और द्वंद्वात्मक था. यह स्त्रियों की हालत और हैसियत के मामले में आदर्श समाज नहीं था जैसा कि कुछ पुनरुत्थानवादियों ने प्रचारित कर रखा है और यह उस तरह से ठहरा हुआ और पश्चिमी अर्थ में पूरी तरह पितृसत्तात्मक भी नहीं था जैसा कि कुछ अति उत्साही स्त्री विमर्शकार इसको साबित कर रहे हैं. इन दोनों ही पक्षों की मुश्किल यह है कि ये अपने निष्कर्ष निर्देशात्मक ब्राह्मण साहित्य और उस इतिहास से निकालते हैं, जिसका हमारी दैनंदिन सामाजिक वास्तविकता से कोई लेना-देना कभी नहीं रहा. यह सही है कि इस समाज में स्त्रियों की पूजा की बात केवल मिथ है.

लेकिन यह कहना कि वे केवल पुरुषों की संपत्ति थी, उनका केवल शोषण और उत्पीड़न होता था और उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे, पूरी तरह सही नहीं है. कुछ हद तक ऐसा भी होता था, लेकिन इसके साथ इस समाज में उनके सम्मान, सुरक्षा और संरक्षण की चिंताएं भी थीं. यही नहीं, इस दौरान स्त्रियां प्रभावकारी ढंग से सामाजिक और राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप भी करती थीं और कुछ हद तक उन्हें जीवन की स्वतंत्रता भी थी.

मीरां के समाज में कुछ हद तक पुत्र और पुत्री से संबंधित लैंगिक भेदभाव था, लेकिन यह समाज के सभी तबकों में एक जैसा नहीं था. उच्च जातियों, खास तौर पर क्षत्रिय जातीय समूहों में पुत्र का जन्म पुत्री की तुलना में प्रसन्नकारी था, क्योंकि इससे वंशानुगत अधिकारों को सुरक्षित रखने में सुविधा होती थी. इस कारण पुत्र की तुलना में पुत्री के जन्म पर होने वाला व्यय भी कम होता था. अठारहवीं सदी के उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार एक राज परिवार में माता के स्वास्थ्य तथा मांगलिक कार्यों के लिए 1760 ई में पुत्र के जन्म पर 7135 रुपए व्यय हुए, जबकि 1705 ई. में पुत्री के जन्म पर केवल 102 रुपए 11 आने व्यय किए गए.(93)

पुत्री का जन्म इस दौरान चिंताकारी था. सोलहवीं सदी की एक गद्य रचना में पुत्री के जन्म को घर-परिवार में चिंताओं का आगमन माना गया. इसमें कहा गया है कि जसु घर बेटी आवी, पूटि लागी चिंता आवीं.(94) मतलब यह कि जब घर में बेटी आती है तो उसके पीछे-पीछे चिंता भी आती है. लेकिन ऐसी धारणा समाज के सभी तबकों नहीं थी. यहां के कुछ द्विजजातीय समूह बेटियों का विवाह खासा धन लेकर करते थे, इसलिए वे इनके जन्म पर प्रसन्न होते थे. 1891 ई. की मरदुमशुमारी रिपोर्ट के अनुसार ये “अपनी समझोतरी बेटे की डोबका और बेटी को तारका कहते हैं डाबका के मायने डूबाने वाला और तारका के तिराने वाली के हैं.” (95)

रिपोर्ट में इस संबंध में आगे कहा गया है कि वे “बेटियों का रुपया ज्यादा लेते हैं खास करके बड़ी उमर की लड़कियां तो उनके लिए दौलत की खान हैं.... जितने खुश बेटियों के पैदा होने से होते हैं उतने बेटों के जनमने से नहीं होते इनकी यह कहावत है.’’(96)

मीरांकालीन समाज में विवाह से पूर्व संबंध या सगाई का रिवाज था. क्षत्रिय जातीय समूहों में संबंध के प्रस्ताव को टीका कहा जाता था. टीका वधू पक्ष की ओर पुरोहित आदि के साथ वर पक्ष को भेजा जाता था. इसमें भेजी जाने वाली वस्तुएं वधू पक्ष की सामाजिक हैसियत से तय होती थी. 1761 ई. में बीकानेर के शासक गजसिंह ने अपनी पुत्री के टीके में उदयपुर के शासक को एक-एक सोने और चांदी का नारियल, चौदह चांदी की और ग्यारह सोने की सुपारियां, एक हीरे-पन्ने आदि से जड़ी हुई कलंगी, पच्चीस जनाना वेष, एक हाथी, दस घोड़े, मिठाई और 100 रुपए नकद भेजे थे.(97) टीके का रिवाज दूसरी संपन्न उच्च जातियों में भी था. कृषक, व्यापारी, शिल्पी और सोपान क्रम की नीचे की जातियों में यह रिवाज नहीं था. इनमें संबंध का प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से वधु पक्ष को भेजा जाता था, जिसको रीत कहते थे. रीत में वर पक्ष वधू को एक तयशुदा धन राशि, वस्त्र आदि देता था.(98)

संबंध या सगाई को इस दौरान सामाजिक मान्यता प्राप्त थी और इसका उल्लंघन करने वालों को समाज या राज्य दंडित करता था. सगपण या संबंध क्षत्रिय जातीय समूहों दो तरह के होते थे, जिनको इकेवड़ा और दोवडा कहा जाता था. इकेवड़े संबंध में ये बेटी लेते तो थे लेकिन देते नहीं थे, जबकि दोवड़े सबंध मे बेटी देते भी थे और लेते भी थे. दोवड़ा सबंध बराबर वालों के साथ होता था. इकेवड़े संबंध में बेटीवाले डोला भेजकर या खांडे (तलवार) के साथ विवाह करते थे. उनमें संबंध का महत्त्व बहुत था. एक बार संबंध हो जाने के बाद इसे तोड़ा नहीं जाता था. उनमें कहावत है कि परणी छूटे पर मांग नहीं छूटे.(99)

 

विवाह की उम्र इस दौरान 8 से 21 वर्ष के बीच थी. क्षत्रिय जातीय समूहों में अन्य जातियों की तरह बाल विवाह नहीं होते थे. उनमें विवाह आम तौर पर सोलह से बीस वर्ष की उम्र में किया जाता था.(100) संबंध और विवाह वर-वधू की इच्छा से नहीं होता था. यह निर्णय घर-परिवार के बड़े-पिता, भाई आदि करते थे. वर-वधू की तलाश में चारण-भाटों का सहयोग लिया जाता था.(101) कुछ लड़कियां बड़ों द्वारा लिए गए निर्णयों का विरोध भी करती थीं. 1660 ई. में किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति ने अपने पिता की अवज्ञा का उदयपुर के शासक राजसिंह को विवाह के लिए निमंत्रित कर लिया था. बीकानेर के शासक सूरतसिंह की बहिन ने भी अपना विवाह नरवर के राजा के साथ करने का विरोध किया था.(102)

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