पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सच हुआ बेमतलब

नोटवापसी की बहस प्रधानमंत्री के लिए

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

किसान चुका रहे आर्थिक विकास की कीमत

सच हुआ बेमतलब

नोटवापसी की बहस प्रधानमंत्री के लिए

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >विचार > Print | Share This  

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

विचार

 

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

मनोज कुमार झा


प्रतिरोध के लिए विश्वसनीय और जरख़ेज जमीन के सिकुड़ते जाने के पीछे अलग-अलग इलाकों से जुड़े परिस्थिति-मूलक कारण तो हैं ही, इसके पार्श्व में हमारे समय की सांस्कृतिक एवं सभ्यातामूलक विशिष्टताएं भी हैं. नयी सदी के मनुष्य के समक्ष कुछ चुनौतियाँ तो बिल्कुल नये रूप में सामने आई है. .

प्रतिरोध


मुझे इस बात में किंचित संदेह है कि कार्य-कारण श्रृंखला के द्वारा हम समकालीन प्रतिरोध-विरोधी क्रूरतापूर्ण व्यवहार प्रणाली को समझ सकते हैं. मेरी समझ से हम उस सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश का एक मोटा-मोटी खाँचा ही खींच सकते हैं, जिसमें ये चीजे घटित हो रही हैं. हम कवि यही तो कर सकते हैं. हम भवानी प्रसाद मिश्र के शब्दों में जनता को सत्ताधारियों के प्रत्यक्ष खड़ा कर सकते हैं.

जैसा कि वे कहते हैं –


हम दुनिया के सत्ताधारियों को
दुनिया की जनता के सामने खड़ा करना चाहते हैं
दुनिया की जनता को
दुनिया भर के सत्ताधारियों से बड़ा धरना चाहते हैं


अभी का समय चीजों का तेजी से घटित होने का समय है. ऐसे में यदि किसी विषय पर थोड़ा ठहरें तो यह भी प्रतिरोध ही होगा. इस परिवेश की कुछ लाक्षणिकताएं हैं- दुनिया को एक सा कर देने की मुहिम, मध्यवर्ग की सांस्कृतिक उदासीनता, किसानों की बदहाली, सुरक्षा, सक्षमता की गति आदि का जीवन का केन्द्रीय तत्व बन जाना,

पहचान की राजनीति, हमारा बदलता मूल्यबोध एवं दायित्वबोध, हमारी स्मृतियाँ और हमारे द्वारा इसका जाना-अनजाना संपादन, विभिन्न समुदायों द्वारा तय की गई सांस्कृतिक सीमाएं एवं कई ऐसे नये-पुराने मुद्दों के द्वारा बना है यह परिवेश.

आधुनिकता ने धर्म को शक्तिशाली केन्द्र से इस हद तक बेदखल किया कि धर्म अपने औचित्य के वैज्ञानिक कारण ढंढने लगे. लेकिन विज्ञान द्वारा प्राप्त ऊर्जा ने तर्क की केंद्रीयता को इस हद तक बढ़ा दिया कि नितांत जैविक भावनामूलक प्रवृत्तियों के औचित्य को भी तर्क की कसौटी पर कसा जाने लगा. दूसरी तरफ इसी विज्ञान द्वारा हासिल परिवहन और सम्प्रेषण की त्वरा ने पूंजी द्वारा इच्छित सम्पूर्ण मानव जगत में अबाध गति से भ्रमणशील होने की लिप्सा को संभव किया.

रूस के टूटने के बाद ज्पदं सिचुएशन की बात की जाने लगी. मानवजाति का जो हिस्सा मार्क्सवाद को आर्थिक नियतिवाद एवं तकनीकी नियतवाद की कमजोरियों से ग्रस्त बताता था, वही प्डथ् और वर्ल्ड बैंक द्वारा संरक्षित वैश्विक बाजार को एक मात्र आर्थिक विकल्प एवं वर्ल्डवाइउ वेव, ई-मेल, ई-कॉमर्स, वैश्वीकृत टेलीविजन नेटवर्क समाचार पत्रों के बहुराष्ट्रीय साम्राज्य, ऑडियो-वीडियो प्रोडक्शन के नये तरीकांे का उपयोग मनुष्य के लिए तकनीकी नियति माने जाने लगा. कहा गया, जो इस तकनीक का लाभ नहीं लेगा, वो पीछे छूट जाएगा और पीछे छूट जाने का दंश मनुष्य के लिए उतना दारूण कभी नहीं था, जितना कि इस नयी सदी में.

इस आवारा पूंजी ने क्रूरता का एक सौंदर्यीकृत परिवेश रचा, जिसमें अपने आर्थिक फैसलों द्वारा लाखों लोगों को भूखमरी तक पहुँचानेवाला निजाम और व्यक्ति सुन्दर-सुन्दर सुभाषित उचार, नदी से लेकर शेर तक की रक्षा करने की कीर्ति का मान प्राप्त कर सकता है, वहीं एक भुट्टा चुरानेवाली बुढ़िया हमेशा उग्र होने को आतुर भीड़ के द्वारा मारी जा सकती है.

भीड़ की बदलती प्रवृत्तियों पर अलग से विचार करने की जरूरत है. हम आमलोग भीड़ के बारे में बहुत कम जानते हैं. भीड़ के बारे में सदैव ही हमसे अधिक सरकारें और प्रशासक जानते हैं. इस पर गवर्मेन्टालिटी के जरिए मिशेल फुको ने गहराई से विचार किया है. उनके अनुसार 15 वीं 16वीं सदी से ही लोगों को प्रशासनिक इकाइयों में तब्दील कर दिया गया है.

तरह-तरह के विचारों के प्रचलन में आ जाने से ही लोकतंत्र की मजबूती नहीं आ जाती, समाज का उच्चतर रूपांतरण नहीं हो जाता, असल बात यह है कि ये विचार आम जनता के जीवन को कितना रूपांतरित कर रहे हैं. 19वीं सदी के मध्य में विचारों की आभासी बहुलता को देखकर मार्क्स ने इसकी तुलना पेरिस की फैशनपरस्त युवती से की थी.

जैसा कि क्लॉडिया लोमनिट्ज ने ‘‘डिकेइंस इन टाइम्स ऑफ ग्लोबलाइजेशन’’ ‘‘पहली दुनिया में जो सांस्कृतिक विविधता का विस्फोट दिखाई देता है, वह वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भूमंडलीय बाजार व्यवस्था में पूर्वाधुनिक तथा आधुनिक संस्कृतियों का एकीकरण है. जिसमें रुचियों के प्रभुत्वशील रूपों का कुछ शासन तंत्रों में निरंतर बढ़ती हुई एकाग्रता है ......

बहुल सास्कृतिवाद के साथ पहली दुनिया की मंडियां, शैलियां और रुचियाँ तीसरी दुनिया में पहले से कहीं अधिक व्यापक और अधिक संपूर्ण रूप से अंतर्निहित हो रही है. यहां तक कि पहली दुनिया की श्रेष्ठता और इसके पैराडाइम पर अब किसी बहस की जरूरत नहीं समझी जाती बल्कि उपभोग एवं फैशन अब स्वयंसिद्ध है.’’

Terry Eagton ने Figure of Dissent में कहा है कि हम इस कैशोर्य-समझ के शिकार हो गए लगते हैं कि हमनें क्या चुना, यह महत्वपूर्ण नहंीं है बल्कि महत्वपूर्ण है कि हमने कुछ तो चुना है.

केन्द्रीकरण और मानकीकरण का एक दौर है, ब्रश से लेकर बेड तक को इन्टरनेश्नल कहाने का चलन बना है. फ्रेंच चिंतक असीन मालूफ ने कहा है कि अभी ऐसा हो गया है कि चारों तरफ कहीं देखनें पर सब तरफ पाश्चात्य सभ्यता दिखाई देती है. आप कहीं भी रह रहे हों, सारा आधुनिकीकरण अब पाश्चात्यीकरण ही होता है. यह सच है कि सब जगह थोड़े-बहुत वे स्मारक और कलाकृत्तियाँ मिलती हैं, जिन पर खास सभ्यताओं की छाप होती है. किन्तु वह सब जो नवनिर्मित है - इमारतें, संस्थाएं, ज्ञान बढ़ाने और जीवन शैली की विधियाँ- सब पश्चिम की प्रतिरूप है.

ऐसे में कुछ लोगों को लगता है कि वे बिना अपनी पहचान खोए प्रगति नहीं कर सकते और ऐसा समुदाय कुछ सांस्कृतिक तत्व त्याग करने के विरुद्ध खड़ा हो जाता है. शार्ली एब्दो पर लिखते हुए स्लॉवोज जिज़ेक ने कहा है कि यदि बुनियादपरस्तों ने अंतिम सत्य जान लिया है तो वे इतर-धार्मिक समूहों से इतना भयभीत क्यों हैं. ये एक अजीब तरह के भय के शिकार हो जाते हैं, जहाँ बाहर से दिखने में तो ये श्रेष्ठता-ग्रंथि से प्रभावित लगते हैं पर वास्तव में ये इन्फेरियारिटी काम्प्लेक्स के शिकार हो जाते हैं. यह सभी धर्म के मूलतत्ववादियों के लिए सही है.

क्या छोड़ें और क्या न छोड़ें, इसका विवेकपूर्ण निर्णय ले पाने का फैसला सौम्यतापूर्ण विवेक का विषय होना चाहिए. मगर यह हमेशा ऐसा नहीं होता. जहाँ लोगों को धर्म के प्रति खतरा महसूस होता है, वहाँ उनका सब कुछ धर्म ही हो जाता है. लेकिन अगर मातृभाषा पर खतरा महसूस हो, तो वे भाषा को ही सब कुछ मानने लगते हैं और रक्तरंजित लड़ाई पर आमादा हो जाते हैं, जैसा कि तुर्की और खुर्द के बीच हुआ जबकि दोनों मुसलमान हैं.

इसी से मिलती- जुलती एक और शै है, जो समकालीन मनुष्य के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का स्रोत है. यह है- सूचनाओं एवं पदार्थों की अति उपलब्धता और इससे अन्तर्क्रिया कर रही जीवन की गति की तीव्रता. समकालीन यथार्थ के विभिन्न घटक, तरह-तरह की माध्यमों द्वारा, नानारूपों में इस कदर अवतीर्ण हो रहे है, कि इन घटकों के बीच सामंजस्य स्थापित करना और उस आधार पर यथार्थ का समग्र चित्र खींचना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है.

जर्मन दार्शनिक जार्ज सिमेल ने Metropolis and Metal Life में कहा है कि चिन्हों की लगातार बमबारी से महानगर के लोगों का मन एक बौद्धिक पर्दा तैयार कर लेता है, जिससे वो घटनाओं से भावनात्मक तौर पर उद्वेलित नहीं होता और उसमें blasé outlook (अतितृप्तिमूलक बेरूखीयुक्त दृष्टि) विकसित हो जाता है. यह भूमंडल के दूरस्थ कोनों तक के लिए सही है. हालांकि हमें यह याद रखना होगा कि उस स्थान की सांस्कृतिक अवस्थिति- जहाँ बिजली 24 घंटे उपलब्ध हो, उस स्थान की अवस्थिति से भिन्न होगी, जहाँ अबतक लालटेन से ही काम चलाया जा रहा है. फिर भी पृथ्वी का अधिकांश हिस्सा, खासकर जिनसे विचाररत पब्लिक स्फेयर का निर्माण होता है, इस बमबारी की जद में है.

यथार्थ से इस तरह भावनात्मक विच्छेद हो जाता है और यह दूसरे के दर्द को साझा करने में हमें अक्षम बनाता है. मनुष्य की ध्यान-अवधि मिली सेकेण्ड, माइक्रोसेकेण्ड से लेकर नैनो सेकेण्ड तक पहुँच जाती है, जो कि किसी घटना पर ठीक से प्रतिक्रिया के लिए बहुत कम है. चिन्तन के छोटे-छोटे स्पार्कस (हिस्से) को भावना समझ लिया जाता है. तेज गति वाले समय में मद्धिम आँच की तरह सुलगने वाली भावनाओं का लोप होने लगता है. यह भावना सर्वाधिक सघन रूप में लोकसंस्कृति में पायी जाती है, जिसके लिए स्पेस छीजता जा रहा है.

आज देश में संकट का केन्द्रीय रूपक किसानों के जीवन में आया उजाड़ है. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह किसान सत्ता के केन्द्रीय विमर्श के मूल में नहीं आ पाया. जिस नब्बे के दशक में किसानों की बदहाली उन्हें आत्महत्या की ओर धकेल रही थी, उसी समय सामाजिक संघर्ष के प्रस्थान बिन्दु किसान न होकर अस्मितामूलक समूह हो गए. पिछले तीन सौ वर्षों के दौरान एक ओर जहाँ दुनिया के आबादी में किसानों का अनुपात नाटकीय रूप से कम हुआ है, वहीं एक सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक कोटि के रूप में किसान का महत्व कम नहीं हुआ है.

भारत में सबसे ज्यादा तेजी से विकासोन्मुख और प्रभावी रूप से भूमंडलीकृत हो रहे राज्यों में आत्महत्या की यह महामारी सबसे विकट रूप में फैली है. कुछ आंकड़ों के अनुसार उन किसानों की कुल संख्या न्यूयॉर्क में 9/11 को ट्रेड टॉवर में हुए हमले में मारे गए लोगों की संख्या को पार कर चुकी है फिर भी यह उतना बड़ा मसला नहंी बन सका क्योंकि यह एक पिछड़े समुदाय से संबंधित था. मल्टीनेशनल कॉरपोरेट के द्वारा कृषि व्यापार और औद्योगिक कृषि की शुरुआत हो चुकी है. कम से कम 4000 साल पुराना व्यवसाय और जीवन शैली उन्मूलन के कगार पर है.

यह खास तरह से जीने और खास तरह से होने की समाप्ति है. किसानों की समृद्ध लोक संस्कृति कथित पॉपुलर कल्चर द्वारा किनारे की जा रही है. प्रसिद्ध चिंतक गायत्री चक्रवर्ती स्पीवॉक ने कहा है कि भूमंडलीकरण का समकालीन हमला ग्राम्यता की संस्कृति पर है. किसानी संस्कृति के पार्श्व में चले जाने के बाद असहिष्णुता के खिलाफ साझा संस्कृति की पुरानी परंपरा को प्रभावी नहीं रहने दिया.

मध्यवर्ग जो कि विवेकसम्मत कार्रवाईयों के लिए क्रियाशील हुआ करता था और सांस्कृतिक कर्म में उसकी भागीदारी सुरुचिपूर्ण माहौल का निर्माण करती थी, अब बुरी तरह से अध्यात्मविहीन धर्म और श्रमिकों के विपक्ष में बड़ी पूंजी गिरफ्त में आ गयी है.

प्रसिद्ध समाज शास्त्री इम्तियाज अहमद ने तहलका पत्रिका के विशेषांक में इसे बहुत साफगोई और तर्कशीलता के साथ रखा है. पारंपरिक मध्य वर्ग जमीन और सामाजिक हैसियत के आधार पर खड़ा था इसलिए इस पर शुरू से ही उच्चजातियों का आधिपत्य रहा. नवमध्यवर्ग समाज के उन वर्गों से पैदा होकर सामने आया, जो जातीय और सामाजिक दृष्टिकोण से बीच की और निचली जातियां थीं.

ये नया मध्यवर्ग अपनी बेईमानी और मेहनत की बदौलत अस्तित्व में आया था. चूंकि ये नव मध्यवर्ग शिक्षा की दृष्टि से तो बहुल कुशल था नहीं परंतु एकदम से पैसा आ जाने के कारण समाज में अपनी हैसियत बनाने में कामयाब हो गया था, इसलिए उसकी सोच पारंपरिक और रूढ़िवादी ही रही. अपनी नई सामाजिक हैसियत को मजबूत करने के लिए और मान्यता दिलाने के लिए इस वर्ग ने बड़े पैमाने पर धर्म का सहारा लिया. उसने न सिर्फ अपने व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक पर्वों ओर मान्याताओं को स्थान दिया बल्कि अपने सार्वजनिक जीवन में भी वह इन्हें खुलकर अपनाने लगा.

यदि हम याद करें, तो दिखाई देगा कि साठ और सत्तर के दशक में इस देश मे ंनए-नए पर्व मनाने की परंपरा प्रबल रूप से सामने आई. समाज में उभरते नए मध्यवर्ग ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बड़ी से बड़ी रकम देकर उसने धार्मिक रथों पर बैठकर शहर में घूमने का सिलसिला शुरू किया. मानो वह समाज के दूसरे वर्गों को बताना चाहता था कि कल तक तुम मुझे एक छोटा आदमी समझते थे परंतु आज मेरी भी हैसियत है और देखो मैं धार्मिक मंच पर कितनी ऊची जगह पर बैठा हुआ हुँ. साठ और सत्तर के दशक में जिस प्रकार से धार्मिक, आर्थिक या सामाजिक कारणों से धर्म का इस्तेमाल शुरू हुआ, उसने अस्सी और नब्बे के दशक में इस देश के सांप्रदायिक वातावरण को गरमाया.

उस मध्यवर्ग ने जहाँ जातिवादी संकीर्णता को जन्म दिया, वहीं साम्प्रदायिक कटुता के भी साथ खड़ा रहा. यह मध्यवर्ग पूरी तरह अपनी नैतिक पहचान की बजाय अस्मितामूलक पहचान को समर्पित हो गया.

हम साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले लोग सौम्यता की संस्कृति के पक्ष में प्रयास कर सकते हैं. इधर सामाजिक घटनाओं की प्रस्तुति में उपहास का तत्व बढ़ा है और एक तरह की गहरी संबद्धता, urgency त्रासदी का बोध घट रहा है. हमें इस दिशा में भी सजग होना होगा.

13.04.2016, 18.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in