रविवार | Raviwar | रोजगार के हक का इंतजार
पश्चिम बंगाल
रोजगार के हक का इंतजार
सचिन कुमार जैन
दक्षिण
24 परगना से
पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के पूर्णचन्द्र गांव की कबिता भुंईया अपनी
400 रूपये की मासिक आय से परिवार के पांच सदस्यों का जीवनयापन नहीं कर पाती हैं. ऐसे
में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना कानून से कबिता को उम्मीद बंधी कि अब
जीवन पथ पर गरीबी के कांटे कुछ कम होंगे. 20 सितम्बर 2008 को उन्होंने नियमों के
तहत आवेदन देकर रोजगार की मांग की पर पंचायत ने उन्हें काम देने से इंकार कर दिया.
25 सितम्बर को वह फिर ग्राम पंचायत प्रधान के पास गईं, जिसने उन्हें बताया
कि जब तक कम से कम 30 मजदूर एक साथ आवेदन नहीं करेंगे तब तक उन्हें रोजगार नहीं
मिलेगा, यही कानून है.
कबिता कहती हैं " यह कानून नहीं शोषण है, इससे मेरी
उम्मीदें टूटी हैं."
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असिमा को 2100
देकर 6000 का भुगतान दिखाया गया |
काकद्वीप विकासखण्ड के भुबान नगर की असिमा पाल ने
ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के तहत अपनी बेटी के साथ 30 दिन काम किया, जिसके लिये
उन्हें 2100 रूपये दिये गये पर जॉब कार्ड पर 6000 रूपये का भुगतान दर्शाया गया. जब
उन्होंने पंचायत प्रधान से शिकायत की तो उनका जॉब कार्ड रख लिया गया, अब उन्हें काम
भी नहीं दिया जा रहा है.
हेरम्बोगोपालपुर की फाल्गुनी सस्मोल ने गांव की 35 महिलाओं के साथ मिलकर पंचायत को
रोजगार के लिए आवेदन देना चाहा पर एक साल से न तो उनका आवेदन लिया गया न ही रोजगार
दिया गया. बेरोजगारी भत्तों की तो बात दूर है.
यहां तक कि पश्चिम बंगाल में आमतौर पर जो भी शिकायतें रोजगार गारण्टी योजना के
कार्यक्रम अधिकारी को की जाती है, वह निराकारण के लिये वापस पंचायत प्रधान के पास
भेजी जा रही हैं क्योंकि राज्य की राजनैतिक व्यवस्था में उन पर कोई कार्रवाही का
प्रावधान ही नहीं दिखता. हालांकि तीन दशकों तक सत्ता चलाने के बाद मई 2008 में पहली
मर्तबा दक्षिण 24 परगना के मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं ने पंचायत
चुनावों में स्थापित सत्ता को नकार कर अपने असंतोष को खुले रूप में जाहिर कर दिया.
कबिता, असिमा और फाल्गुनी तो उदाहरण मात्र हैं. वास्तविकता यह है कि पश्चिम बंगाल
में नरेगा महिलाओं की जिन्दगी में अपेक्षित बदलाव नहीं ला रहा है और गहरे तक जड़ें
जमाई हुई पितृसत्तात्मक व्यवस्था लगातार उनका शोषण कर रही है, जिसमें अब सरकार भी
साझेदार है.
रोजगार न मिलने की दशा में कानून बेरोजगारी भत्ते को मजदूरों का हक बनाता है.
दक्षिण 24 परगना के 5 पंचायतों की 889 महिलाओं ने प्रक्रिया के तहत मांग करने के
बाद भी रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ते की मांग की. श्रमजीवी महिला समिति के
प्रयासों के साथ जुड़कर गांव की महिलाओं ने ग्राम पंचायत से लेकर ब्लाक, जिला और
राज्य रोजगार गारण्टी परिषद तक बेरोजगारी भत्ते के हक के लिये जद्दोजहद की पर कानून
का कोई सम्मान न हुआ. अंतत: उन्हें कोलकाता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा.
रोजगार कानून के संरक्षण के लिये अब समुदाय को कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है.
दिगम्बर अंगीकार संगठन का वृहद अध्ययन बताता है कि महिलाओं को कृषि मजदूरी करके 30
से 45 रूपये मिलते हैं जबकि नरेगा में न्यूनतम मजदूरी 75 रूपये है. इसके बावजूद आज
भी वे कृषि मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि वहां उन्हें हर रोज मजदूरी का
भुगतान हो जाता है, जबकि नरेगा में उन्हें कम से कम 30 दिन की अवधि के बाद मजदूरी
मिल पा रही है. लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिये बने कानून का क्रियान्वयन
उनकी जरूरतों के अनुरूप नहीं हो रहा है.
पश्चिम बंगाल में नये गरीबी अनुमानों (नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाईजेशन, 2004-05) के
मुताबिक 208.36 लाख लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं इनमें से 173.22 लाख यानी
83.14 प्रतिशत लोग तो गांवों में ही हैं. ऐसी स्थिति में ग्रामीण रोजगार गारण्टी
योजना राज्य की एक बड़ी जनसंख्या के लिये बेहद सकारात्मक भूमिका निर्वाह कर सकती है.
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत केवल 20.22
प्रतिशत महिलाओं को रोजगार मिला, जबकि भारत का राष्ट्रीय औसत 49.79 प्रतिशत महिलाओं
को रोजगार देने का है. केरल में रोजगार योजना में महिलाओं की सहभागिता 83.07
प्रतिशत रही, जबकि राजस्थान में 68.79 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 41.49 प्रतिशत,
आंध्रप्रदेश में 59.74, कर्नाटक में 57.43 प्रतिशत और तमिलनाडू में 78.25 रोजगार
महिलाओं को मिला है.
वस्तुत: नरेगा अपने आप में एक व्यवस्थित क्रियान्वयन के लिये ठोस और जवाबदेय ढांचे
की जरूरत का अहसास कराता है जिसमें समुदाय और मजदूरों, दोनों की जरूरतों को पूरा
करते हुये आगे बढ़ा जा सके. सामाजिक कार्यकर्ता चितरंजन मंडल के अनुसार आश्चर्यजनक
है कि जिस योजना के जरिये वाम विचारधारा अपने सिद्वान्तों को और ठोस आधार दे सकती
थी, उसी योजना के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार को वह मौन साधे बढ़ावा दे रही है.
मुश्किल यह भी है कि यहां दिक्कतों के समाधान करने के लिये सरकारी बना ढांचा भी
चूंकि इसी सोच से ग्रसित है इसलिये कानूनी प्रक्रियाओं के क्रियान्वयन के लिये कोई
स्थान नहीं बन पाया.
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भजना गांव की जहांआरा बीबी
सहित 56 परिवारों को इसलिये रोजगार नहीं मिला क्योंकि वे वामपंथ के प्रति आस्था
व्यक्त नहीं कर पाईं.
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मजदूरों के स्तर पर यह कानून गांव में रहने वाले हर व्यक्ति को मांग करने पर बिना
भेदभाव 15 दिन के भीतर रोजगार प्राप्त करने का अधिकार देता है किन्तु दक्षिण 24
परगना में दिगम्बर अंगीकार स्वैच्छिक संगठन द्वारा किये गये अध्ययन से पता चला कि
केवल 14 प्रतिशत मजदूरों को मांग करने पर रोजगार मिला क्योंकि वहां कानून और योजनायें
उन्हीं के लिए हैं जो सत्तारूढ़ माकपा की विचारधारा के प्रति प्रतिबध्द हैं.
पाथेरप्रतिमा विकासखण्ड की दक्षिण गंगाधरपुर पंचायत ने भजना गांव की जहांआरा बीबी
सहित 56 परिवारों को इसलिये रोजगार नहीं मिला क्योंकि वे वामपंथ के प्रति आस्था
व्यक्त नहीं कर पाईं. इस गांव के 75 परिवारों की महिलायें घरों में ही ज़री का काम
करती हैं पर अब इससे परिवारों की जरूरतें पूरी नहीं होती; तब सामाजिक बंधनों से बाहर
आने का मौका उन्हें नरेगा में मिल सकता था पर उन्हें जॉब कार्ड ही नहीं मिल पाया.
यह बात तो स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल के राजनैतिक इतिहास ने लोगों को संगठित रहने
और संघर्ष का सबक सिखाया है और दक्षिण 24 परगना की महिलायें अकेले नहीं बल्कि समूह
में रोजगार की मांग करती हैं पर संकट यह है कि उनका सामना उस संगठित राजनैतिक ताकत
से होता है जो राजनैतिक प्रतिबध्दता को सरकारी योजनाओं की नई पात्रता शर्त के रूप
में स्थापित करती है. नरेगा के अंतर्गत वहां पंचायत प्रधान जॉबकार्ड और मस्टर रोल
में फर्जी प्रविष्टियों के जरिये लोक संसाधनों का सुनियोजित ढंग से भ्रष्टाचार कर
रहे हैं. उनका आधार राजनैतिक विचारधारा है और सत्ताशीर्ष का उन्हें संरक्षण मिला
हुआ है. इसलिये राज्य की अफसरशाही नरेगा के प्रावधानों को नस्तियों में रखे रहना ही
बेहतर समझती है.
दक्षिण 24 परगना में नरेगा में महिलाओं के खिलाफ कई स्तरों पर शोषण और भेदभाव होता
है. गोबर्धनपुर गांव के 205 परिवारों को जॉब कार्ड नहीं मिले और जब दिगम्बर अंगीकार
की पहल पर उन्होंने पंचायत में जॉब कार्ड बनवाने के लिये आवेदन
दिया
तो इसमें से 42
परिवारों के आवेदन इसलिये रद्द कर दिये गये क्योंकि उन्होंने सादे कागज पर आवेदन
दिये थे.
कानूनन सादे कागज पर आवेदन दिया जा सकता है पर सचिव ने कोई तर्क नहीं माना
क्योंकि ये तमाम परिवार महिला मुखियाओं वाले परिवार थे.
अब तक पश्चिम बंगाल को संघर्ष की भूमि माना जाता रहा है. ऐसा महसूस होता था
कि कानून, अधिकार और संसाधनों की कमी के कारण पश्चिम बंगाल गरीबी के सबसे दर्दनाक
अनुभवों से गुजर रहा है. इसलिये उम्मीद थी कि रोजग़ार का कानूनी हक सबसे बेहतर तरीके
से इस राज्य के लोगों को मिलेगा परन्तु नरेगा के क्रियान्वयन से उभर कर आ रहे अनुभव
कुछ दूसरे बड़े सवाल खड़े करते हैं, जिनका
जवाब तलाशने में किसी की दिलचस्पी नहीं है.
15.12.2008,
10.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित