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किसके साथ किसका विकास?

विचार

 

किसके साथ किसका विकास?

प्रदीप शर्मा


यूं तो पिछले छह महीनों में दुनिया भर में कई ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएं घटी हैं, जिसके निहितार्थ पर बहस की गुंजाइश बनी और बची हुई हैं, लेकिन जिन दो घटनाओं की धमक लगातार बरकरार है, उसमें पहली घटना 15 अगस्त को घटी, जब देश के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार लाल किले के प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हुए स्वच्छ भारत के साथ-साथ ग्रामीण स्कूलों में शौचालय के अनिवार्यता की बात कही. सारा देश इस नग्न सत्य को राज प्राचीर से उद्धृत किए जाने पर एक झटके के साथ आश्चर्य मिश्रित सकते मे आ गया.

कृषि


कभी-कभी ही ऐसा मौका आता है, जब राजभवन के प्राचीर, गांव की पीड़ा को ध्वनित करते हुए कोई वाक्य उद्धृत करे. महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर उनके चरणो में ‘‘स्वच्छ भारत‘‘ अर्पित करने का महान संकल्प भी ध्वनित हुआ. महात्मा गांधी के प्रति अब तक की यह शायद सर्वाधिक महत्वाकांक्षी श्रद्धांजली होगी.

दूसरी घटना ठीक अगले महीने यानी सितम्बर मे न्यूयार्क शहर में घटी. संयुक्त राष्ट्रसंघ की आर्थिक एवं सामाजिक काउंसिल Eco-soc की अंतर्राष्ट्रीय बैठक आहूत की गयी थी. जिसमें सहस्त्राब्दि के उदय काल यानी 2000 में अपने समय के विश्व से बेहतर विश्व में जीने के संकल्प के साथ निर्धारित पन्द्रह वर्षीय (2015 तक के लिए) सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों एवं उपलब्धियों का मूल्यांकन एवं पुनर्निधारण किया जाना था. यानी कि 2000 में निश्चित मिलिनियम डेव्हलपमेंट गोल यानी MDG के लक्ष्यों की उपलब्धि का पुनर्मूल्यांकन एवं पुनर्रचना किया जाना था. उस वैश्विक बैठक में समस्त देशों के प्रतिनिधियों एवं विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले विशेषज्ञों ने भाग लिया और अपने-अपने अनुभवों को साझा किया. यूनिसेफ की स्टेट्स रिपोर्ट आई कि विश्व के 126 कम आय के देशों ने उपरोक्त सामाजिक सरोकारों की धन राशि में 44 प्रतिशत की कटौती कर दी है.

अधिकांश नीति निर्धारितों की यह राय थी कि वर्तमान के खस्ता हाल वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर मे सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य MDG जो सामान्यतः विकासवादी समानता प्राप्त करने के ऊपर आधारित है- के लक्ष्यों को पूरा करना लगभग मुश्किल ही नही बल्कि असंभव भी है. ऐसे में विकास की योजनाओं से उपजे असमानताओं को सिर्फ सामान्य जन की निःशुल्क भागीदारी यानी भारतीय संदर्भो में स्वयंसेवा के द्वारा ही दूर करने का प्रयास ही एक मात्र रास्ता है.

इसकी पृष्ठभूमि में जाएं तो सन् 2000 में निर्मित हुए इस मिलीनियम डेव्हलपमेंट गोल में विश्व के समस्त देशों ने यह तय किया गया था कि अगामी 15 वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, लिंगभेद, मातृत्व स्वास्थ्य, शिशु एवं मातृ-मृत्यु दर और टिकाऊ विकास जैसे सात विषयों में विकसित एवं विकाससील देशों के बीच की स्थितियों एवं आंकडों की भयानक असमान खाई को पाटा जाना चाहिए एवं उसके लिए निर्धारित लक्ष्य तय किये गए.

लेकिन ये स्वर्णिम घोषणाओ के वे दिन थे, जब उस अमेरिकन स्टाक एक्सचेंज का डाऊ जोन्स इंडेक्स 1994 के 3600 अंक से ऊपर चढकर सन 2000 के 11000 अंको को छू रहा था तब, जब अमरीका में बेरोजगारी की दर 4 प्रतिशत और जीडीपी का विकास 5 प्रतिशत था. विश्व अर्थ व्यवस्था को डॉट कॉम इकानॉमी ने अप्रत्याशित उछाल दे दी थी.

ब्रिक बैंक जैसी अवधारणा के पहले के वैश्वीकरण के इस दौर के दो पॉलिटिकल चियर लीडर्स श्री बिल क्लिंटन एवं टोनी बेयर गरीबी से लड़ने का एक ‘तीसरा रास्ता’ यानी सामाजिक मूल्य वादी पूंजीवाद की वकालत कर रहे थे और शायद इस बहाने राजनैतिक इतिहास के भविष्य में अपनी छवि के लिए स्थायी स्थान हेतु वैचारिक निवेश कर रहे थे. वह 2000 के सितम्बर का यह एक ऐसा दौर था तब जी 8 का प्रत्येक आशावादी नेता इस दूरगामी अभिपत्र पर अपने हस्ताक्षर करने को उत्सुक था. सिवा चीन के जिसने अमरीकी राष्ट्रपति एवं अनेक राष्ट्राध्यक्षों के इस सम्मेलन में शिरकत करने के लिए अपने प्रतिनिधित्व के लिए डिप्टी मिनिस्टर के रैंक के पदाधिकारी को भेजा था.

आज 14 वर्षों बाद जब पश्चिमी अर्थव्यवस्था का डबल-बबल इफेक्ट फूट चुका है और जब पश्चिमी अर्थव्यवस्था सर्वाधिक खस्ता हाल दौर से गुजर रही हो, अमरीका जैसे देशों में बेरोजगारी का स्तर दो अंको के दर को पार कर रहा हो, तब यूनिसेफ की 2014 की यह स्टेट्स रिपोर्ट चैकाती नहीं कि विश्व के 126 कम आय के देशों ने उपरोक्त सामाजिक सरोकारों के लिए उपलब्ध धन राशि में 44 प्रतिशत की कटौती कर दी है. ऐसे ध्वस्त समय के अर्थव्यवस्थाओं के दौर में जब नया सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य लिखा जाना हो तब न केवल ‘मनरेगा’ को चलाना बल्कि पूरे देश में व्यापक तौर पर साधे रखना, निश्चित ही विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत की एक बडी ऐतिहासिक उपलब्धि रही है.

महात्मा गांधी के नाम पर चल रहे इस सबसे बड़े रोजगार कार्यक्रम को सिकोड़ते हुए, देश के अंतिम आंगन में शौचालय एवं गलियों से लेकर कार्यालयों की धूल झाड़ने की बात को महात्मा गांधी से जोड़ने एवं प्राथमिकता देने से नयी सरकार ने अपने अभिप्रायो एवं प्राथमिकतओं को वैश्विक फलक पर नये आयाम के साथ स्पष्ट कर दिया है. सामान्यतः आविष्ट नेतृत्व अपनी मजबूरियों को, उत्तेजित घोषणाओं एवं महत्वाकांक्षी लगने वाले कार्यक्रमों में बदल दिया करता है. कई बार यह रणनीति निश्चित तौर पर राजनैतिक छवि में भारी पूंजी निवेश भी साबित होती दिखती है, खासकर जब आपके पीछे दूर तक राजनैतिक विकल्पहीनता हो.

हो सकता है कि महात्मा गांधी ने भी ऐसा ही महत्वपूर्ण एवं महात्वाकांक्षी प्रयोग अपने जीवन काल में किया हो. पर तब शायद उन्हें इस बात का अनुमान था या उनके वर्षों के संघर्ष की समझ ने, उनका आम आदमी के, देश हित में स्वयं सेवकत्व की क्षमता, का स्पष्ट आंकलन करा दिया था कि देश को समर्पित किये जाने वाला जन समय कितना होगा? एवं वह उसकी अपने स्वावलंबन को सीधे-सीधे तौर पर कितना मजबूत करेगा. शायद इसी ने न केवल एक तरफ चरखा और खादी को खड़ा किया बल्कि दुनिया की सबसे बडी अनुशासित स्वयं सेवकों की फौज कांग्रेस के झण्डे के तले खड़ा कर दिया था.

हालांकि नये नेतृत्व के दिन बहुत ज्यादा नहीं बीते हैं और मेक इन इंडिया का रॉयल बंगाल टाइगर, अभी-अभी मांद से बाहर आया ही है। तब देश के लिये थोड़ा सकून तो हो कि 100 दिनों में देश का नया नेतृत्व लगातार चुनौतियों के साथ पिछली सरकारों की तुलना में कम से कम संवाद करता तो दिखाई दे रहा है, जो अपने आप में भारतीय नेतृत्व के परिदृश्य के कई दशकों बाद घटी घटना है.

हालांकि ‘मेक इन इंडिया’ के उस कार्यक्रम में सरकार की नई योजना के साथ सहयोग की कसमें खाते ज्यादातर चेहरे वही दिखाई दे रहे थे, जिन्हें देश ने पिछले कार्यकालों में घटे 2जी स्पेक्ट्रम के और कोल ब्लॉकों के आवंटन के समय इसी तरह ‘नया भविष्य’, ‘नई छलांग’, ‘नया आर्थिक नेतृत्व’ जैसे जुमलों को उछालते देखा था. नये नेतृत्व के नये संवादों में स्वयंसेवा एवं स्वावलंबन का वह अंतर्संबंध, जिसमें करोड़ों ग्रामीणों एवं बीपीएल लोगों की भागीदारी व प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण सदुपयोग अभी तक झलकता नहीं दिखाई देता है.

इस समय में जब जीडीपी आधारित विकास के पैमानों पर आज के हिन्दुस्तान के विकास के पैमाने लगभग अमरीका के 2000 के दौर के आर्थिक सूचकांको की याद दिलाते हैं. तब हमें अभी डिजीटल इंडिया के ख्वाब में वर्चुअल गांव की जगह वास्तविक गांव की पेयजल की समस्याओं का हल निकालना पड़ेगा ही. नहीं तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं- जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं.

सामान्यतः ऐसा तब होता है, जब देश का नेतृत्व देश की वास्तविक स्थितियों जैसे- उत्पादन के माध्यमों का विकास, प्रति व्यक्ति उत्पादकता गुणांक एवं प्रति व्यक्ति के रचनात्मक समय का रोजगार में परिवर्तन जैसे पैरामीटर्स के बदले प्रति व्यक्ति निवेश, प्रति व्यक्ति विद्युत खपत एवं सड़को की लंबाई जैसे- सूचकांको के ऊपर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करता है. इन्हीं विकास के पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. एशियाई शेरों के घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनो का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.

30.09
.2014, 15.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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