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पुस्तक अंश | ध्रुव शुक्ल | एक बूंद का बादल

पुस्तक अंश

 

एक बूंद का बादल

ध्रुव शुक्ल की कविताएं

 

dhruva shukla

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर

suryaprakashan@gmail.com

मूल्यः एक सौ रुपये

 

 

अकेला पानी

अपने ही अथाह में
खोजता है अकेला पानी
छिपने की जगह रेत में

रेत नहीं छिपाती उसे
ठेलती रहती है गहराई की ओर

रेत से पानी
पानी से रेत
मिल रहे हैं ऐसे ही
न जाने कब से इसी तरह
बचाए हुए अपना प्रेम


शोकगीत
मौत की मोटर साइकिलों पर सवार युवाओं के लिए

हमने ही रखा था तुम्हारा नाम- शान्तनु


तुम्हें पुकारने के लिए
हमने ही रखा था तुम्हारा नाम-
शान्तनु !
अब तुम वहां चले गये
जहां हमारी आवाज़ नहीं जाती

अगर तुम हमारी ओर लौट सकते
तो हम भी कुछ दूर तक
तुम्हारी तरफ़ चले ही आते
पर अब हम क्या करें
तुम्हें कितना भी पुकारें
तुम अब हमारी सुनोगे नहीं
तुम तो बाहर ही चले गये
सब मौसमों से

हम यहां अकेले
ठण्ड में ठिठुर रहे हैं शान्तनु !
ओस की बूंदों की तरह तुम्हारी याद
सबकी आंखों से झर रही है.



तुम किसके सपने में चले गये शान्तनु !


आंखों में भर आया है इतना पानी
डूबते ही जा रहे हैं सारे सपने
ठिठकी हुई हैं पूरे कुटुम्ब की पलकें
ढह रहा है हमारे धीरज का पुल

पटरी से उतरे
खाली डिब्बों की खिड़कियों जैसे
देख रहे हैं हम एक-दूसरे को
नहीं मिल रहा हमारा खोया हुआ सामान

हमारे सपने की रेलगाड़ी से उतरकर
तुम किसके सपने में चले गये शान्तनु !

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjay maheshwari (sanjaya_fri@yahoo.com) indore

 
 very attractive and good news as well as message sure i am not philosopher but i tell clear in hearts very very nice. Thanks 
   

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