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मनोद शर्मा की दो कवितायें

कविता

 

मनोज शर्मा की दो कवितायें

मनोज शर्मा


शांति

शांति
बहुत बड़ी चीज़ है...
चाहिए, जैसी हो,सभी को...

अपने यहाँ
जितने हैं डेरे
बांटते हैं ठेके पे
शांति !

बहुत पहले
गुरू दिया करते थे
शांति के उपदेश
जो मुझे आज तक समझ नहीं आए
ता-उम्र बना रहा अशांत
और तलाशता रहा, शांति...
जैसे अमरीका तलाशता है हर जगह

जीवन-शैली में ... न
सरकारी कामकाज में... न
तो फिर उदाहरणों में ही..
.नहीं ,यह भी पूरी तरह सही नहीं
चलें ! अख़बारी कतरनों में ही ...

शांति!
ऐसी रसबरी होगी
जिसे अर्सा पहले
तालस्टाय ने तोड़ा
तथा सालों बाद
‘युद्ध और शांति ‘ लिखने से
रात भर पहले
पाश ने चखा ...

मैंने जिस दिन शिद्दत से
शांति चाही
मेरे पिता लगने लगे मुझे
गांधी जैसे...
वे, मेरे सपनों में भी
उसी चेहरे-मोहरे में आते
मैं
उन सर्द रातों में
पसीने से तर-बतर रहता

पिता
जो सिखाते थे छिपकर शराब पीना
पड़ोसी की सीनाज़ोरी पे
गिरेबान पकड़ना
छूट गए कहीं
उन रातों में मुझे
न चाँद नज़र आता, न तारे
दिखती केवल
गांधी की लाठी

बेशक, बड़ी चीज़ रही है
शांति!
वैसे हमारे यहाँ जिसे कहा जाता है
‘ सरदार ‘
देखा जाए तो ...
वह भी चढ़ा
फाँसी
इसी शांति के लिए ही ...!
( 23 मार्च से पूर्व ... )

यह रास्ता किधर जाता है

यह रास्ता किधर जाता है
वह खड़ा है और
पूछता है
यह सड़क क्या आगे तक जाती है
उसके साइकिल का पिछला चक्का पंचर हो गया है
साइकिल थामे
वह पूछता है
कोई आगे साइकिल ठीक करेगा क्या...

बियाबां है
और जैसे बियाबां में होता है
दूर-दूर तक पसरा है खालीपन
कि कोई राह नहीं सूझ रहा

बचपन में मां ने कहा
जब कुछ न सूझे
तो गाना गाओ
संगीत में होती है बहुत ताकत
पिता ने एक तारा दिखा
दिशा पकड़ना सिखाया
कुछ अध्यापक, कुछ दोस्त, कुछ पुस्तकें बताते रहे
रास्ता भूलने लगो तो खुद में तलाशो
पा जाओगे राह

मींह पड़ने लगा है
मिट्टी से उठने लगी है गंध मिट्टी की
ऊपर बहुत ऊपर दो बादल हैं
साइकिल को स्टैंड पर लगा
आसमान की ओर चेहरा उठा
पेशानी से टकराती बूंदों के बीच
उसने सोचा
यह ज़रूर कोई सपना होगा

पिता ने जो साइकिल दी तोहफे में
इतनी जल्दी कैसे पंचर होगी ...
भ्रम है यह बियाबां
मास्टर जी ने कहा भी है
बहुत काबलियत है उसमें
बनेगा आई.ए. एस. एक दिन

आकाश नीला बन हो चुका है झक्क साफ
एक चील मंडराने लगी है
सोचता है वह
काश मैं बादल होता
काश मींह
काश आकाश
काश यह साइकिल पंचर न होता !

17.12.2015, 15.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नरेश [] अहमदाबाद - 2015-12-18 15:07:48

 
  और भी संत्रस्त होते जाते समय में जब शांति एक छलावा है और रास्ता तो कहीं जाता ही नहीं, बस भटकाता है, मनोज की ऐसी कविता का हस्तक्षेप कुछ सांस लेने की फुर्सत जैसा है.  
   
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