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रविवार | Raviwar | पाकिस्तान को भी नेस्तनाबूद करना चाहते हैं आतंकी

विचार

 

पाकिस्तान को भी नेस्तनाबूद करना चाहते हैं आतंकी

आसिफ अली ज़रदारी

 

 

हाल में मुंबई में नरसंहार से मेरे जेहन में 18 अक्टूबर, 2007 को कराची में तबाही की तस्वीरें कौंध गईं. तब मेरी पत्‍‌नी बेनजीर की वतन वापसी पर निकली रैली पर आतंकियों ने हमला किया था. इसमें करीब 150 पाकिस्तानी लोग मारे गए और 450 से अधिक घायल हो गए थे.

मुंबई में हमला अधिकांश देशों के लिए बड़ी खबर हो सकती है. मेरे लिए तो यह साझा अनुभव की दु:खद सच्चाई मात्र है. उस दिन कराची में मेरी पत्‍‌नी बाल-बाल बच गई, किंतु दो माह बाद दूसरे हमले में मैंने उन्हें खो दिया.

मुंबई पर हमला


मुंबई में हुए हमले में केवल भारत ही निशाने पर नहीं था, बल्कि पाकिस्तान की नई लोकतांत्रिक सरकार और भारत के साथ शुरू की गई शांति प्रक्रिया भी थी. टकराव बढ़ाने में पाकिस्तान में तानाशाही के समर्थकों और यहां के सरकार विरोधी तत्वों के स्वार्थ हैं. वे नहीं चाहते कि पाकिस्तान में परिवर्तन की जड़ें गहरी हों.

आतंकियों के इन इरादों को निष्फल करने के लिए दो महान शक्तियों भारत और पाकिस्तान को शांति प्रक्रिया के कदम जारी रखने चाहिए. ये दोनों देश एक ही आंदोलन और 1947 के जनादेश की उपज हैं. मुंबई पर आतंकी हमले से पाकिस्तान सदमे में है. हम भारत की तकलीफ महसूस कर सकते हैं. मैं खासतौर से व्यथित हूं. मैं जब भी अपने बच्चों की आंखों में झांकता हूं तो यह दर्द महसूस करता हूं.

पाकिस्तान इस जघन्य हमले में लिप्त सभी लोगों की गिरफ्तारी करने, उन पर मुकदमा दर्ज करने और उन्हें सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, किंतु हमें जल्दबाजी में किए गए फैसलों और भड़काऊ बयानबाजी से बचना होगा. यह रविवार को डाले गए छापों से स्पष्ट हो गया, जिनमें आतंकियों को गिरफ्तार किया गया. पाकिस्तान अपनी भूमि पर मौजूद गैर सरकारी तत्वों को अपराधी, आतंकी और हत्यारे करार देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई करेगा. आतंकी किसी भी रूप में सरकार से संबद्ध नहीं हैं. हम तो खुद उनके निशाने पर हैं और लगातार उनका शिकार बन रहे हैं.

भारत एक परिपक्व और स्थिर लोकतंत्र वाला देश है. पाकिस्तानी भारत के लोकतांत्रिक योगदान की सराहना करते हैं, किंतु मुंबई हमले से गुस्से की आग भड़काने के बजाय भारतीयों को थोड़ा संयम बरतना चाहिए. भारत, पाकिस्तान और शेष विश्व को मिलकर उन आतंकियों का सफाया करना चाहिए, जिन्होंने मुंबई में मारकाट मचाई, न्यूयार्क, लंदन और मैड्रिड पर हमला किया और सितंबर में इस्लामाबाद में मैरियट होटल तबाह किया. मेरी पत्नी की हत्या करने वाले आतंकी उसी विचारधारा से संबद्ध हैं जो सभ्यता के शत्रुओं की है.

ये आतंकी कल्पनालोक की उपज नहीं हैं. शीतयुद्ध के दौरान पाकिस्तान पश्चिम का सहयोगी रहा. विश्व ने अफगानिस्तान में सोवियत सत्ता को बेदखल करने के लिए पंथ का इस्तेमाल किया. कट्टर उग्रवादियों को ताकतवर बनाकर उन्हें महाशक्ति के विनाश के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया. यह रणनीति कारगर रही, किंतु इसकी विरासत में घातक उग्रवादी तत्व पैदा हो गए.

पाकिस्तान इसकी लगातार कीमत चुका रहा है- तानाशाही की बपौती, धर्मोन्माद, नागरिक समाज का विखंडन और लोकतांत्रिक ढांचे का विनाश. इस सबसे गरीबी बढ़ती चली गई, जिसने उग्रवाद भड़काने में ईंधन का काम किया.

ताकतवर आतंकी तंत्र को ध्वस्त करना एक बड़ी चुनौती है. पाकिस्तान में पैर जमाते लोकतंत्र को शेष विश्व से मदद की दरकार है. हम आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अग्रिम पंक्ति में हैं. हमारे डेढ़ लाख सैनिक पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान और अलकायदा से युद्धरत हैं.

इस वर्ष दो हजार से अधिक पाकिस्तानी आतंकवाद का शिकार बन चुके हैं. इनमें 1400 नागरिक और 600 सामान्य सुरक्षाकर्मी से लेकर थ्रीस्टार सितारे वाले जनरल तक शामिल हैं. इस साल पाकिस्तान में हमने लगभग 600 आतंकवादी कारनामों को झेला है.

विश्व को पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र को मजबूत करने, नागरिक समाज का निर्माण करने और आतंक विरोधी क्षमता बनाए रखने में मदद करनी चाहिए.


हमारे आक्रामक हमलों ने अफगानिस्तान सीमा पर कबिलियाई और पश्तून बहुल इलाकों में आतंकियों को भारी नुकसान पहुंचाया है. लगभग 600 चरमपंथी इस साल पाकिस्तान में मारे गये हैं. सैकड़ों चरमपंथी तो अकेले पिछले 2 महीने में मारे गये हैं.

आतंकवाद क्षेत्रीय के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय खतरा भी है और इससे लड़ने के लिए एकजुट होना जरुरी है. हम मुंबई हमलों के बाद भारत के घरेलू राजनीतिक हालात को समझते हैं, फिर भी पाकिस्तान की संलिप्तता के आरोपों से पहले से उलझे हालात और जटिल हो सकते हैं.

भारत, पाकिस्तान और अमेरिका की मुंबई जनसंहार पर सबसे उपयुक्त प्रतिक्रिया यही हो सकती है कि आतंकवाद के खात्मे में वे आपस में सहयोग करें. विश्व को पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र को मजबूत करने, नागरिक समाज का निर्माण करने और आतंक विरोधी क्षमता बनाए रखने में मदद करनी चाहिए. इसी से हम प्रभावशाली ढंग से आतंकवाद का मुकाबला कर सकते हैं.

एक बार बेनजीर ने कहा था कि तानाशाही से सबसे बेहतरीन प्रतिशोध लोकतंत्र है. आज की तारीख में भारत-पाक में टकराव पैदा करने और अंतत: सभ्यताओं में संघर्ष के लिए प्रयासरत विध्वंसक ताकतों से बदला लेने का माकूल उपाय मेल-मिलाप कायम करना है.

 

10.12.2008, 11.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशि
 

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

abhijeet (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Both country india and Pakisthan should provide better opertunity to progress for putting them in mainstream to their minorities[specially muslim in India and Hindu in Pakistan].We also need a globle awareness for condition of Kashmiri Pandit.THESE ARE SOME SOLUTIONS IF WE NEED SOME REDICAL CHANGE,OTHERWISE SITUATION WILL NOT IMPROVE. 
   
 

ASHVIN PATEL FRANCE

 
 DEAR SIR HONERABLE
YOU SAY THAT AJMAL KASAB IS NOT PAKISTANI? ALL THE TERRORIST IS COMING FROM PAKISTAN.JEHAD IS YOUR VIEW. ONLY MUSLIM IS YOUR BROTHER AND ALL THE TERRORIST CAMP IS IN PAKISTAN.ISI AND MILLITERY OF PAKISTAN ALSO INVOLVED IN FACTORY OF TERRORIST BECOUSE YOU DO NOT LIKE INDIAN PEOPLE WHY ? BECOUSE YOU NOT LIKE INDIA BETTER PROGRESS. GIVE PERMISSION INDIA IF YOU CAN NOT FINISH TERRORIST CAMP IN PAKISTAN.
 
   
 

pramod kumar chandel (pramodkumar_chandel@yahoo.com) sagar(mp)

 
 अब हम सब लोग ऊब गए हैं. भारत सरकार राजनीति से बाज़ आए. वरना जनता बहुत मारेगी. देश को जागना होगा. सारे फसाद की जड़ हम हैं. देश में आतंक देश में सेना का गलत इस्तेमाल. हम तो कायर हो गए हैं. कल ऐसा ना हो सेना भी बिगड़ जाए तो क्या करोगे. कारगिल झेला अब फिर बंकर. नेता सेना से कह रहे है देखो कुछ करो मत हम नई पीढ़ी को क्या दिखा रहे हैं बुजदिली, कायरता. पाकिस्तान तो जो कर रहा है विश्व जानता है. ईराक क्या था. सद्दाम हुसैन की तानाशाही का ये आलम था की भारत में घर घर में उसकी फोटो लगी रहती थी. अमरीका ने मार दिया तो सभी भूल गए वरना वो हीरो था. अब उसका निशान भी नहीं दिखता. नाम भूल गए लोग. अतः मर मर के जीना बंद करो. नेता कूटनीति करो तो जनता तैयार रहे. नेता ना माने तो जूते से मारो. 
   
 

sunil srivastava (sunil_sri75@yahoo.com) lucknow

 
 जरदारी साहब अगर आप वाकई में आतंकवाद का खात्मा चाहते हैं तो पाकिस्तान की जमीन से तत्काल आतंकी शिविरों को नेस्तानाबूद कर दीजिए नहीं तो आने वाले समय में यही आतंकवादी आपको यानी पाकिस्तान को ही नेस्तानाबूद कर देंगे. अभी वक्त है आप, गिलानी और कियानी तीनों लोग सच्चाई ही स्वीकार कर ले नहीं तो आने वाला दिन पाक के लिए कहर बनकर टूट पड़ेगा. 
   
 

pran sharma (pransharma@talktalk.net) coventry,uk

 
 एक मुहावरा है, लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं. पाकिस्तान को पूरी तैयारी से आतंकवाद को कुचलना होगा. ये उसके अपने हित में भी है. 
   
 

Kumar ashish Mujaffarpur, Bihar

 
 जरदारी साहब, आपने पाकिस्तानी राष्ट्रपति होने के नाते केवल अपनी बात रखी है, अपना सयापा रोया है. आपको अपनी बेनजिर का जाना रुला रहा है लेकिन मुंबई में जाने कितनी संभावनाओं का कत्ल आपने करवाया है. आपने करवाया है, ये बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आपने ही तो इन आतंकियों को शरण दी, उनको पैसे दिए, प्रशिक्षण दिए, हथियार दिए...याद रखें जरदारी साहब, ये आतंकी एक दिन आपको भी मारेंगे- भस्मासुर की तरह. लेकिन आप शिव नहीं हैं, आप तो आसुरी शक्तियों के गिरोहबाज हैं, इसलिए आप बचेंगे नहीं. आपके द्वारा पालित-पोषित ये लोग आपके देश का ही बैंड बाजा बजाएंगे. 
   
 

gulzar hussain (gulzar.mahanagar@yahoo.co.in) mumbai

 
 वीरेंद्र, आपने झकझोरने वाली कविता लिखी है. सच कह रहा हूं वीरेंद्र.... पाकिस्तान की किसी बात पर भरोसा नहीं होता है. पाकिस्तान अगर दृढ़ निश्चय के साथ आतंकवाद का मुकाबला करना चाहता तो मुंबई हमलों से बहुत पहले ही आतंकी संगठनों पर धावा बोलता. अब जो पाकिस्तान ने दिखाउ गिरफ्तारियां की हैं, वो समझ में नहीं आती हैं कि इससे पहले वो कहां सोये थे. मुझे लगता है कि पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी नीतियों के कारण आतंकवाद को बनाये रखना चाहता है. 
   
 

virendra jain (j_virendra@yahoo.com) bhopal

 
 आये थे मरने की खातिर
वे बच्चे किसके थे आखिर ?

क्या उनका कोई बाप न था
क्या उनका कोई भाई नहीं
वे क्या बिन मां के जाये थे
वे कौन देश से आये थे
क्यों नहीं बहे उन पर आंसू
क्यों नहीं किसी के अपने थे
क्यों पाई नहीं मुहब्बत थी
क्यों नहीं आंख में सपने थे
वे नहीं जानते थे उनने
किसको मारा, क्यों मारा है
जिसने उनको आदेश दिया
खुद कायर है, नाकारा है
उनको दफनाने की खातिर
जब कब्रिस्तान नहीं राजी
वे लोग कहां जिनने लगवाई
उनसे प्राणों की बाजी
जो लोग उन्हें भड़काते हैं
खुद बुर्के में छुप जाते हैं
जिसको जीवन की आस न हो
उससे न बड़ा कोई काफिर
वे बच्चे किस के थे आखिर ?
 
   
 

कौशल किशोर शुक्ला (kaushal.shukla@rediffmail.com) मुजफ्फरपुर

 
 यह पाकिस्तान का ढकोसला है। वहां की सरकार की भाषा भी क्या आतंकियों जैसी नहीं लगती?
 
   

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