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वह सुबह कभी तो आएगी

विचार

 

वह सुबह कभी तो आएगी

लाल्टू


`जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी,' साहिर ने लिखा था. सभ्य समाज से बहुत सारी अपेक्षाएँ होती हैं. कोई भी सरकार सभी अपेक्षाओं को पूरा कर नहीं सकती, पर कई ऐसी बेवजह, ख़ामख़ाह की मान्यताएँ भी सरकार के बारे में हैं, जिनके बारे में सोचना चाहिए. जैसे कि सरकारें झुकती नहीं हैं. चाहे देश में महामारी फैली हो, कोई सरकार बाहर के लोगों का यह कहना पसंद नहीं करती कि उसे इस बारे में प्रभावी कदम उठाने होंगे. यह निहायत ही ग़लत रवैया है. इसके पीछे मानसिकता यह है कि दूसरे लोग हमें कमजोर और अयोग्य साबित करना चाहते हैं.

बलात्कार


उत्तर प्रदेश के बदायूँ में दो किशोरियों का बलात्कार और उसके बाद हत्या कर पेड़ पर लटकाए जाने की घटना पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने कह दिया कि हमारे देश में लगातार हो रही बलात्कार की घटनाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है. तो सरकार की प्रतिक्रिया क्या है - उन्हें पता होना चाहिए कि हमारे यहाँ न्याय की व्यवस्था है और उस मुताबिक प्रक्रियाएँ चल रही हैं.

प्रक्रियाएँ तो अनादि काल से चल रही हैं और स्त्रियों के प्रति हिंसा की घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं. इसके पहले सपा के मुलायम सिंह यादव ने लड़कों से ग़लतियाँ हो जाती हैं कहकर शर्मनाक बयान दिया. मुख्य मंत्री अखिलेश यादव भी अपनी चिढ़ दिखा गए. यह बौखलाहट यही बतलाती है कि हम ऐसे जघन्य अपराधों को प्रति संवेदनशील नहीं हैं. यानी कि सचमुच हमारी अपनी सच्चाई यह है कि हम अयोग्य हैं. शायद इसीलिए हम इस बात पर ज्यादा गौर करते हैं कि दूसरे लोग हमें बोलने वाले कौन होते हैं.

हरियाणा के भगाणा की दलित स्त्रियों की बलात्कार पीड़िताओं के पक्ष में धरने पर बैठे लोगों को दिल्ली पुलिस ने जबरन हटा दिया. काश कि सरकार के प्रतिनिधि वहाँ आकर उनसे मिलते और घड़ियाली सही दो आँसू बहा जाते.

काश कि सत्ता पर काबिज हमारे नेता पीड़ितों के साथ खड़े होकर कह पाते कि वे भी माँओं के जन्में हैं, कि उनकी भी बहन-बेटियाँ हैं, और वे इस ज़ुल्म के खिलाफ कदम लेंगे.

क्या हम कह सकते हैं कि अपनी कमियाँ मानने से शर्माए बिना सरकार चलाई जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी! अगर बु्द्धिजीवियों से पूछो तो वह कहेंगे कि हमारी संस्कृति में यह नहीं था, यह तो औपनिवेशिक काल की देन है. कुछ और हमें बतलाएँगे कि स्त्रियों के साथ हिंसा जैसी घटनाएँ तो दीगर मुल्कों में सरेआम होती रहती हैं. उन्हें हमारी ओर उँगली उठाने की जगह अपनी ओर देखना चाहिए.

होना यह चाहिए कि हम कहें कि यह गंभीर मसला है और किस भी इंसान के साथ हिंसा की घटना नहीं होनी चाहिए, हमारी स्त्रियों के साथ ऐसा होते जा रहा है तो हम उनके शुक्रगुज़ार हैं जो इस बारे में हमें सचेत कर रहे हैं. अगर उनके यहाँ भी ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम भी उनको सचेत करें. पर होता यह है कि हम अपनी कमियों को मानने की जगह अड़ने लगते हैं और कारण ढूँढने लगते हैं. और जो कारण ढूँढ कर हमें मिलते हैं उनका सचमुच सच्चाई से कुछ लेना देना नहीं होता.

चाणक्य श्लोकों से लेकर समकालीन साहित्य तक में स्त्री के प्रति अवहेलना के अनगिनत उदाहरणों के बावजूद हम मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा समाज पुरुषप्रधानता की विकृति से ग्रस्त है और स्त्रियों के प्रति हिंसा भी इसी बीमारी की देन है. दीगर और मुल्कों मे भी यही बीमारी है तो उसका मतलब यह नहीं कि हमें स्वस्थ नहीं होना चाहिए. या कि उनकी कमजोरियों का फायदा हम अपनी बदहाली को छिपाने के लिए करें. अव्वल तो आँकड़े यही दिखलाते हैं कि मावाधिकार के सूचकांकों में हम दुनिया के अधिकतर मुल्कों से पीछे ही हैं.

हिंसा का एक ही हल है कि हम व्यापक अभियान चलाएँ कि यह सही नहीं है. स्त्री को इंसान का दर्जा दिलाने के लिए देशव्यापी कार्यशालाएँ हों. हर किसी को, अपने आप को भी, चाहत और हिंसा के भेद को समझाने का लंबा अभियान हो. पर जिस देश में आधी जनता अनपढ़ है, वहाँ कार्यशालाएँ चलाना भी कौन सा आसान काम है. लिखित या मुद्रित सामग्री तो हर जगह काम आएगी नहीं. कम से कम हमारे जैसे पढ़े लोगों के लिए ही सही, ऐसी सामग्री का भी इस्तेमाल हो. बाकी लोगों के लिए दृश्य सामग्री और बातचीत से ही काम चलाया जाए. इस देश में जल्दी ऐसी सरकार तो आने से रही जो व्यापक पैमाने में प्रभावी साक्षरता फैलाने को प्राथमिकता माने. फिलहाल तो बस नारे और विज्ञापनों के अभियान हैं. इसलिए यह काम सरकारों के ऊपर छोड़ा नहीं जा सकता.

जैसा अक्सर कहा जाता है कि अगर हम अपने घर के बच्चों को ही इस बारे में सचेत कर सकें कि यौन हिंसा जघन्य अपराध है, तो बात आगे बढ़ेगी. अपने बच्चों से हम तभी बात कर पाएँगे जब हम स्वयं इस बात को समझें. यानी कि लड़ाई व्यक्ति के स्तर से ही शुरू होती है. अगर हम परिवारों में मौजूद हिंसा को छोड़ भी दें (जो कि जितना हम जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा ही होती है) तो भी आज व्यापक माहौल ऐसा है कि जो स्त्री हमारे घर-परिवार-जाति की नहीं है, वह भोग्या है. जी हाँ, हमारी संस्कृति में स्त्री का देवी होना सिर्फ बातों में है. व्यवहार में वह महज यौन-सामग्री भर है. परिवार के अंदर भी उसे भोग्याज की तरह इस्तेरमाल किया जाता है इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जो कि अपवाद मात्र नहीं हैं.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sheela [] nainital - 2014-08-23 11:12:09

 
  सरकार किसी भी कमी की जिम्मेदारी नहीं लेती, उसे केवल क्रेडिट लेना आता है, या कहें भाता है. जिम्मेदारी का भाव तो नहीं ही है स्त्री के प्रति संवेदनशीलता है कि नहीं तो शर्म कहां से आएगी? जब बहुत से नेता ही इन अपराधों को अंजाम देते हं तो और इसकी मुखालफत क्योंकर करेंगे? अपराधी मानसिकता अपराध को हवा ही तो देगी. 
   
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