सुधीर सक्सेना की तीन कविताएं
साहित्य
सुधीर
सक्सेना की तीन कविताएं
डरपत मन मोरा
सुनो,
आकाश में जब भी गरजते हैं मेघ,
कड़कती हैं बिजलियां
मेरा भी मन डरता है
ठीक तुम्हारी तरह
प्रिया से दूर हूं मैं
इंद्रप्रस्थ में एकाकी.
अचानक देवत्व
अचानक
उसने कहा
उफ्फ, इत्ती गर्मी
कुछ करें
कि बारिश हो
अचानक
मैंने मन ही मन टेरा मेघों को
बुदबुदाये मेघों की स्तुति में मंत्र
आकाश से अचानक बरसा पानी
आकाश से बरसा अचानक झमाझम नेह
उसकी दृष्टि में
अचानक यूं
मैं अपने कद से बड़ा हुआ
प्रकृति की औचक लीला से
अचानक एक लौकिक पुरूष ने पाया देवत्व.
अच्छे है बुरे लोग
कोई जरूरी नहीं
कि जो लोग अच्छे नहीं हैं,
वे सबके सब बुरे हों,
और जो बुरे नहीं है,
वे सब के सब अच्छे हों
कतई जरूरी नहीं है
कि जो लोग अच्छे हैं,
वे पूरे के पूरे अच्छे हों
और जो बुरे है,
वे हद दर्जे के बुरे हों
बेशक यह खामखयाली है
कि बुरे लोग बस बुरे काम करते हैं
और अच्छे लोग फकत अच्छे
गिनाए जा सकते हैं बुरे लोगों के अच्छे काम
और बनाई जा सकती है अच्छे लोगों के
बुरे कामों की फेहरिस्त
अच्छाई अच्छों की बपौती नहीं है
और बुराई नहीं बुरों की चेरी
इस उत्तर आधुनिक युग में
विमर्श का विषय हैं
अच्छे लोग और अच्छाई
मगर साधुवाद के पात्र हैं
बुरे लोग
कि उनकी करतूतों से
इस बेहद बुरे वक्त में बुरी दुनिया में रहते हुए आज भी
हम करते हैं बुराई से नफरत
और इससे अच्छा दुनिया में भला
और क्या कर सकते हैं बुरे लोग?
04.12.2008,
11.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित