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जयशंकर प्रसाद काव्य काया | श्याम बिहारी श्यामल

उपन्यास अंश

 

काव्य काया

श्यामबिहारी श्यामल

जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित प्रकाश्य उपन्यास का अंश

 

जयशंकर प्रसाद ने झुके-झुके आहिस्ते हाथ बढ़ाया और सधी गति से एक चाल चल दी. प्रतिद्वन्द्वी कृष्णदेव प्रसाद गौड़ ने दृष्टि उठाकर भौंहें उचकायी और सिर हिलाने लगे. जवाब में प्रसाद मुस्कुराये और सीधा होते हुए बायें मुड़कर युवक की ओर देखा, ''...हां, बताइए बन्धु! कहां से, कैसे-कैसे आना हुआ ?''

'' जी, मैं सीतापुर से आया हूं! लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. करना चाहता था किंतु यह प्रबंध न हो सका इसलिए यहां आ गया... अब यहीं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लेना चाह रहा हूं.. ''

जयशंकर प्रसाद


'' बैठिये... बैठिये... खड़े क्यों हैं ? क्या पत्थर की इस चौकी पर बैठने में कोई दिक्कत होगी...''

'' ...ना-ना! ऐसा कतई नहीं... मैं तो इसकी यह नक्काशी और कलात्मकता को देख यों भी गद्गद हूं... इस पर बैठकर तो मुझे आनन्द की ही उपलब्धि होगी... '' आंखें फैलाये चौकी को निरखते हुए युवक आहिस्ते कुछ यों बैठने लगा गोया वह इस पर अपना भार न डालने की कोई जुगत सोच रहा हो.

प्रसाद मुस्कुराये, '' बन्धु, यह पाषाण है... यह पृथ्वी की कोख से पाता है जन्म... उसकी ममतामयी आत्मा सम्भव बनाती है इसके अस्तित्व को... अपनी करोड़ों वर्षों की धधकती एकाग्रता और सदाप्रज्ज्वला संकल्प-अग्नि के गर्भ से ! ...तन-मन यदि सजग हों तो इसका संस्पर्श-मात्र आपके ब्रह्माण्ड-मण्डल में कैसी उन्नत ऊर्जा और कितनी ठोस दृढ़ता का संचार कर रहा होगा, चाहो तो इसे अनुभूत कर सकते हो! ...''

युवक जैसे चमत्कृत! लगा, जैसे ज्ञानेन्द्रियां पहली बार एक साथ बहुस्तरीय अनुभव-उपलब्धियों की प्रवहमान धारा से सनसनाती हुई भरने लगी हों. जैसे, अचानक तेज वर्षा से मानस-वसुन्धरा आप्यायित! आनन्द से आन्दोलित प्रवाहित धारा में थिरकती गेंद की तरह. ...सचमुच पत्थर की चौकी पर बैठना विरल अनुभव से सम्पन्न करने लगा!

'' क्या है तुम्हारा शुभ नाम ? '' प्रसाद फिर बिसात पर झुक गये.

'' चंद्रप्रकाश सिंह ! ''

उन्होंने थोड़े चकित भाव से तीक्ष्ण दृष्टि उठायी. मुड़कर इस बार गौर से देखा, '' क्या कुंवर चंद्रपकाश सिंह तुम्हीं हो ? ''

'' जी! '' युवक साश्चर्य पत्थर की नक्काशी को हथेलियों से सहलाता रहा.

प्रसाद ने मुस्कुराते हुए फिर बिसात पर ध्यान गड़ाया. कुछ पल सिर हिलाते रहे फिर जवाबी चाल चल दी. गौड़ खिल उठे. यह देख वे सशंकित हो गये. सजग हो दूसरे ही पल उन्होंने फिर सिर गोत लिया. निगाह गड़ाते हुए. मननशील मुखमण्डल पर अफसोस की झलक खिंच गयी. मुंह से स्वमेव जीभ बाहर निकल आयी. उन्होंने जल्दी से अपनी चाल वापस कर ली. इस पर गौड़ तिलमिला उठे. संयत किंतु तीखे स्वर में प्रतिरोध भी जताया. प्रसाद ने इसे अमान्य करते हुए इनकार में सस्मित सिर हिलाया, '' आप तो केवल चाल सोच रहे हैं जबकि मैं इस युवा आगन्तुक से बात भी कर रहा हूं... इसलिए गलती से चली हुई चाल को तो मैं वापस ले ही लूंगा... ''

गौड़ तुनक गये, '' यह आपकी काव्य-सर्जना का मनमाना पृष्ठ नहीं है बाबूसाहब ...कि जब चाहा पीछे लौटकर किसी भी पूर्वलिखित वाक्य को छू-छेड़ लिया... यह बिसात है! यहां बढ़ा हुआ कदम पीछे नहीं लौटता! आपकी यह चाल-वापसी की चाल नहीं चलेगी! ...नो! नेवर! इट कैन नेवर जस्टीफाई! ''

प्रसाद उसी तरह इनकारी मुद्रा में सिर हिलाते रहे, '' गौड़ जी, आप अपने मन में रंज ला रहे हैं तो लाते रहें... यह शतरंज है इसमें ऐसे-ऐसे शत-शत; सौ-सौध्द रंज भी आप मन में उगाते और बाहर उगलते रहें तब भी मैं आपके इस मन:रंज को मनोरंजन ही मानता चलूंगा... ''

वाक्य पूरा होते-होते ही गौड़ के चेहरे का रंज भंग हो गया. वे ठठा कर हंसने लगे. हंसते गए, हंसते गए. मुस्कुराते हुए प्रसाद कभी उन्हें तो कभी आगन्तुक को ताकते रहे. गौड़ ने कहा, '' मान गया महाकवि! आप शतरंज को नहीं खेल रहे बल्कि शतरंज ही आपसे अठखेल कर रहा है... यहां मैं आपसे दो कदम आगे और एक कदम पीछे की चालों का नया छंद सीख रहा हूं... ''

प्रसाद फिर आगन्तुक की ओर उन्मुख हुए, '' ...युवा मित्र, हाल के दिनों में विभिन्न पत्रिकाओं में मैंने तुम्हारी कई सशक्त कविताएं पढ़ी हैं... ''

चंद्रप्रकाश संकोच से भीग गया. प्रसाद ने आंखें मूंद ली. कुछ क्षण यों ही मननशील रहे. आंखें खोली तो दृष्टि में विशिष्ट गाम्भीर्य-भाव मुखर हो उठा, ''...तुम्हारी रचनाओं में जीवंतता है! बड़ी बात यह कि तुम अभी छात्र हो और अभी से ऐसे रसीले-गठीले गीत रच रहे हो! यह तो बहुत अच्छी बात है! सच मानो, तुम्हारे कुछ गीत पढ़कर तो मन तृप्त हो उठा... बहुत प्रमुखता से तुम्हारे गीत 'माधुरी' व 'सुधा' आदि में स्थान भी पा रहे हैं... कुछ तो मुखपृष्ठ पर भी छपे हैं.. ''

चंद्रप्रकाश हिम-खण्ड की तरह पिघलता रहा. बिसात पर झुका हुआ गौड़ का एकाग्र मौन फिर ललकारने लगा तो प्रसाद फिर जूझने लगे. मौन के पंख फैलते चले गए. दोनों सिर गोते रहे. कुछ ही पल बाद दोनों ने ऐसा ठहाका फोड़ा कि मौन एक झटके से हवा हो गया. प्रसाद का वजीर कट चुका था. हंसते हुए वे गौड़ की पीठ ठोंकने लगे, '' वाह भई! आपने तो मेरे मंत्री को गिरा कर ही दम लिया... चलिए, राजा का हश्र अब तय हो गया इसलिए अब यहीं विराम! ''

'' अरे नहीं... शतरंज में कभी भी चाल पलट जाती है... आप ऐन क्लाइमेक्स में ही ऐसा कैसे कर सकते हैं...''

'' हां... वो तो हैं किंतु चलिये, हम यह मान लेते हैं कि आप ने दांव मार लिया! इसलिए ...फिलहाल इतना ही रहने दें ...फिर बाद में खेलेंगे! मैं अब जरा अपने अतिथि को ठीक से उपलब्ध हो लूं...'' प्रसाद ने दृढ़ता से कहा.

गौड़ मुस्कुराये, '' साधारण वजीर भला आपके किस काम का था ही? आपको तो भृत्य भी चेखुरा जैसा हाजिरजवाब और क्रांतिकारी चाहिए... ऐसे में आपका मंत्री तो ऐरा-गैरा चलेगा नहीं... हंस का मंत्री भला कौआ कैसे हो सकता है! आपको तो एकदम अनूठा-अनोखा मंत्री ही चाहिए न... इसलिए इस अटकु-लटकु वजीर का शहीद हो जाना ही अच्छा रहा...''
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

सविता सिंह [savitasingh.singh7@gmail.com] वाराणसी - 2011-11-04 08:26:20

 
  \'कंथा\' एक बेहतरीन उपन्‍यास है. श्‍यामल जी को बधाई. 
   
 

Afsar khan [] dhanapur-chandauli,up - 2011-06-11 01:47:42

 
  मैं श्यामल जी की लेखनी से पूर्व परिचित हूं. 10 साल के लंब अरसे की मेहनत के बाद यह महत्वपूर्ण रचना आई है. जयशंकर प्रसाद जी की जीवनी और उनके कृतित्व पर जितनी लेखक की पकड़ है, उससे ये साबित होता है कि इन्होंने पहले प्रसाद जी को जीया है, फिर रचा है. लेखक को साधुवाद और बधाई.  
   
 

Prof R.K. Dubey [rkdbxr@gmail.com] Patna - 2011-06-04 05:21:19

 
  श्यामल जी की इस शाश्वत और सृजनात्मक लेखनी ने जयशंकर प्रसाद जी पर जो दस्तावेज प्रदान की है वह भारतीय साहित्य जगत के लिए बहुमूल्य धरोहर है ! पूरा उपन्यास पढने की तीव्र लालसा जागृत हो गयी है ; यह लेखक की रोचक अभिव्यक्ति शैली की सार्थकता है ! \'\' बन्धु, यह पाषाण है... यह पृथ्वी की कोख से पाता है जन्म... उसकी ममतामयी आत्मा सम्भव बनाती है इसके अस्तित्व को... अपनी करोड़ों वर्षों की धधकती एकाग्रता और सदाप्रज्ज्वला संकल्प-अग्नि के गर्भ से ! ...तन-मन यदि सजग हों तो इसका संस्पर्श-मात्र आपके ब्रह्माण्ड-मण्डल में कैसी उन्नत ऊर्जा और कितनी ठोस दृढ़ता का संचार कर रहा होगा, चाहो तो इसे अनुभूत कर सकते हो! ...\'\' 
   
 

satyendra [] delhi - 2011-06-04 05:17:41

 
  बेहतरीन. पढ़ने पर कही से बोझिल नहीं लग रहा है. 
   
 

navneet pandey [poet_india@yahoo.co.in] bikaner - 2011-06-03 16:41:46

 
  जय शंकर प्रसाद मेरे प्रिय कवि हैं, उनके जीवन पर इतनी आधिकारिक कल्पना शक्ति और रोचक शैली में रचा यह कथानक पढने की उत्कण्ठा जगा रहा है, इंतज़ार रहेगा इस महत्त्वपूर्ण कृति का.. 
   
 

Shahid Akhtar [shazul@gmail.com] Ghazibad - 2011-06-03 09:47:57

 
  बहुत अच्‍छा लगा। बहुत रोचक शैली में प्रसंग पेश किया गया है और इससे उपन्‍यास पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ी है। उपन्‍यास का इंतजार रहेगा। 
   
 

बलराम अग्रवाल [2611ableram@gmail.com] दिल्ली - 2011-06-03 08:30:14

 
  हिन्दी के जीवनी कथा-साहित्य में इस उपन्यास को एक उपलब्धि कहा जाना चाहिए। आपने सश्रम एक अति-आवश्यक और कठिन कार्य को साधा है। मेरी ओर से शतश: बधाइयाँ। 
   
 

संजना गौड़ [] पटना - 2011-06-02 10:17:47

 
  आम तौर पर किसी उपन्यास को लिख पाना सरल होता है लेकिन अगर वह उपन्यास किसी तथ्य पर आधारित हो, किसी इतिहास के पात्र के सहारे खड़ा हुआ हो तो उसे साध पाना बहुत मुश्किल होता है. लेखक ने इतनी सहजता से उपन्यास लिखा है, जैसे काशी में वह उसी काल में निवास कर रहा था. बहुत-बहुत बधाई. 
   
 

Biju Toppo [] Delhi - 2011-06-02 10:10:47

 
  जयशंकर प्रसाद पर इतना सुंदर उपन्यास.... सच में मजा आ गया. यह उपन्यास अगर पुस्तकाकार अगर आये तो कृपया हमें जरुर बतायें. 
   
 

Mohan Rawal [rawalmohan2003@webdunia.com] indore - 2009-01-30 01:38:03

 
  बढ़िया! बहुत ही रोचक 
   
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