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अब हिंदी की हैसियत बढ़ेगी

आलेख

 

अब हिंदी की हैसियत बढ़ेगी

राहुल राजेश


सत्ता के गलियारों में अंग्रेजी के बोलबाले के कारण हिंदी को लंबे समय तक लगातार सत्ता का तिरस्कार झेलना पड़ा है. लेकिन लगता है, अब हिंदी की हैसियत बढ़ेगी. साथ ही, अंग्रेजी की अकड़ भी कम होगी. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की केंद्रीय सरकार के गृह मंत्रालय ने अपने सभी विभागों को अब स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं कि गृह मंत्रालय का सारा कामकाज राजभाषा हिंदी में किया जाए. इतना ही नहीं, इसमें यह भी कहा गया है कि हिंदी में सर्वाधिक कामकाज करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत भी किया जाएगा.

हिंदी


गृह मंत्रालय ने 27 मई, 2014 को ही एक परिपत्र जारी कर सभी पीएसयू और केंद्रीय मंत्रालयों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी हिंदी को अनिवार्य कर दिया है. आशय यह कि अब अधिकारियों को हिंदी को सर्वत्र वरीयता देनी होगी और फेसबुक, ट्वीटर जैसी सोशल मीडिया पर भी अपनी टिप्पणी हिंदी में पोस्ट करनी होगी. गृह मंत्रालय के केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम विभिन्न विभागों एवं सार्वजनिक जीवन में हिंदी के प्रोत्साहन को प्राथमिकता देंगे क्योंकि हिंदी हमारी राजभाषा है और हमें अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा और विविधता के साथ तरक्की करनी है. उन्होंने यह भी कहा है कि हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के इस कदम को अन्य भारतीय भाषाओं को हतोत्साहित करने के रूप में कतई नहीं देखा जाए.

एक लंबे अंतराल के बाद या कहें कि ऐसा पहली बार हुआ है कि सत्ता की तरफ से हिंदी के पक्ष में इतने शानदार और जानदार संकेत मिले हैं और सरकार ने हिंदी की महत्ता और अपरिहार्यता स्वीकारी है. इससे यह भी साफ हो गया है कि यदि सरकार की मंशा स्पष्ट और सुदृढ़ हो और यदि सरकार चाह ले तो सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करना कठिन नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह हिंदी के प्रबल समर्थक रहे हैं और उनकी सरकार ने हिंदी के हक में जारी इन ताजा निर्देशों से अपनी मंशा और निष्टा स्पष्ट कर दी है.

वैसे इसकी शुरूआत 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से ही हो गई थी जब न केवल उन्होंने बल्कि राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, प्रकाश जावेड़कर आदि जैसे कई दिग्गज नेताओं समेत भाजपा के अधिकांश सांसदों ने हिंदी और संस्कृत में शपथ ग्रहण किया था. इससे इतना तो हो ही गया कि सरकार और संसद में हिंदी के पक्ष में एक सकारात्मक और उत्साहजनक माहौल बन गया. हिंदी के पक्ष में दूसरा प्रबल संकेत तब मिला जब प्रधानमंत्री ने यह साफ कर दिया कि वे अपने अमेरिका दौरे के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) में हिंदी में ही अपनी बात रखेंगे. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी दूसरे ऐसे भारतीय राजनेता होंगे जो यूएनओ यानी विश्व को भारत की राजभाषा हिंदी में संबोधित करेंगे. तीसरा संकेत तब मिला जब उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा में भूटान में हिंदी में ही संबोधित किया. और अब तो सरकार की तरफ से ही हिंदी के पक्ष में स्पष्ट निर्देश आ गए हैं.

अब देखना यह है कि सरकार में बैठे आला अधिकारी और उनके मातहत कार्य कर रहे कर्मचारी इन निर्देशों को कितना अमली जामा पहना पाते हैं. वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सख्ती और सामर्थ्य का इन पर सकारात्मक असर तो अवश्य पड़ेगा. वैसे सरकारी तंत्र में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो हिंदी के विरोध में और अंग्रेजी के पक्ष में वही पुराना तर्क फिर दुहराने की कोशिश करेगा कि हिंदी में काम करने की व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं. इनकी नजर में हिंदी में कामकाज का मतलब बस विभागों में नियुक्त इक्का-दुक्का राजभाषा अधिकारियों और चंद हिंदी अनुवादकों द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद भर है. लेकिन यदि पूरे कार्यालय में किया जाने वाला सारा कामकाज मूल रूप से हिंदी में ही करना अपेक्षित-अनिवार्य हो तो क्या चंद हिंदी अनुवादकों और राजभाषा अधिकारियों के बूते विभाग चलाना संभव होगा?

यहाँ यह भी समझने की जरूरत है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, पीएसयू और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों आदि में राजभाषा अधिकारियों और अनुवादकों की नियुक्ति मूलत: इसलिए की जाती है कि वहाँ राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और गृह मंत्रालय, भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा हर वर्ष जारी किए जाने वाले राजभाषा संबंधी वार्षिक कार्यक्रम की अपेक्षाओं के अनुपालन और कार्यान्वयन पर निगरानी रखी जा सके और हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देने में वे सुगमकर्ता (फैसिलीटेटर) की भूमिका निभा सकें. लेकिन प्राय: होता यह है कि कार्यालयों में हिंदी में कामकाज का सारा दारोमदार इनके मत्थे ही मढ़ दिया जाता है. जबकि राजभाषा नियम 1976 के अनुसार विभागों में राजभाषा संबंधी नियमों के अनुपालन का उत्तरदायित्व विभाग-प्रमुख का ही होता है!

यहाँ यह भी गौरतलब है कि भारत सरकार की राजभाषा नीति अबतक प्रोत्साहन, पुरस्कार और प्रशंसा के माध्यम से ही कार्यालयों में हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देती आ रही है. लेकिन इस लचीली और नरम नीति के कारण आजादी के 65 सालों बाद भी राजभाषा हिंदी को देश के सरकारी तंत्र में वह स्थान नहीं मिल सका है, जिसकी वह 14 सितंबर, 1949 से ही हकदार है. अब समय आ गया है कि इस राजभाषा नीति में बदलाव करते हुए इसमें प्रोत्साहन के साथ-साथ दंड का भी प्रावधान किया जाए, तभी सरकारी कामकाज में हिंदी को अपनाने का मार्ग प्रशस्त होगा और हिंदी में कामकाज को दीर्घ-अपेक्षित गति मिलेगी.

हिंदी में अपेक्षित कामकाज नहीं किए जाने पर वेतन-कटौती जैसे कड़े कदम भी उठाने की जरूरत आन पड़े तो वह भी किया जाए. जिन्हें हिंदी में कामकाज करने में कठिनाई हो, वे ठीक वैसे ही हिंदी पर भी पकड़ बनायें जैसे अंग्रेजी में कामकाज के लिए आरंभ से ही अंग्रेजी पर पकड़ बनाई थी. कहने की जरूरत नहीं कि हिंदी बेहद जानी-पहचानी, सरल-सहज और सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है, जिनपर अपनी मानसिकता बदल लेने मात्र और बस थोड़े-से अभ्यास से ही पकड़ बनाई जा सकती है. सहयोग और सहूलियत के लिए तमाम शब्दावलियाँ, शब्दकोश, अनुवादक और राजभाषा अधिकारी तो हैं ही!

जहाँ तक गृह मंत्रालय के हिंदी में कामकाज संबंधी इन ताजा निर्देशों पर तमिलनाड़ु के डीएमके प्रमुख के. करुणानिधि की आपत्ति का सवाल है तो उन्हें उनके अपने ही राज्य में तमिल की बजाय हिंदी में स्कूली शिक्षा देने की जोर पकड़ती माँग का संज्ञान लेने की ज्यादा जरूरत है. उनका यह तर्क भी निराधार है कि यह गैर-हिंदी भाषियों को दोयम दर्जे की तरह समझने जैसा है! अबतक तो हिंदी वालों को ही दोयम दर्जे का समझा जाता रहा है!

उन्हें यह भी समझने की जरूरत है कि अब पर्यटन, उद्योग और व्यापार को भी बढ़ावा देने के लिए हिंदी को अपनाना ही होगा. कारपोरेट जगत के दिग्गजों और विश्व के जाने-माने मैनेजमेंट-गुरुओं ने तो कंपनियों को पहले ही चेता दिया है कि अगर भारत में कारोबार करना है तो अंग्रेजी नहीं, प्रतिभा परखो! अभी-अभी संपन्न लोकसभा चुनाव के दौरान तमिलनाड़ु के ही पी. चिदम्बरम तो पहले ही पछता चुके हैं कि काश! मुझे भी हिंदी आती तो मैं भी बनारस में मोदी को टक्कर दे पाता!

21.02.2014, 16.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

विभु आनंद [] कोलकाता - 2014-06-23 07:50:07

 
  सच्चाई यह है कि तमिलनाडु में भी हिन्दी जानने, समझने और बोलने वाले अंग्रेजी की तुलना में अधिक हैं. हिन्दी का विरोध अंग्रेजी से नहीं है और भारतीय भाषाएं तो हिन्दी के समकक्ष हैं.हिन्दी भारत की संपर्क भाषा थी, है और रहेगी. राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार किया गया था जिसे अब तक क्रियांवित नहीं किया जा सका है. हिन्दी न तो उत्तर की मातृभाषा है और न ही किसी क्षेत्रविशेष की भाषा है. उत्तर में मातृभाषा के रूप में भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मगही, मागधी,हरियाणवी, मेवाती आदि बोली जाती है. हिन्दी एक विकसित भाषा है , जिसे मुंबई, कोलकाता,हैदराबाद,गुवाहाटी, ईटानगर, बंगलौर , अहमदाबाद, अमृतसर आदि पूरे देश में समझी और बोली जाती है. अच्छा हो कि राजनेता अपने प्रदेश और देश के व्यापक हित में सोचें और अपनी भाषा सहित हिन्दी और अंग्रेजी के अध्ययन - अध्यापन पर भी बल दें ताकि उनके प्रदेश की प्रतिभाएं पूरे देश और विदेश में भी अपनी लोहा मनवा सकें . यदि हो सके तो हमें सभी विकसित देशों की भाषाओं को भी सीखने के लिये बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए. हम आपस में लडते हैं और लडाने वाले हमें धर्म, जाति, भाषा, प्रदेश और वर्ण के नाम पर लडाते हैं. काश , ऐसा होता कि हमारी समझ में यह बात आ जाती कि ईश्वर एक है और सारी भाषाएं , मनुष्य जाति और समस्त प्राणियों का मूल ऊत्स वही है, वही है और वही है. तो हमारे सभी मतभेद और मनभेद समाप्त हो जाते.  
   
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