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राजा जी

कविता

 

मनोज शर्मा की कविता

 

राजा जी

राजा जी, राजा जी
बजाया कैसा बाजा जी
भाजी तक को तरसे जनता
अपने खाएं खाजा जी
राजा जी,राजा जी ...

डरते-डरते रातें कटतीं
हर दिन गठड़ी लुटती-फटती
लाए योजना ताज़ा जी
राजा जी,राजा जी...

भक्तजनों की साख बढ़ी है
यश-कीर्ति तनी खड़ी है
इकतरफा बाजे गाजा जी
राजा जी,राजा जी...

मंडी,सराफा,फेरी,हाट तक
सर पटकें सब माथा धुनकें
फरमान नया फिर साजा जी
राजा जी,राजा जी...

इतने मसले, इतने जुमले
बात-बात बेबात निकलती
दबा आँख कहें, आजा जी
राजा जी,राजा जी...

18
.11.2016, 16.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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