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जनमत की बात करिये सरकार

मुद्दा

 

जनमत की बात करिये सरकार

योगेंद्र यादव

सुप्रीम कोर्ट


जरा गौर करें! कैसे अदालतों के आदेश की आलोचना से मैं अकसर परहेज करता हूं. इसलिए नहीं कि अदालत का आदेश हमेशा सही लगता है. इसलिए भी नहीं कि अदालत की अवमानना से डरता हूं. बल्कि इसलिए कि लोकतंत्र के खेल में किसी रेफरी के आदेश का सम्मान तो करना पड़ेगा. रेफरी मेरी पसंद का आदेश दे तो उसे सिर आंखों पर बैठाऊं, नहीं तो उसे आंखे दिखाऊं-ऐसे तो नहीं चल सकता.

इसलिए कई बार अदालतों का फैसला पसंद न आने पर भी सिर झुकाकर उसका सम्मान करना ही समझदारी है. लेकिन पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश का सम्मान करना संभव नहीं है. हरियाणा की पंचायतों के चुनाव में उम्मीदवारों की शैक्षणिक और अन्य योग्यता का सवाल सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे-नुकसान वाला मुकदमा नहीं है. यह संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल है. इसलिए मजबूर होकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध यह लेख लिख रहा हूं.

पहली नजर में लग सकता है कि इस फैसले में इतनी बड़ी बात क्या है. हरियाणा सरकार ने पंचायत चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ नई शर्तें लगा दी हैं. उम्र की शर्त तो पहले ही थी. कुछ साल पहले दो से अधिक बच्चे न होने की शर्त भी लग चुकी थी.

इस बार शैक्षणिक योग्यता भी जोड़ दी गई- सरपंच और पंच को दसवीं पास होना जरूरी है, महिला और दलित पंच को आठवीं पास और दलित-महिला को पांचवीं पास होना अनिवार्य बना दिया गया है. साथ में यह भी अनिवार्य बना दिया कि घर में शौचालय हो, उम्मीदवार पर कोई कर्जा या बिजली बिल बकाया न हो, उस पर किसी गंभीर आपराधिक मामले में चार्जशीट न हो.

इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई लेकिन न्यायालय ने इन शर्तों के पक्ष में फैसला सुना दिया. बड़ी बात यह है कि इस आधार पर हरियाणा की दो-तिहाई आबादी चुनाव लडऩे से वंचित हो जाएगी. अगर सिर्फ शिक्षा की शर्त ही लें तो सामान्य वर्ग में 52 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग में 62 प्रतिशत नागरिक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.

पक्का आंकड़ा किसी के पास नहीं है लेकिन शिक्षा के साथ दूसरी शर्तें जोड़ दें तो इस कानून से सामान्य वर्ग के दो-तिहाई और महिलाओं और दलितों में उससे भी ज्यादा नागरिक लोकतांत्रिक प्रतिनिधि नहीं बन सकेंगे. कहीं-कहीं तो हो सकता है पूरे गांव में उस श्रेणी का एक भी योग्य उम्मीदवार न बचे. सबसे पिछड़े मेवात जिले के हर गांव में आठवीं पास बच्चियां तो मिल सकती हैं लेकिन महिलाएं कहां मिलेंगी? घुमंतु जातियों के लिए तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व के दरवाजे ही बंद हो जाएंगे.

कोई कह सकता है कि अगर शिक्षा की कमी के कारण बहुमत भी वंचित रह गया तो क्या गलत बात है? जब हर नौकरी में न्यूनतम योग्यता की शर्त होती है तो पंच-सरपंच की शैक्षणिक योग्यता तय करने में क्या बुराई है? इसे ध्यान से समझने की जरूरत है.

पहली बात तो यह कि कोई अपनी मर्जी से अनपढ़ नहीं रहता, लोग मजबूरी में शिक्षा से वंचित होते हैं-या तो गांव में स्कूल नहीं थे या पैसे नहीं थे. या फिर शिक्षा का संस्कार नहीं था. वैसे भी देश में सभी नौकरियां पढ़े-लिखों के लिए हैं. सिर्फ राजनीति ही थी जहां हर नागरिक के लिए दरवाजे खुले थे, वहां भी बंदिश लग जाएगी. मतलब यह कि व्यवस्था के शिकार लोगों को अब ऊपर से सजा और मिलेगी.

दूसरी बात यह कि अगर ये सब शर्तें इतनी अच्छी हैं तो इन्हें विधायकों, सांसदों और मंत्रियों पर लागू क्यों नहीं किया जाता? सरकार इसके पक्ष में हास्यास्पद तर्क दे रही है कि सरपंच को चेक पर हस्ताक्षर करने होते हैं, मंत्री और विधायक को नहीं. तो क्या सरकार यह कर रही है की मंत्री फाइल नहीं पढ़ते, विधायक सदन के पटल पर रखी रिपोर्ट और विधेयक नहीं पढ़ते? अब हरियाणा में एक निरक्षर व्यक्ति संसद और विधानसभा में बैठ सकता है लेकिन गांव की पंचायत में नहीं.

बलात्कार जैसे संगीन अपराध के आरोपी लोकसभा और हरियाणा विधानसभा के सदस्य हैं और वहां बैठकर नियम बना रहे हैं कि आपराधिक आरोप तय होते ही पंच-सरपंच नहीं बन सकते. सबसे बड़ी बात यह है कि जनप्रतिनिधि होना कोई नौकरी नहीं है. पंच-सरपंच या फिर विधायक-सांसद होने की एक ही योग्यता है.

जनता के दुख-सुख को समझना और उनकी आवाज उठाना, उनके काम करवाना. उनमें यह योग्यता है या नहीं इसका एक ही पैमाना है- जनमत. उसके अलावा और कोई शर्त लगाना लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है. कभी-कभार कोई न्यूनतम शर्त लगाई जा सकती है. जैसे अपराधी के डर से जनता को बचाने के लिए उसकी उम्मीदवारी पर पाबंदी लग सकती है. लेकिन लोग अपनी आवाज उठाने के लिए पढ़े-लिखे को पसंद करें या अनपढ़ को, लोकतंत्र में यह फैसला तो जनता पर ही छोडऩा होगा. राजनीति के ज्ञान को डिग्री से नहीं नापा जा सकता.

जनप्रतिनिधि होना कोई नौकरी नहीं है. पंच-सरपंच या फिर विधायक-सांसद होने की एक ही योग्यता है-जनता के दुख-सुख को समझना और उनकी आवाज उठाना, उनके काम करवाना. उनमें यह योग्यता है या नहीं इसका एक ही पैमाना है-जनमत. उसके अलावा और कोई शर्त लगाना लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है.

लोग अपनी आवाज उठाने के लिए पढ़े-लिखे को पसंद करें या अनपढ़ को, लोकतंत्र में यह फैसला तो जनता पर ही छोडऩा होगा. राजनीति के ज्ञान को डिग्री से नहीं नापा जा सकता, न्यूनतम शर्त हो सकती है. अपराधी के डर से जनता को बचाने के लिए उसकी उम्मीदवारी पर पाबंदी.

21.12.2014, 19.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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