रविवार | Raviwar | भाषांतर | पीयूष दईया
विश्व कविता से एक चयन
अंगरेजी से
अनुवादः पीयूष दईया
बड़ा दिन
उंगारेती
1888-1970, इतालवी कवि
सड़क़ों के
एक जाल में
ग़ोता लगाने की
मेरी कोई चाहना नहीं
ऐसी थकान
मैं महसूस करता हूं
अपने कंधों पर
जो छोड़ दे मुझे इस तरह
जैसे
एक चीज
अर्पित
एक
कोने में
और भूली हुई
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कृतिः अखिलेश |
यहां
होता है महसूस
नहीं कुछ
सिर्फ़ भली गर्माहट
मैं ठहरा हूं
धुएं की
चार
कुलांचों संग
अंगीठी से आती
रास्ता
त्रिस्तान ज़ारा
1896-1963, रोमानियाइ कवि
यह कौन सा मार्ग है जो हमें अलगाता है
जिसके आर-पार मैं फैलाये हूं हाथ अपने विचारों का
हरेक उंगली की पोर पर लिखा है एक फूल
और मार्गान्त एक फूल है जो चलता है तुम संग
करते हुए अपने दिल को हल्का
तु मु
803-852, चीनी कवि
नदी और झीलों तक कठिनाइयों में जीवन संग मैंने सफ़र किया , शराब लिए अंगूरी :
उछला बल्लियों मेरा दिल शू'उ की छरहरी कटियों से , नाचे तन्वंगी जिस्म मेरी हथेली
में.
मैं जागा दस साल देर आखिरकार अपने यांग-शू स्वप्न से
नहीं कुछ लिए फ़क़त नाम एक घुमक्कड़ का नीले घरों में.
नरक
एडिथ श्रडरग्रान
1892-1923, स्वीडिश-फिनिश
ओह ऐश्वर्य नरक के !
नरक में कोई नहीं बोलता मृत्यु बाबत.
नरक है चिना पृथ्वी के खप्परों में
और अलंकृत चमकते फूलों से .....
नरक में नहीं कोई कहता एक खाली शब्द.....
नरक में नहीं कोई नशे में न सोया
और कोई नहीं सुस्ताता और न कोई बैठा निठल्ला.
नरक में नहीं कोई बोलता बल्कि हरेक है चीखता,
वहां , आंसू आंसू नहीं और सारा दुख है छूंछा.
नरक में न कोई पड़ता बीमार न थकता.
नरक है लगातार और सनातन.
21.12.2008,
15.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित