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पत्नी का पत्र प्रेमिका के नाम

कहानी

 

पत्नी का पत्र प्रेमिका के नाम

पुष्पा तिवारी

पुष्पा तिवारी


प्रिय......

पता नहीं क्यों कलम तुम्हारा नाम नहीं लिखना चाह रही.शायद इस पत्र को देखते ही तुम सकपका जाओ या डर जाओ लेकिन घबराओ नहीं यह पत्र मैंने तुम्हें डराने धमकाने या मिन्नतें करने के लिए नहीं लिखा है. बल्कि मैं तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ.

मुझे अब तुमसे कोई ईर्ष्या नहीं. न कोई डर. अनजाने ही तुमसे एक नेक काम हो गया. तुमने मुझे मेरे खुद से मिला दिया. मुझे अपने औरतपन से परिचित करा दिया. वरना मैं तो 'मन फूला फूला फिरे जगत में' के बाद 'कैसा नाता रे' से परिचित ही नहीं हो पाती. तुमने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. अपने ही दिल की जिस आवाज को मैंने कभी मन के कुएँ में दफन कर दिया था......अब स्पष्ट सुन सकती हूँ. इंद्रियों के जंग लगे ताले खुल गए. खुद के पहचाने जाने की इच्छा जागृत हो चली है. मेरे अंदर के सारे डर समय समय पर फन काढ़कर रोकते रहते थे. आज मर चुके हैं. तभी तो निडर होकर तुम्हें पत्र लिख रही हूँ. हम 'मिडिल क्लास' औरतें बिना बात के डरने का स्वभाव लेकर ही पैदा होती हैं. तुम हमेशा मुझे ताना मारती थीं न ‘मिडिल क्लास मेन्टेलिटी‘ का.

हाँ, मैं मानती हूँ कि मैं मिडिल क्लास संस्कारों वाली औरत हूँ. मेरी दुनिया में उन मूल्यों की अहमियत है. लेकिन मध्यवर्गीय औरत होने का मुझे कोई अफसोस नहीं है. मिडिल क्लास की सीमित जिन्दगी, सीमित आकांक्षाएँ, सीमित सुविधाएँ हमें दूसरा चेहरा नहीं ओढ़ने देतीं. हमारे ही कंधों पर परिवार का स्वरूप बचा रह गया है. हम भले ही अपना मन मसोसते रहें लेकिन दूसरों के लिए जीने को आदर्श समझते हैं. तुमसे औरतें ईर्ष्या करती हैं क्योंकि तुम पुरुष मित्रों को आकर्षित करती हो. तुम्हें तुम्हारी थोड़ी देर की ये खुषियाँ मुबारक! फिर उन्हीं खुशियों की राख पर बैठकर रोती क्यों हो? तुम्हारे लिए तो कुछ भी स्थायी नहीं. न प्रेम, न उत्तेजना, न अवसाद. तुम चार दिन की चाँदनी में जीकर कितना अँधेरा बटोर लेती हो. दया आ रही है तुम पर. लेकिन मेरी खुदी किसी की दया स्वीकारने तैयार नहीं. हम बहुमत में हैं. हमारा सोच तकरीबन एक जैसा हो. बकौल तुम्हारे हममें कोई विशिष्टता नहीं. उससे क्या होता है?

दो अक्टूबर मेरी डायरी में भले ही काला दिन बन गया हो वैसे तो जन्मदिन है किसी का. मैं उसे कभी नहीं भूल पाऊँगी. जब बंद दरवाजों के अंदर की बात बाहर आ ही गई तब मेरा भी हक बनता है अपनी बात कहने का. अब तो यह भी समझ आ गया है कि शायद हम बुरी से बुरी स्थिति के लिए हमेशा तैयार रहते होंगे लेकिन जानते नहीं. अब तो लोग हमसे डरने लगे हैं.शायद तुम भी? मेरे रहते कुछ नहीं कर सकीं न तुम....न ब्लैकमेल.....न और कुछ. मुझे घुटन से बाहर निकाल कर तुम खुद घुटन के दायरे में अपनी असफलता के लिए रो रही होगी. तुम्हें तो ‘न माया मिली न राम.' वैसे यह बता दूँ ‘आहत अभिमान कभी शांत नहीं होता. साँप भले ही न काटे समय समय पर फुफकारता जरूर है. मुझे लगता है मेरी करुणा में ही हिंसा भी है. भले ही मैं खुद को हिंसक होने से बचाती रही हूँ. मैं तुम्हें सारी बातें नहीं लिखूँगी. यदि लिख दूँ तो उनका दंश शायद निकल ही जाए. लेकिन इस पत्र में वह सब जरूर कहूँगी जिससे हमारे जीवन में दंश आया है. मेरे लिए रिश्ते का अर्थ सीधा जुड़ाव ही रहा है जिसे यादों, घावों और तकलीफों को अपने कंधों पर लादने की जरूरत महसूस नहीं होती लेकिन ये रिश्ते......अनचाहे......तकलीफदेह......जिन्दगी पर बोझ बन जाते हैं. दीमक की तरह चाटते रहते हैं.

कितने गर्व से मैं अपनी जिन्दगी बखानती थी. लेकिन तुमने......नहीं...... तकदीर ने किस चौराहे पर लाकर पाथेय ही छीन लिया. कहीं कोई अपराधी वृत्ति होती होगी जो तुम जैसों को अपना दोस्त बनाए फिरती है. चलो अच्छा ही हुआ इसी बहाने हमारे विश्वास का लिटमस टेस्ट हो गया......और सोने का भाव मिट्टी मोल हो गया. इस टेस्ट के लिए तुम्हें ही धन्यवाद दूँ.

पता है, प्रकृति के विरुद्ध मैंने जब भी कोई काम करने की चेष्टा की किसी न किसी बहाने मुझे आघात ही मिला है. मेरा अहंकार (सुखी परिवार का) मेरा दर्प (अपने खुशहाल दांपत्य का)......सब......काफूर हो गये. भले ही मेरी हँसी खत्म हो गई लेकिन जीने का सलीका तो आ गया. इश्क में गाफिल लगते पुरुषों को आशिक बनाकर क्या किसी पट्टे से बांध लेती हो? बहुत समय तक वह होता कहाँ है? यह हम पत्नियों के बस में ही है किसी को जिन्दगी भर बांधे रखें. चाहे लड़ झगड़कर ही सही. वफादारी की ही कीमत होती है. तुम्हारे आशिक बहुत जल्दी पट्टा छुड़ाकर भाग जाते हैं (भगवान उन्हें ऐसी अक्ल सदा देते रहें.) तुम हमारे घर आकर देखो......कैसे बिना पट्टे के बांध रखा है. अब कहीं नहीं जायेगा साला......?

सच में तुम काबिले तारीफ भी हो. मैं क्या सभी मानते हैं तुम्हें. तुम्हारे सारे गुण नाचना, गाना, पाक विद्या में पारंगत होना और सबसे बड़ा वह गुण लच्छेदार बातों को कई भाषाओं में अपने 'शिकार' तक सुसंस्कृत तरीके से पहुँचाना. हम भी आपकी इस कला के कायल हैं. सोचते भी हैं कि काश इस कला का प्रयोग हम रोजमर्रा करते. लेकिन बकौल तुम्हारे हम वही......टेकन फॉर ग्रांटेड जो हैं. अपनी दिखाऊ भद्रता और गुड़पगी वाणी का प्रयोग तुमने हर पल जी भर कर किया. उसमें जंग न लग जाए, इसलिए उसे माँजती भी रहीं. अपने सारे गुणों को परोसना तुम्हें खूब आता रहा. और इन लटकों झटकों से ही रिझाती रही मर्दों को.

तुम 'प्रेयसियों' की जात भी अजीब होती है. औरत होकर भी कहाँ हो तुम औरत. तुमसे अच्छी तो वे रेड लाइट एरिया वाली होती हैं जो खुले आम लाइसेंसी होती हैं. किसी को उनके घर से नहीं बुलातीं. न ही किसी के घर जाती हैं. न......न......ये मत कहना कि तुम सच्चा प्यार करती हो. सच्चे प्यार में बैंक की पास बुक उपहार नहीं हो सकती. अपनी और अपने अलग अलग सरनेम वाले (गुप्त ही सही) बच्चों की बर्थडे पर कीमती तोहफे माँगने को क्या प्यार कहोगी? ऐसे में प्यार का सिर शर्म से झुक नहीं जाता? ऐसे प्यार में सच कितना है भला. मुझे लगता है सच्चे की जगह तुम्हें सुविधा शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए. जब बूढ़ी होकर अपने अतीत को कुरेदोगी और तुममें थोड़ी सी बसी रह गई औरत कितनी शर्मिन्दा होगी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

अरविन्द कुमार [tkarvind@yahoo.com] मेरठ - 2015-12-17 19:27:40

 
  एक सुन्दर और भाव विभोर कर देने वाली कहानी...पुष्प जी को बहुत बहुत बधाई...  
   
 

Vandana awasthi dubey [vandana.adubey@gmail.com] Satna - 2015-12-17 14:37:30

 
  "तुम प्रेयसियों की जात भी अजीब होती है, औरत होकर भी कहाँ हो तुम औरत...."
कमाल की कहानी है पुष्पा दी। बधाई।
 
   
 

आभा दुबे [] - 2015-12-17 12:24:52

 
  तुम मेरे जीवन का बोधिवृक्ष हो और यह घटना मेरे जीवन का सारनाथ बन गई है.
दूसरी पारी में कलम चलाई पर क्या खूब चलाई .बधाई
 
   
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