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पंचायती कानून को कुष्ठ

पंचायती कानून को कुष्ठ

आलोक प्रकाश पुतुल
रायपुर से


सरकार लाख दावा करे कि कुष्ठ और क्षय रोग का इलाज संभव है, लेकिन देश के क़ानून में इन बीमारियों का डर इस कदर समाया हुआ है कि आज भी टीबी और कुष्ठ रोगियों को अलग-थलग रखने के लिए पंचायत से लेकर रेलवे तक क़ानून की ऐसी-ऐसी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जिनका कम से कम अभी तो कोई अंत नहीं दिखता.

देश में ऐसे दर्जनों क़ानून हैं, जो इन रोगियों के साथ साफ तौर पर भेदभाव की वकालत करते हैं. हालत ये है कि कुष्ठ को ‘लाईलाज ’ बताने वाले क़ानून आज भी देश में धड़ल्ले से जारी हैं. क़ानून का भेदभाव मूक-बधिर लोगों के साथ भी बरसों से बरता जा रहा है.

कानून कर रहा है भेदभाव

देश के कई राज्यों में पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव में कुष्ठ रोगियों के उम्मीदवार बनने पर प्रतिबंध है. उड़ीसा में टीबी के मरीज को तो राजस्थान और कर्नाटक में मूक-बधिर पर भी यह प्रतिबंध लागू है.


राजस्थान, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में कोई भी कुष्ठ रोगी उम्मीदवार नहीं बन सकता. उड़ीसा के पंचायती राज क़ानून में यह प्रतिबंध क्षय यानी टीबी के रोगियों पर भी लागू है.

हद तो यह है कि अगर स्थानीय निकाय का कोई सदस्य या पदाधिकारी बाद में भी इनमें से किसी रोग से ग्रस्त हो जाए तो उसे अपात्र घोषित किया जा सकता है. वहीं आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तो मूक बधिरों के साथ भी भेदभाव करते हुए उन्हें पंचायत चुनाव के लिए अपात्र माना गया है.

भारत में कुष्ठ रोग का सबसे पहला मामला 600 ईसा पूर्व सामने आया था. सुश्रुत संहिता और वैदिक काल के ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है. कुष्ठ को छुआछुत से फैलने वाला रोग माना जाता था, इसलिए आप तौर पर कुष्ठ रोगियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था. कई मामलों में तो कुष्ठ की बीमारी फैलने के डर से कुष्ठ रोगियों की हत्या भी कर दी जाती थी.

1898 में कुष्ठ अधिनियम लागू करते हुए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि कुष्ठ रोगियों के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो. लेकिन सौ सालों से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी भारतीय क़ानून और नियम-क़ायदे ही कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव कर रहे हैं.

मध्यप्रदेश के पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 36 (1) (एच) के अंतर्गत संक्रमण फैलाने वाले किसी भी कुष्ठ रोगी को पंचायत का सदस्य नहीं बनाया जा सकता. हालांकि छत्तीसगढ़ में भी मार्च 2008 तक यह क़ानून लागू था लेकिन महीने भर पहले इस लेखक द्वारा राज्य सरकार के समक्ष इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद मार्च में इस प्रावधान को खत्म करने के लिए विधानसभा में विधेयक पारित कर दिया गया.

उड़ीसा नगरपालिका अधिनियम 1950 की धारा 16 (ए) (5) में यह प्रावधान रखा गया है. धारा 17 (1) (बी) में तो यहां तक कहा गया है कि अगर कोई सदस्य टीबी या कुष्ठ से संक्रमित हो जाए तो उससे उसके सारे अधिकार छीने जा सकते हैं. उड़ीसा ग्राम पंचायत अधिनियम की धारा 25 (1) (ई) में भी इसी तरह के प्रावधान हैं.

राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 1959 की धारा 26 (9) और राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 19 (एफ) में भी कुष्ठ रोगियों को चुनाव के लिए अपात्र माना गया है.

आंध्र प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 19 (2) (बी) में तो कुष्ठ रोगियों के साथ-साथ मूक-बधिरों को भी पंचायत चुनाव से बाहर रखते हुए उनके उम्मीदवार बनने पर रोक है.

कर्नाटक नगरपालिका अधिनियम 1976 की धारा 26 (1) (एफ) में भी मूक-बधिरों को नगरपालिका के लिए अपात्र घोषित किया गया है.


अगर आप कुष्ठ रोगी हैं तो आपको वाहन चलाने का अधिकार नहीं है क्योंकि 1939 का मोटर यान अधिनियम किसी कुष्ठ रोगी को लाइसेंस के लिए अपात्र मानता है. दूसरी ओर भारतीय रेल क़ानून 1990 की धारा 56 (1) एवं (2) के आधार पर किसी कुष्ठ रोगी को यात्रा के लिए अपात्र घोषित करने की छूट भी रेलवे को दी गई है.

देश के लगभग सभी विवाह व तलाक अधिनियमों में कुष्ठ को आधार बनाते हुए न केवल इसके आधार पर तलाक की व्यवस्था है, यहां तक कि विशेष विवाह अधिनियम 1954 में तो कुष्ठ को आज भी ‘लाईलाज ’ बताने से भी गुरेज नहीं किया गया है.

मानवाधिकार संगठन फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिग डॉक्यूमेंटेशन एंड एडवोकेसी के सुभाष महापात्रा कहते हैं- “ पूरे देश में कुष्ठ रोगियों के साथ जिस तरह का भेदभाव बरता जा रहा है, उससे साफ समझ में आता है कि हमारा समाज अब भी कुष्ठ रोगियों के मामले में बेहद निर्मम है.”

सुभाष का कहना है कि लगभग हरेक राज्य ने पंचायत और स्थानीय निकायों के क़ानून में भारी फेरबदल किए, लेकिन कुष्ठ का डर और कुष्ठ रोगियों के प्रति हिकारत की भावना ने कुष्ठ रोगियों को पंचायत चुनाव से बाहर रखे जाने के नियम को यथावत रहने दिया.


सुभाष पंचायत और स्थानीय निकायों में कुष्ठ रोगियों के साथ बरते जा रहे भेदभाव के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ और उच्चतम न्यायालय में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं.

04.05.2008, 00.37 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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