कहानी | प्रभुनारायण वर्मा | सम्बलपुर एक्सप्रेस
कहानी
सम्बलपुर
एक्सप्रेस
प्रभुनारायण वर्मा
‘‘साहेब, नमस्कार! आइए, चाह पी लीजिए’’
गुप्ता जी थोड़े चिढ़ गए. शाम का टहलना अगर तेज़ कदमों से हो, गहरी साँसे लेते हुए,
तभी उसका कुछ मतलब है. ऐसे रुकते-अटकते रहे... मगर एक अचरज ने इस चिढ़ को भुला
दिया. ये पुकार तो सम्बल की है! सम्बल यानी सम्बलपुर एक्सप्रेस- सम्राट होटल में
पानी सर्व करने वाला झक्की, हड़बड़िया उड़िया बेयरा. गुप्ता जी चाय से पहले डेढ़-दो
गिलास पानी ज़रूर पीते थे, इसीलिए इस काले लंबे और अड़ियल अधेड़ उड़िया के वे ख़ास
ग्राहक थे.
" अरे, सम्राट छोड़ दिए का यार?"
उन्होंने पूछा.
‘‘ओ
बहुत बईमान आदमी है साहेब.’’ सम्बल ने उत्साहपूर्वक, बल्कि, हँसते हुए कहा. एक चाय
ढेले में स्टोव, भगौने, ब्रेड वगैरह के पीछे मालिक के रूप में खड़ा वह अजीब लग रहा
था. जैसे किसी दूसरे के ठेले पर छुट्टियाँ मना रहा हो.
" मेरा पनरा सौ दबा दिया साहेब "
उसने बताया. बताने का ढंग शिकायत का कम था, गर्व का अधिक.
" अरे! कैसे? " गुप्ता जी ने
पूछा.
" सीधे बोल दिया कि तुम्हारा कुछ निकलता नईं."
सम्बल ने लापरवाही से बताया, फिर यह भी जोड़ा-"बईमान है,
एकदम बईमान."
" ठीक बोल रहा है ", गुप्ता
जी के साथ सांध्य-भ्रमण पर निकले चोबे जी ने कहा. चौबे जी आराम कायल थे और इस मूड
में थे कि चाय-वाय पीकर बढ़ा जाए.
गुप्ता जी की तनिक रुष्ट व प्रश्नवाचक दृष्टि को अनदेखा करते हुए उन्होंने फिर से
कहा, ‘‘बिल्कुल ठीक. वो, सोनी तो साला है ही बेईमान.’’
" चाह, बनाऊँ साहेब? " सम्बल
ने पूछा,"फस्कलास बनाऊँगा-कड़क."
" चलो पी लेते हैं. फिर चले चलेंगे."
चौबे जी ने भी जोड़ दिया.
दोनों बाजू में रखे बेंच पर बैठे.
मालूम हुआ कि एक भूतपूर्व ठेले से सम्बल ने ये सारा जुगाड़- ठेला, बरतन, स्टोव,
बेंच सब किराए पर लिया है. सुबह भजिया भी बनाया. रोज़
बनाएगा. बाकी दिन भर ब्रेड-बिस्कुट-चाय चलेगी. " आछा से
मेहनत करेगा अउर भगवान चाहेगा तो..."
चाय भी ठीक-ठाक थी. " चाए तो समराट से बीसे है गुरू",
चौबे जी ने मत दिया.
वहाँ से निकले तो गुप्ता जी का सांध्य-भ्रमण-जनित-स्वास्थ्य लाभ लेने का उत्साह
थोड़ा ठंडा पड़ गया.
आराम से चलते हुए तनिक दार्शनिक उदारता से उन्होंने कहा- "
बिचारा बुद्धू टाइप का है, समझ नहीं पाता, पता नहीं कितना सही बोल रहा है."
" बुद्धु नहीं, मंदबुद्धि है-रिटारडेड."
चौबे जी ने बताया-" अऊ जेतना हरामी टाइप के
होटल-लॉज वाला रहता है ना, ऊ सब ऐसन ही करमचारी खोजता
है, जो बइल जइसा खटे, कुकुर जइसा पोंछी हिलाए, आउर
हिसाब-किताब में गदहा हो एकदम."
बात अकाट्य थी. गुप्ताजी सोच में पड़ गए. " सोनी को तो
आप भी सुरुवे से जानते हैं ना?’’ चौबे जी ने बात जारी रखी. "
अइसने ठेला नहीं लगाता था पहिले! त एतना कइसे बढ़ गया! तीन मंजिला,
एयरकंडीसन होटल खोल दिया!"
" बिचारा मेनहत भी बहुत किया है यार"
, गुप्ता जी ने कहा.
" मेहनत-फेहनत तो सबे करते हैं महराज."
चौबे जी ने वितृष्णा से कहा-‘‘हाँ, बल्कि इ कहिए कि चलाक बहुत है, भारी लंद-फंदिया
है अऊ सबसे ऊपर, किस्मत का साँड़ है. सबको लूटता है अऊ सबको पटाकर रखता है. ’’
" व्यापार में तो भाई, सबको खुश रखना ही पड़ता है."
गुप्ता जी ने तर्क दिया तो चौबे जी और चिढ़ गए.
" देखिएगा, इ जब ना मरे.’ उन्होंने कहा,‘‘ जइनस ऊ
बढ़-चढ़ के खेल रहा है ना, सबे के आँख में गड़ रहा है. इ एक कदम लड़खड़ाया तो चार
जने ढकेल के गिरा देंगे अऊ दस जाने कुच के चल देंगे."
" अमृत पीकर तो यहाँ कोई नहीं आया है."
गुप्ता जी ने कहा, फिर जैसे बात का समापन किया-" छोड़ो
यार, हमारा कौन वो पंद्रह सौ दबाया है-मरे या जिए, अपनी बला से."
" इ सम्बलपुर एक्सप्रेस भी, बड़ा खुसी-खुसी बता रहा था
कि मेरा पनरा सौ दबा दिया." चौबे जी ने मुस्कुराते हुए
कहा,‘‘एतना खुश काहे था? बल्कि कहिए कि एतना खुश कइसे था.’’
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इसके लगभग पंद्रह दिनों बाद चौबे जी प्रोफेसर सिन्हा के साथ टहलते हुए उधर निकले,
तो सम्बल ने फिर हाँक लगाई.
" नमस्कार साहेब! आइए, चाह, पी लीजिए."
दोनों बैठे. चौबे जी ने ध्यान दिया कि ठेले की हालत खस्ता है. भजिया-बिस्कुट वगैरह
गायब है, बस एक-एक रुपए वाली दो चार डबल रोटियाँ बची हैं. सम्बल भी थोड़ा और दुबला,
मैला और काला सा दिख रहा है.
" कइसा चल रहा है जी"
उन्होंने पूछ भी लिया.
" ठीक है साहेब." उत्तर में
कृतज्ञता भरी मुस्कान भी थी, फिर उत्साह से उसने कहा- "
जानते है, आज बईमान न, सहर छोड़के कही भाग गया है."
" कौन, सोनी? " चौबे जी ने
पूछा.
सम्बल ने मस्ती में तीन-चार बार सिर डुलाया. यानि जी हाँ जनाब, वही.
" क्यों, क्या हो गया?"
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" एकदम ख़राब वाला केस था साहेब, लड़की के साथ जबरजस्ती
वाला. पुलिस खोज रहा है.
"
चौबे जी को थोड़ा अचरज हुआ. सोनी बच-बच के खेलने वाला खिलाड़ी था
.
ऐसी गफ़लत उससे कैसे हो गई?
" भागेगा तो कहाँ भागेगा?
"
चाय छानते हुए सम्बल ने मुदित स्वर में कहा-
" कल नई
पकड़ेगा तो परसों पकड़ लेगा. गरीब आदमी का पईसा खा के बचेगा नई. है ना साहिब?
"
चाय सामने धरकर सम्बल तनिक दूर बैठकर बर्तन साफ करने लगा. चौबे जी ने सिन्हा सर से
धीरे से कहा-
" इ मूरख अपना धंधा नहीं देख रहा है. इसी
में लहालोट है कि पुलिस सोनी को पकड़
रही है. अजीब पगलेट
है.
"
"एक्चुअली हुआ क्या कि..." सिन्हा सर अधिकृ़त, विस्तृत और विधिवतक बोलने वाले आदमी
थे. बताने लगे कि एक थोड़ी मेंटल केस लड़की से उसका चक्कर था. अब ये इडियट समझ नहीं
पाया. परसों शाम को लड़की इसके होटल में आ गई. ये कुछ बोल दिया तो वो फार्म में आ
गई, भारी न्यूसेंस क्रिएट कर दी. सोनी ने उसे बाहर निकलवा दिया तो वो सीधे थाने चली
गई, एफआईआर करवा दी. अब पुलिस की चांदी है. अभी अरेस्ट नहीं करने का पैसा लेंगे.
फिर अरेस्ट करेंगे तो गाली-गुप्ता नहीं करने का पैसा लेंगे, फिर नहीं मारने-पीटने
का पैसा लेंगे, रिमांड पर नहीं लेने का पैसा लेंगे. यही तो एक ऐसा डिपार्टमेंट है
जो कुछ करने का नहीं, बल्कि कुछ नहीं करने का पैसा लेता है. एक्चुअली इंडिया के
सिस्टम में...
चौबेजी ने महसूस किया कि चाय निहायत बुरी बनी है.
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सम्बल उस आदमी को सम्राट होटल वाले सोनी के हार्ट-अटैक की
सूचना दे रहा था. तत्परता और मुस्कान के साथ.
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" चाय बनाए हो कि क्या बनाए हो यार"
बुरा सा मुँह बना कर उन्होंने सम्बल को कोसा.
" उसको मत पीजिए साहेब."
सम्बल ने तत्परता से कहा,"एक मिनट में दूसरा बना देता
हूँ."
" एक्चुअली क्या है कि..." से शुरू करके सिन्हा सर इस
बार चायपत्ती के मार्केट से लेकर उपभोरक्तावाद, क्रिक्रेट, फ़िल्म स्टार, टीबी के
कार्यक्रमों के बारे में सदाबहार, अधिकृत और विस्तृत ढंग से बोलते रहे. जब तक कि
फिर चाय न आ गई जो कदरन काफी बेहतर थी. पैसे भी सम्बल एक ही बार की चाय के ले रहा
था पर गुप्ता जी ने जबरन दोनों बार के दिए. सिन्हा सर ने इस संव्यवहार पर भी एक
छोटा सा प्रवचन किया, पर तब तक चौबे जी का मूड काफी उखड़ चुका था, सो बात ख़त्म
हुई.
इसके 10-12 मिनट दिनों के बाद प्रोफेसर सिन्हा से सम्बल की मुलाकात सब्ज़ी मार्केट
में हुई. इतवार का दिन था. सिन्हा सर इतवारी बाज़ार के बाहर स्कूटर स्टैंड पर खड़े
थे. स्टैंड वाला कहीं चिल्लर लेने गया था. सिन्हा सर स्कूटर को स्टैंड में ही रखते
थे. आजकल चोरियाँ कितनी बढ़ गई हैं. उन्हें थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था. तभी वह
विनम्र व प्रसन्न पुकार आई.
" साहेब, नमस्कार. भाजी लेने आए हैं?
"
सम्बल कंघे पर एक बाँस टिकाए खड़ा था. बाँस के सिर पर धागों से लटकी 20-25 पॉलीथीन
के थैलों में हवाई मिठाई थी. एक-एक रूपए वाली.
" चाय ठेला बंद कर दिया क्या यार! "
उन्होंने बेमन से पूछा.
" फायदा नई था उसमें " सम्बल
ने मुस्कुराते हुए कहा.
" और इसमें? " सिन्हा सर ने
व्यंग्य से पूछा.
" ये ठीक काम है साहेब."
सम्बल को व्यंग्य से मलतब नहीं था- "घुमेगा-फिरेगा तो
चालीस-पचास रुपए मिल जाएगा."
सिन्हा सर ने गौर किया, सम्बल की हालत बहुत ख़स्ता थी. वह एकदम मैला-कुचैला, बदरंग
और फटेहाल नज़र आ रहा था. पर चेहरे पर संतुष्टि व बेफीक्री थी.
" चलो, ठीक है..." वे
बुदबुदाकर रह गए.
" मालूम है? " अचानक सम्बल ने
उत्साह से और राज़दाराना ढंग से कहा- " बईमान को
हाड-अटेक हो गया है, बहिरे ले गया है."
‘अच्छा.’ सिन्हा सर ने बेमन से कहा
" सक्कर का बेमारी तो पहले से था."
सम्बल ने मुस्कुराते हुए कहा-" गुस्सा बहुत करता है ना.
हम भी पईसा मांगा था तो..."
" ओय हवाई मिठाई... !
" एक आदमी ने पुकार लगाई. साथ एक छोटा बच्चा भी था. बच्चा ऊँगली उठाकर कुछ
बोल रहा था.
तब तक स्टैंड वाला लड़का भी आ गया. स्कूटर उसके हवाले करके सिन्हा सर मार्केट की ओर
बढ़े तो वे सम्बल की बगल से गुज़रे.
सम्बल उस आदमी को सम्राट होटल वाले सोनी के हार्ट-अटैक की सूचना दे रहा था. तत्परता
और मुस्कान के साथ.
कमबख़्त, अजीब जीवट आदमी है, सिन्हा सर ने सोचा और हँस
पड़े.
22.12.2008,
01.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित