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वरुण की तीन कविताएं

कविता

 

वरुण शर्मा की तीन कविताएं


(1) बनमौली
(एक उड़िया शब्द जिसका अर्थ है “जंगल का फूल”)


हज़ार फुट गहरी कब्र में
सामूहिक रूप से गाड़ दो हमें
गहरा और गहरा
हम फिर बहार आयेंगे, ज़िन्दा.

हँसेंगे नहीं तुम पर
शोक मनायेंगे कि काश तुम भी साथ होते
तुम फिर भी सोचोगे- कि क्या छीन लूँ इनसे
और हम फ़िर खड़े हो जायेंगे, आओ छीन लो.

ये जो तुम और हम, दो हो गये हैं
रक्त का थक्का सा जम गया है
रुक रुक कर सांसें लेता हूँ
कब समझोगे की सांसें तुम्हारी भी रुक रही हैं.

अपने हिस्से की साँसों से तुम्हें जिन्दा रखे हुए हूँ.

(2) जन्मदाह

चिता की जलती हुई आग में दफ़न
पंचमहाभूतों की चिंगारियां उठा
चूल्हे में झोकूँ तो भूख मिटेगी
विज्ञान का कोई भी सिद्धान्त इसे सिद्ध करने का बल नहीं रखता.

राख में अटकी आग
कल में अटके हमारी तरह
घमण्ड में चूर है
अस्तित्व के, अतीत के.

अतीत जो राख है
आग देख सकती है आँखें खोलकर
पर एक सच देखना किसे पसन्द है
सौ जगमगाते झूठ जो हैं, मृगमरीचिका सी दीपावली मनाते हुए.

श्मशान में कुआँ पूजन करने आई नवमाता
चौराहे पर मिट्टी में पैर अटके थे
बुझी हुई राख के अनगिनत कण
मिन्नतें कर रहे हैं, हंस रहे हैं, रो रहे हैं
दे आई एक और राख के बोरे को पेट से निकाल कर.

माँ आज बहुत खुश है.

(3) डुबकी

तुम कितना भी सोच लो
महानता की पराकाष्ठा पार कर लो
सोच में तुम गांधी हो, मार्क्स हो, लेनन हो, चे ग्वेवरा हो
तुम हो वही जो तुम कर सको।

तुम सोचते हो
भिखारी को दस रुपये दे बड़े हुए
एक मिनट किन्नर को दे महान हुए
किसी सेक्स वर्कर की तरफ मुस्कुरा अमर हुए
पर तुम हो वही दो टके के भेड़िये, याद रखो।

तुम सोचते हो
गिरे हुए को उठा लोगे
डूबते हुए को बचा लोगे
सोचते हो सिरफिरे हो तुम
हाँ हो, लेकिन जब तक जान पर न बन आये खुद तुम्हारे।

तुम सोचते तो बहुत हो
सोच सोच में दुनिया जीत ली तुमने
निरंतर पवित्रता की अग्नि में जल भी लिये
पर तुम हो वही- जातिवादी, लिंगभेदी, रंगभेदी, धर्म और धंधे के कीड़े।

मत भूलो।

15.06.2015, 08.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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