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कनक तिवारी | बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा

बहस

 

बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-तीन

कनक तिवारी


बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-एक

बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-दो

 

बस्तर के माओवादी

 

यह महात्मा गांधी ने कहा था कि अहिंसा वीर हृदय की प्राण वायु है. नक्सलवादी हिंसा में माओवादी पध्दति से विश्वास करते हैं. उन्हें अहिंसा और हिंसा के भेद से क्या लेना देना. वे तो भारतीय लोकतंत्र और संविधान में ही भरोसा नहीं करते. नक्सलवाद के मूल दस्तावेजों में शासन के विरुध्द एक जनयुध्द की परिकल्पना कनु सान्याल, चारु मजूमदार और जंगल संथाल वगैरह ने की होगी.

 

अब बस्तर और सरगुजा के नक्सलवादी (बल्कि माओवादी) खुद जनता से ही युध्द कर रहे हैं, यदि ऐसी जनता सरकार से मदद मांगती है. ऐसे में मौजूदा नक्सलवाद शासन व्यवस्था के खिलाफ एक विचारहीन विद्रोह के अलावा और कुछ नहीं है क्योंकि उसे सिध्दान्तों की अपेक्षा ज्यादा मतलब ठेकेदारों से चौथ वसूलने में है. वह स्कूलों और अस्पतालों को तहस नहस कर सकता है. आदिवासियों को घर जमीन से बेदखल कर सकता है. किसी की भी हत्या कर सकता है और कच्ची उम्र के बच्चों को जबरिया नक्सलवादी पोशाकें पहना देता है.

ऐसे अराजकतावादी तत्वों से निपटने के लिए भारतीय संविधान ने सरकारों का गठन किया है और उन्हें अनापशनाप शक्तियां भी दी हैं. सरकारों ने भी जन अभिव्यक्ति को कुचलने के नाम पर इतने कड़े कानून बना दिए हैं कि लोकतंत्र का लचीला पेड़ सूखकर ठूंठ बनने लगा है. सरकारों में अफसर होते हैं. पुलिस होती है. नेता होते हैं और इन सबको समन्वित करने वाले दलाल भी होते हैं.

 

ऐसे दलाल दृश्य और श्रव्य माध्यमों तक में अपनी कूंची से सरकार का उजला चेहरा तराशते रहते हैं. अफसर रौबदाब की कुर्सी से नीचे नहीं उतरते. जितने बड़े पुलिस अफसर होते हैं समस्याओं के मैदान से उतनी ही दूर होते हैं. नेता मौसमी होते हैं इसलिए अनुकूल मौसम में ही जीवित रहते हैं. दलाल अमरबेल होते हैं. इस पेड़ से उस पेड़ पर चढ़कर उसी पेड़ को चूस लेते हैं. एक दिन इस चंडाल चौकड़ी की चौपाल में एक नया रोबोट पैदा किया गया जिसका नाम रखा गया सलवा जुडूम. इसकी खासियत यह है कि यह जिस व्यक्ति के दिमाग से चिपक जाता है उससे अपने समर्थन में हुंकारी भरवा लेता है. दिमाग के जितने भी नए उपकरण निकले हैं उनमें यह सबसे ज्यादा आधुनिक है बल्कि उत्तर आधुनिक है.

छत्तीसगढ़ में चल रहे नक्सलवादी खून खराबे की शुरुआत के पीछे संविधान सम्मत मौजूदा लोकतंत्रीय सरकारी मशीनरी की असफलता तथा व्यापारियों द्वारा किया जा रहा शोषण प्रतीत होता है. ऐसे हिंसक विरोध से निपटने के लिए मौजूदा नजरबंदी कानून को लागू करने के बारे में जनविमर्श नहीं करना चाहिए था?

 

प्रदेश के दो बड़े और महत्वपूर्ण आदिवासी इलाकों में नक्सली गतिविधियां पड़ोसी प्रदेशों से आए नक्सली नेतृत्व में हैं. प्रतिभागी पूरी तौर पर स्थानीय आदिवासी हैं जिनकी संस्कृति और संपत्ति के अनुरक्षण के लिए संविधान में कई विशेष प्रावधान उपेक्षित पड़े हैं. सरकार ने जब छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम, 2005 पारित नहीं किया था, तब नक्सली अपराधों से निपटने के लिए क्या कारगर कानून, उपाय और हथियार नहीं थे? यह विवादास्पद अधिनियम बनाने के बाद राज्य की पुलिस और आयातित सशस्त्र बलों ने ऐसा क्या कुछ कर लिया है जो वे अन्यथा नहीं कर पाते. इस अधिनियम में ऐसे कई लोग पकड़े जा रहे हैं (और आगे भी पकड़े जा सकते हैं) जो नक्सली हिंसा में विश्वास नहीं करते होंगे, लेकिन इस विशेष अधिनियम के दुरुपयोग किए जाने से आशंकित होंगे.

 

वैसे भी अब तक के निवारक नजरबंदी कानून अपने मौजूदा स्वरूप में ज्यादा दिन तक तो जिये नहीं हैं, लेकिन मरने के पहले उनका अगले किसी अधिनियम में संशोधन के साथ पुनर्जन्म हो जाता है. लोहिया कहते थे कि व्यक्ति का हो न हो, इतिहास का तो पुनर्जन्म होता है. आतंकवाद विरोधी कानून इसी तरह पुनर्जन्म के इतिहास का हिस्सा हैं. टाडा 1985 से 23 मई 1995 तक जीवित रहा. पोटा 28 मार्च 2002 से 04 तक, मिसा 1971 से 1980 तक लेकिन युआपा 1967 से संशोधित हो हो कर जिंदा है.

 

युआपा सहित रासुका और अन्य कानूनों के रहते हुए भी छत्तीसगढ़ सरकार को नए अधिनियम की जरूरत क्यों पड़ गई? वह प्रकारान्तर से आदिवासियों द्वारा उनके जल, जंगल और जमीन को छीने जाने के अधिकार को भी खंडित करता है जिससे वे 'सलवा जुडूम' नाम के स्थायी होते जा रहे कैंप में नागरिक होने की गरिमा खोकर शरणार्थियों की तरह गुजर बसर करें अन्यथा यह नया अधिनियम उन्हें ठिकाने लगा देगा. इस अधिनियम की आड़ में पुलिस और सुरक्षा बलों के समानान्तर एक अदृश्य 'सलवा जुडूम सेना' भी गठित हो गई है जिसके सरगना अधिकतर गैर आदिवासी बताए जाते हैं. ऐसी हालत में यह अधिनियम वास्तविक आतंकवादियों को पकड़ने के बदले परिधि पर परेड करता हुआ पत्रकारों, डॉक्टरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, व्यापारियों और बेचारे दर्जियों तक ही पहुंचकर ऐंठ रहा है.

वैश्वीकरण के जमाने में होता यह है कि माल कैसा भी हो उसका कोई ब्रांड नेम या ब्रांड अम्बेसडर होना चाहिए. छत्तीसगढ़ में गांव गांव में भजिया खत्म हो गया और उसकी जगह धीरे धीरे मैक्डोनल्ड और किंग फिशर आ जाएंगे. दो या तीन रुपए के आलू बोंडा के बदले पचास रुपए का पोटेटो फिंगर्स का अमेरिकी दोना मिलेगा. मरार बेचारे तबाह हो रहे हैं और तथाकथित सबसे धनाढय भारतीय मुकेश अंबानी सबसे बड़ा मरार भी हो गया है. गांव गांव में लोहार खत्म हो गए और अपनी भूमिका बस्तर में टाटा और एस्सार को सौंप गए.

 

जंगल, संस्कृति, चार, चिरौंजी, मुर्गी, बकरी, तीखुर, जीरागोंडा खत्म हो रहे हैं और शराब के नए ठेकेदार, राजनीतिक दलाल, सूदखोर, जमाखोर, भ्रश्ट अधिकारी और भूतपूर्व होते होते भी अभूतपूर्व रहने वाले नेताओं का गिरोह जंगलों पर आसमान की तरह छा गया है. लेकिन ये सब तो गालियां हैं. ब्रांड अंबेसडर गाली नहीं हैं जैसे अमिताभ बच्चन का परिवार या शाहरूख खान या सचिन और धोनी होते हैं.

यह हैरत में डालने की बात है कि जो गांधी कभी बस्तर नहीं गया उसके नाम पर आदिवासियों ने लोक बोलियों में सैकड़ों गीत अज्ञात कवियों की कलम से लिख लिए हैं. अब सरकार तो होशियार लोगों की होती है, उसने सोचा कि सलवा जुडूम का ब्राण्ड अंबेसडर गांधी को ही क्यों न बनाया जाए. वह अधनंगा फकीर किसी आदिवासी बूढ़े की तरह ही तो दिखता है. वैसी ही लाठी टेककर चलता है और बकरी का दूध पीता है. खाना भी पेट भर नहीं खाता. उसे डराओ धमकाओ और मारो तब भी अपनी लाठी नहीं उठाता.

 

ऐसा ब्राण्ड अम्बेसडर बन जाने पर कोई आपत्ति भी नहीं करेगा क्योंकि उसकी पार्टी कांग्रेस को तो इस बात की भी चिंता नहीं है कि उसकी तस्वीरें उस संघ परिवार के कार्यालयों में कब से लटक गई हैं, जिस विचारधारा ने गांधी की हत्या की है. अब कोई पूछे कि जो गांधी अंग्रेजों के खिलाफ भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस तक को हथियार उठाने से मना करता रहा वह दैत्याकार पुलिस बल सरकार के पास होने पर भी गरीब आदिवासियों को बंदूक उठाने क्यों कहेगा जिसका घोड़ा दबाना तक उन्हें नहीं मालूम है. जो आदिवासी कोटवार, पटवारी और हवलदार के सामने शरणागत हो जाते हैं उनमें इतना अभय कैसे आ जाएगा कि वे उन नक्सलवादियों को चुनौती दें जिनके सामने पुलिस बल की हालत भी कई बार पतली हो जाती है. इस देश में गांधी हर मुसीबत की दवा है, मुसीबतजदा की नहीं. अत्याचार करने वाले की.

कोई नहीं कह सकता कि नक्सलवादी हिंसक नहीं हैं और यह भी कि उनकी हिंसा का दमन नहीं किया जाना चाहिए. एक सार्वभौम लोकतंत्रीय राज्य में यह सरकार का ही कर्तव्य है कि वह नागरिकों को इस तरह सुरक्षा प्रदान करे कि वह भारत के संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें. संविधान उन्हें इच्छानुसार रहने और देश में घूमने फिरने, बस जाने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है. यदि आदिवासी भाई और बहन स्वेच्छा से अपना घर छोड़ना चाहें और भारत में कहीं भी घूमना फिरना या बस जाना चाहें तो सरकार उनके इस निर्णय में आड़े नहीं आ सकती.

 

असल सवाल यह है कि सलवा जुडूम नामक अस्थायी लगता स्थायी शरणार्थी शिविर क्या किसी भी आदिवासी के आशियाने का विकल्प कहा जा सकता है? क्या आदिवासी समाज में इतनी जागरूकता, नयापन और अनोखे प्रयोग करने की इच्छाएं जाग गई हैं कि वह अपने शांत, एकाकी परिवार के वन परिवेश को त्यागकर हजारों हमसफरों के साथ सरकार द्वारा बनाए गए नकली परिवेश में असल इच्छाशक्ति के सहारे रहना चाहता है. लगता तो ऐसा नहीं है. इसको जानने के लिए आदिवासियों के समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, संस्कृति और नृतत्व विज्ञान के इलाकों से जो सूचनाएं मिलती हैं उन पर भरोसा करना चाहिए. यदि वे जबरिया वहां रखे गए हों तो वह तो बंधुआ मुक्ति आंदोलन जैसा दीखने में अच्छा लेकिन असर में बेकार आंदोलन जैसा भी नहीं है. यही कृत्य गांधी के अनुसार आदिवासी समाज के प्रति हिंसा से कम नहीं है.

समाप्त

 

04.12.2008, 11.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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