पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > मुद्दा > राजस्थानPrint | Send to Friend 

मुश्किल में हाड़ौती के किसान

राजस्थान

 

मुश्किल में हाड़ौती के किसान

विजय प्रताप

कोटा से

 

 

बारां जिले के किसान भंवरलाल नागर इन दिनों बेहद परेशान हैं. उनके खेतों में धूल उड़ रही है और उन्हें सलाह दी गई है कि वे अब अफीम की जगह इन खेतों में गेहूं उगाना शुरु कर दें.

भंवरलाल कहते हैं- “पहले अफीम बोते थे, उसमें ज्यादा पानी की जरुरत नहीं रहती. उसकी सिंचाई टैंकर से पानी लाकर भी हो जाती लेकिन अब गेहूं के लिए ज्यादा पानी चाहिए होता है.”

अफीम की फसल

 

ज़ाहिर है, गेहूं के लिए उन्हें पानी मिलने से रहा और वे पिछले कई दिनों से इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें किसी तरह उनका पारंपरिक अफीम की खेती का पट्टा मिल जाए.

लेकिन भंवरलाल की आवाज़ नक्कारखाने की तूती बन कर रह गई है और भंवरलाल ही क्यों, हाड़ौती के हजारों किसानों की कोई सुनने वाला नहीं है. झालावाड़ और बाराँ के किसान सरकार से अब उम्मीद छोड़ बैठे हैं क्योंकि सरकार उनकी समस्याओं को हल करने के बजाय इस बाद में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है कि ये किसान इस मुद्दे पर खामोश हो जाएं. पिछले महीने के अंत में तो इस मुद्दे को लेकर कोटा में प्रदर्शन करने वाले किसान जब रात को सो रहे थे, तब पुलिस ने उन्हें बर्बरता से दौड़ा-दौड़ा कर मारा.

राजस्थान में पिछले पांच साल के वसुंधरा राजे शासनकाल में किसानों पर कई बार हमला हो चुका है. पानी-बिजली मांग रहे किसानों पर गोलियां व लाठियां चलना आम बात हो चुकी है. लेकिन सोते हुए किसानों पर ऐसा हमला पहली बार हुआ.

कोटा के नारकोटिक्स ब्यूरो उपायुक्त कार्यालय पर धरना देने आए किसानों पर रात करीब एक बजे पुलिस ने हमला कर लाठीचार्ज कर दिया. उस समय किसान बारिश से बचने के लिए आस-पास के स्कूल व मंदिर में सोए हुए थे.

हजारों की संख्या में जुटे यह किसान अपने रद्द अफीम के पट्टों की बहाली की मांग को लेकर 16 नवम्बर से ही यहां महापड़ाव डाले हुए थे. इसमें राजस्थान के पूरे दक्षिण पूर्वी क्षेत्र हाड़ौती के अफीम उत्पादक किसान शमिल थे. 19 नवम्बर को जोरदार बारिश की वजह से किसानों का टेंट सहित सारी व्यवस्था ध्वस्त हो गई.

सोये किसानों पर हमला

भारी बारिश व बढ़ती ठंड के कारण किसानों ने धरना स्थगित कर पास के प्राथमिक स्कूल और हनुमान मंदिर में शरण ले ली. रात करीब एक बजे अचानक पुलिस ने किसानों को वहां से खदेड़ने के लिए सोते किसानों पर हमला बोल दिया. इस हमले से डरे और आहत गरीब किसान अगली सुबह अपने-अपने गांव लौट गये.

लेकिन उनके सवाल जस के तस हैं और इनका जवाब किसी के पास नहीं है. चारों तरफ से हताशा में डूबे किसान अब आत्महत्या कर रहे हैं.

यह वे अफीम किसान हैं जो पिछले कुछ सालों से भूखमरी की जिंदगी गुजार रहे हैं. सरकारी तंत्र व उसकी लापरवाही के चलते हाड़ोती के दस हजार से अधिक अफीम उत्पादक किसान बेकार हो चुके हैं. पिछले दो साल लगातार ओलावृष्टि के कारण किसानों की खड़ी फसल बर्बाद हो गई. इस वजह से किसान नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा निर्धारित एक हेक्टेयर में 56 किलो औसत उत्पादन जमा नहीं करा सके. इसी को आधार बनाते हुए केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो ने क्षेत्र के अस्सी प्रतिशत किसानों के अफीम उत्पादन के पट्टे रद्द कर दिए.

केन्द्रीय स्तर पर यह फैसला लेते समय उन रिपोर्टों को भी दरकिनार किया गया जो जिला कलक्टर व तहसीलदार ने ओलावृष्टि से किसानों की फसल नष्ट होने की जांच के बाद जारी किए थे. रिपोर्ट में कलेक्टर ने माना था कि ओलावृष्टि के कारण क्षेत्र के किसानों की साठ से सत्तर प्रतिशत फसल नष्ट हो गई है. कोटा स्थित नारकोटिक्स ब्यूरो उपायुक्त कार्यालय ने यह रिपोर्ट ग्वालियर के क्षेत्रीय कार्यालय व नई दिल्ली के केन्द्रीय कार्यालय को भी भेजी. बावजूद इसके यहां के हजारों किसानों की रोजी रोटी का पट्टा रद्द कर दिया गया.

आत्महत्या की राह

अफीम उत्पादक किसानों का पट्टा रद्द करने का यह खेल काफी समय से चला आ रहा है. एक समय पूरे राजस्थान में 54 हजार से अधिक अफीम उत्पादकों को पट्टे जारी किए गए थे. लेकिन इस साल पूरे प्रदेश में केवल 18 हजार किसानों को ही अफीम उत्पादन की अनुमति दी गई.

किसान नेता जुगल किशोर नागर बताते हैं कि एक समय पूरे हाड़ौती में अकेले तेरह हजार से अधिक पट्टे थे, लेकिन आज केवल 4 सौ किसानों के पास अफीम उत्पादन के पट्टे हैं. श्री नागर कहते हैं- “ सरकार ने कई बहाने से हमारे पट्टे हड़प लिए और हमे बेरोजगार कर छोड़ दिया.”

संभाग के चार जिलों कोटा, बारां, बूंदी व झालावाड़ के अफीम उत्पादक किसान सेठ साहूकारों के कर्जे में ऐसे दबे हैं कि अब उनके सामने आत्महत्या ही विकल्प नजर आ रहा है. दो हफ्ते पहले ही दीगोद तहसील के ब्रह्मपुरा के बापूलाल के अलावा छीपाबड़ौद के रंगलाल व नारायण लोधा, झालरापाटन के गणेशपुर के कंवर लाल ने अपनी जान दे दी.

यह उल्लेखनीय है कि अफीम उगाने वाले किसानों का बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गृह नगर से आता है. मुख्यमंत्री झालरापाटन क्षेत्र से ही विधानसभा का चुनाव लड़ रही हैं. यहां संघर्षरत किसान भी झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से आते हैं. पांच साल मुख्यमंत्री रहते हुए भी राजे इन किसानों की मुश्किलें दूर नहीं कर सकीं.

झालरापाटन के किसान ओम प्रकाश आक्रोश के साथ कहते हैं- ''उनसे क्या उम्मीद करें. वह कहती हैं केन्द्र सरकार का मामला है. लेकिन हमे तो गेंहू उगाने के लिए भी पानी नहीं मिल पा रहा.''

अफीम उत्पादक किसानों का प्रदर्शन

तस्वीरः नीरज गौतम


फैसला नहीं, फैसले की मियाद

इस समय ज्यादातर किसान साहूकारों के कर्जे में दबे हैं. अफीम का पट्टा छिन जाने के बाद से उनके कमाई का कोई और जरिया नहीं बचा है. न ही उनके खेत इतने बड़े हैं कि वह भारी पैमाने पर कोई और फसल उगा सके और न ही इन क्षेत्रों में सिंचाई का कोई साधन है. कुछ किसानों ने गेंहू की फसल बोनी शुरु भी की तो पानी की कमी से पर्याप्त उत्पादन नहीं हो सका.

अफीम उत्पादक किसानों की पट्टा बहाली के लिए संघर्ष कर रहे अफीम उत्पादक हाड़ौती किसान संघर्ष समिति के सचिव महेन्द्र नागर कहते हैं –“ हम लोग पिछले दो सालों से संघर्ष कर रहे हैं लेकिन किसी राजनैतिक दल ने हमारा साथ नहीं दिया. हम इतने बड़े लोग नहीं हैं कि दिल्ली जाकर साहब लोगों को अपनी बात बता पाएं, इसलिय हम कोटा के अधिकारियों से ही निवेदन करते हैं कि वह हमारी मांग उपर के अधिकारियों तक पहुंचाए. हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे पट्टे फिर से बहाल हो ताकि हम सूकून की जिंदगी गुजार पाएं.”

कोटा में बैठने वाले नारकोटिक्स ब्यूरो उपायुक्त जी पी चंदोलिया भी किसान को मांग को जायज मानते हैं. लेकिन पट्टा बहाली के सवाल पर चंदोलिया का कहते हैं- “ इस समस्या का समाधान केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के स्तर से ही हो पाएगा. हमने कलेक्टर की रिपोर्ट व किसानों की मांगों को उन तक पहुंचा दिया है. अब जो भी फैसला लिया जाएगा, वह केन्द्रीय स्तर पर ही लिया जाएगा.”

लेकिन किसान इस चक्करदार सरकारी जवाब से संतुष्ट नहीं हैं. उनके लिए यह कोई जवाब नहीं है कि फैसला कहां लिया जाना है. उनकी दिलचस्पी इस बात में है कि यह फैसला कब लिया जाएगा.

क्या तब जब हाड़ोती के किसान भी विदर्भ की राह पकड़ लेंगे ?

01.12.2008, 03.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

yogesh (yogeshgupta_rbt@in.com) gurgaon

 
 Farmer union should go to a NGO and ask for action against officials, make this thing visible outside rajasthan then only this solution is possible. 
   
 

suhil raghav (raghav_sushil@rediffmail.com) Ghaziabad UP

 
 Yes. this is a very good story and this is the reality of the farmers. But the central and the state govt should not forget that the people of rajasthan are not weak and they can show their power to state govt like gujjar protest, so the farmer should not sucide and fight with the govt and than die so that other farmer of the world may be encouraged and learn how to take their right. Because the system of our india is rotten and to improve it farmers need to fight. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in