वर्तमान संकट और पूंजीवाद का भविष्य | जोसेफ स्टिगलिज | Joseph Stiglitz
विचार
वर्तमान संकट और पूंजीवाद का भविष्य
जोसेफ स्टिगलिज
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिज
नवउदारवादी अर्थशास्त्रियों की जमात में इसलिए अलग जाने जाते हैं क्योंकि इन्होंने
लगातार वित्तीय बाजारों और उन पर अमेरिका के वर्चस्व की मुखालफत की है. उन्होंने नई
दिल्ली के मावलंकर सभागार में 20 दिसंबर 2008 को दसवां डी. टी. लकड़ावाला स्मृति
व्याख्यान दिया जिसे इंस्टिटयूट ऑफ सोशल साइंसेज ने भारत सरकार के योजना आयोग के
सहयोग से आयोजित किया था. व्याख्यान काफी लंबा और दिलचस्प रहा जिसमें उन्होंने
विस्तार से मौजूदा आर्थिक संकट के स्रोत और इसके परिणामों पर चर्चा की. प्रस्तुत है
उनके व्याख्यान का मूल पाठ, जिसका रूपांतरण
अभिषेक श्रीवास्तव
ने किया है.
यह दुनिया महान मंदी के बाद सबसे बुरे आर्थिक संकट से गुजर रही है. कर्ज की उपलब्धता
सिकुड़ती जा रही है, उत्पादन गिरता जा रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है और अधिकतर
परिसंपत्तियों की कीमतें गोता मार रही हैं. ऐसा लगता है कि यह गिरावट न सिर्फ लंबे
समय तक ठहरने वाली है, बल्कि और गहराती भी जाएगी.
इस संकट के बारे में अनुमान लगाया जा सकता था, और ऐसा किया भी गया था. बदकिस्मती
कहें कि मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों, नेताओं और नीति-निर्माताओं ने
ऐसी चेतावनियों की उपेक्षा कर दी. इस किस्म की विफलताओं और अर्थव्यवस्था
की नाकामी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है.
आखिरकार, पूरी दुनिया को लग रहा है कि कुछ तो किया ही जाना चाहिए. अचानक हम सभी
लॉर्ड कीन्स के चेले बन गए हैं. बहुत पुरानी बात नहीं है जब कीन्स के
अर्थशास्त्र को घिसा-पिटा पुराना सिध्दांत कह के खारिज कर दिया जाता था. यह दावे
किए जाते थे कि कीन्सवाद बाजार द्वारा आत्मसंतुलन और आत्मनियमन की उसकी क्षमताओं
को कम कर के आंकता है.
कीन्स का अर्थशास्त्र सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, इसके एक से ज्यादा संस्करण
संभव हैं. हिक्स द्वारा लोकप्रिय बनाया गया कीन्सवाद का मानक संस्करण वेतन-भत्तों
और कीमतों में कठमुल्लापन को केंद्र में रखता था. इस सिध्दांत का दूसरा सिरा
हालांकि निष्क्रिय और अनादर्श वित्तीय क्षेत्र की भूमिका पर जोर देता है, जो
इरविंग फिशर के सिध्दांत के ज्यादा करीब है. इस सिरे को हम मिन्सकी, ग्रीनवाल्ड
और स्टिगलिज तक भी खींच कर ला सकते हैं.
वास्तविकता यही है कि मौजूदा संकट अमेरिका के वित्तीय क्षेत्र की नाकामी से उपजा है
जो पूंजी के आवंटन और जोखिम के प्रबंधन में असफल हो गया. इस बार के संकट में हमें
छोटी-छोटी नाकामियों का एक समुच्चय दिखाई देता है जो आपस में मिल कर बड़े पैमाने पर
एक विशाल संकट को जन्म दे चुका है. वित्तीय क्षेत्र ने न सिर्फ जोखिम भरे कर्ज दिए,
बल्कि डेरिवेटिव, क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप जैसे तमाम नए वित्तीय औजारों के माध्यम से
इसने अरबों डॉलर जुए में झोंक दिए. यह काम इतने जटिल और दबे-छुपे तरीके से किया गया
कि यहां तक बैंक भी अपनी बैलेंस शीट को पढ़ और समझ पाने में नाकाम रहे. उन बैंकों की
तो बात ही छोड़ दें जिन्होंने कर्जे लिए थे. नतीजा यह हुआ कि कर्ज का बाजार बर्फ की
मानिंद जम गया.
यह तो स्वाभाविक ही था, क्योंकि संकट का स्रोत ही एक निष्क्रिय वित्तीय क्षेत्र रहा,
जो अपने सहयोग के केंद्र में इसी क्षेत्र को रखता है, अन्य किसी को नहीं. जैसे-जैसे
इस क्षेत्र में पूंजी का ईंधन डाला गया, यह क्षेत्र इस पूंजी को लाभांश और बोनस के
रूप में देता गया. दिलचस्प बात यह है कि जिस त्रुटिपूर्ण
ढांचे, नियमन और कॉरपोरेट प्रशासन के गड़बडझाले ने जोखिम भरे कर्जों को जन्म दिया और
उसे मंजूरी दी थी, उनमें किसी किस्म का परिवर्तन नहीं किया गया. इस दौरान सिकुड़ती
अर्थव्यवस्था और बढ़ती अनिश्चितता के दौर में बैंकों को दोबारा पूंजी मुहैया कराए
जाने के बावजूद उनके पास कर्ज देने को रत्ती भर भी पूंजी नहीं बची.
अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व कर्ज के इस खेल में सबसे पहला दानदाता बन कर
उभरा, जिसने सभी प्रमुख निगमों को जीवनदान रूपी कर्ज दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में
उसके पास जोखिम प्रबंधन की कोई ठोस प्रणाली मौजूद नहीं थी
जिसके चलते उसकी बैलेंस शीट 2.3 लाख करोड़ डॉलर के बोझ तले दब गई. बैंक नहीं चाहता
था कि जिस तरह उसे महामंदी के लिए दोषी ठहराया गया था, इस बार भी वैसा ही हो,
हालांकि यह बात तय थी उसकी लचर मौद्रिक नीति और नियमन ने ही वित्तीय पतन का मंच
तैयार किया था.
समय
रहते कार्रवाई करने में उसकी नाकामी ने ही यह सुनिश्चित किया कि मौजूदा संकट
द्वितीय विश्व युध्दोत्तर काल का सबसे लंबा चलने वाला संकट होगा. फेडरल रिजर्व और
अमेरिकी वित्त विभाग ने मिल कर जिस अराजक तरीके से निगमों को बेलआउट (राहत पैकेज)
दिया तथा एक से दूसरी रणनीति पर आए दिन उछलते रहे, इससे न सिर्फ बाजारों का
आत्मविश्वास चूर हो गया बल्कि भविष्य की दिक्कतों के लिए एक परिपाटी बन गई. सवाल
उठता है कि यदि इनके द्वारा दिए गए कर्जे भी नहीं लौटाए गए, तो क्या होगा? क्या
फेडरल रिजर्व अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौट आने के बाद नियम-कायदे के तहत अपना पैसा
वापस ले सकेगा?
हम दरअसल दिमागी हेमरेज से जूझ रहे वित्तीय क्षेत्र की शिराओं में बड़े पैमाने पर
रक्त बदलने का काम करते रहे, जबकि दिक्कत की जड़ कहीं और थी. जड़ पर हमला नहीं किया
जा रहा था. अमेरिकी वित्त विभाग और फेडरल रिजर्व ने यह संदेश दिया कि मसला सिर्फ
आत्मविश्वास के चुकने का है, इसलिए 700 अरब डॉलर का राहत पैकेज घोषित कर दो जिससे
कीमतें स्थिर हो जाएंगी और कंपनियों पर ताला नहीं लगेगा. यह वाहियात सोच थी; हमारे
यहां दरअसल आवासीय क्षेत्र में एक बुलबुला बन चुका था और आज भी इसमें काफी हवा बची
हुई है जिसका निकलना बाकी है.
आगे पढ़ें
बुश की आर्थिक नीतियों को तो लोगों ने नवंबर के चुनावों में ही खारिज कर दिया था.
ऐसा लगता है कि बुश इस बात को पचा नहीं पाए हैं. इस दौरान अर्थव्यवस्था ने और गोता
मारा है. ओबामा सब जोड़-जाड़ कर एक बड़ा प्रयास करने के कगार पर हैं ताकि लंबी दौड़ में
अमेरिका की जरूरतों को पूरा किया जा सके- चाहे वह बुनियादी ढांचे की जरूरत हो, हरित
प्रौद्योगिकी की या स्कूलों की.
इनके प्रभाव हालांकि तत्काल दिखाई नहीं देंगे, इसलिए कहा जा सकता है कि बेरोजगारी
बढ़ती रहेगी और मंदी जारी रहेगी. उन्होंने वादा किया है कि अगले दो साल में वह ढाई
लाख लोगों को नौकरियां देंगे. यह अपर्याप्त है; हमें पटरी पर वापस लाने के लिए इस
संख्या के तीन गुना रोजगारों की फिलहाल जरूरत है.
आगे
अभी और लड़ाई बाकी है; जैसे-जैसे देश पर कर्ज बढ़ता जाएगा, वित्तीय बाजार के खिलाड़ी
मौद्रिक कठमुल्लापन के चोले में सिमटते जाएंगे, खासकर तब जब उन्हें अपना बेलआउट मिल
चुका है और जनता नहीं चाहती कि उनके लिए कुछ और किया जाए. वे अपने खर्चों में सीमित
बढ़ोतरी की मांग करेंगे. वे वित्तीय क्षेत्र को दिए गए बेलआउट के पुनर्गठन के खिलाफ
दलीलें देंगे, ताकि सरकार अपनी पूंजी को ज्यादा प्रभावी तरीके से उनसे वापस ले सके.
वे कठोर नियमन के खिलाफ दलीलें देंगे. वे चिल्लाएंगे कि नियमन की प्रक्रिया में इतना
कठोर नहीं होना चाहिए कि मौलिकता और नवाचार का ही दमन हो जाए.
|
भूमंडलीकरण के नए दौर की यह पहली वैश्विक मंदी है. इसकी
प्रतिक्रिया भी वैश्विक ही होनी चाहिए. हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि
वैश्विक वित्तीय तंत्र बेहद विकृत हो चुका है.
 |
अगर
पिछले कुछ वर्षों में इस मौलिकता और नवाचार की बात करें, तो वित्तीय क्षेत्र में यह
लेखा प्रणाली, नियमन और करों में अंतर का फायदा उठाने की सीमा से आगे नहीं बढ़ सका;
इस नवाचार ने संसाधनों के बेहतर आवंटन या बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए कुछ भी नहीं
किया. मसलन, वित्तीय खिलाड़ियों ने ऐसा कोई तरीका नहीं ईजाद किया जिससे ब्याज दरों
में उतार-चढ़ाव की स्थिति में अमेरिकी मकान मालिकों को कम से कम उनके मकानों में रहने
भर की सुरक्षा हासिल हो सके और जोखिम दूर हो सके. बेहतर नियमन इस अर्थ में यह
सुनिश्चित कर सकेगा कि निजी क्षेत्र को दी गई रियायतों और सामाजिक परिणामों के बीच
संतुलन बना रहे सके. इससे ऐसे नवाचारों को सीधे बढ़ावा मिल सकेगा जो सामाजिक रूप से
ज्यादा उत्पादक हों.
पिछले ढाई दशक से वैकल्पिक आर्थिक दर्शन को लेकर एक जंग छिड़ी हुई है. अंतरराष्ट्रीय
आर्थिक संस्थानों पर बाजार को लेकर कठमुल्लापन तारी रहा है, जो वॉशिंगटन घोषणापत्र
की नीतियों के रूप में प्रतिबिंबित होता है. अकादमिक क्षेत्र की बात करें, तो इसके
कई हलकों में तार्किक मॉडल बनते-बिगड़ते रहे. इस दौरान अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक
विज्ञान के क्षेत्रों में हुए आधुनिक अध्ययनों ने दिखाया है कि बाजार अक्सर विफल ही
होते हैं- एडम स्मिथ का अदृश्य हाथ अक्सर अदृश्य इसीलिए रहता है क्योंकि दरअसल इस
नाम की कोई चीज है ही नहीं, खासकर तब जब सूचनाओं में विसंगति और असंतुलन कायम हो.
इन
अध्ययनों में वॉशिंगटन घोषणापत्र की बौध्दिक बुनियाद की उपेक्षा की जाती रही. इन
विचारों के व्यावहारिक साक्ष्य के तौर पर हम इस तथ्य को ले सकते हैं कि जिन देशों
ने वॉशिंगटन घोषणापत्र का अनुसरण किया, उनका प्रदर्शन उनके मुकाबले खराब रहा है
जिन्होंने इसे नहीं माना. मौजूदा अध्याय ऐसे अध्ययनों के समर्थन में व्यावहारिक
साक्ष्य का एक और पन्ना जोड़ता है.
इसके बावजूद हमने अब तक इन परिघटनाओं के संपूर्ण निहितार्थ को नहीं पकड़ा है. मसलन,
कई केंद्रीय बैंक अब भी मुद्रास्फीति पर ही जोर दिए जा रहे हैं, जैसे कि कीमतों में
स्थिरता बनाए रखना ही आर्थिक समृध्दि की पर्याप्त शर्त हो! एक दिशा में सोचने की इस
प्रवृत्ति ने ही वैश्विक पैमाने पर उन गलतियों को जन्म दिया है जो इस मंदी के पहाड़
तले परत दर परत जमी हैं.
भूमंडलीकरण के नए दौर की यह पहली वैश्विक मंदी है. इसकी प्रतिक्रिया भी वैश्विक ही
होनी चाहिए. हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि वैश्विक वित्तीय तंत्र बेहद विकृत
हो चुका है. भले ही इस संकट पर भी अन्य उत्पादों की तरह 'मेड इन यूएसए' का लेबल
चस्पां है, विकासशील देशों की पूंजी लगातार अमेरिका की ओर वापस प्रवाहित हो रही है.
इसकी एक वजह यह हो सकती है कि विकासशील देश आम तौर पर मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों
के मामले में चक्रीय प्रणाली अपनाते हैं, जबकि विकसित देशों में ऐसा नहीं है. इस
किस्म के तूफानों से विकासशील देशों को विकसित देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा नुकसान
पहुंचता है, भले ही सैलाब की शुरुआत दुनिया के विकसित हिस्से से ही क्यों न हुई हो.
दुनिया भर में इस वक्त समन्वित मौद्रिक और राजकोषीय कदम उठाए जाने का महत्व स्वीकारा
जा रहा है, लेकिन जिस किस्म के सुधारों की जरूरत है, वे कहीं ज्यादा गहरे हैं. इसमें
एक वैश्विक भंडार तंत्र बनाए जाने और नई वैश्विक वित्तीय नियमन इकाई के निर्माण की
जरूरत है. यदि ऐसे सुधार किए गए, तभी उम्मीद बंधेगी कि मौजूदा संकट से निकलने के
बाद पूरी दुनिया में तेज और टिकाऊ विकास हो पाएगा और इस समृध्दि को सभी देश मिल कर
साझा कर सकेंगे.
23.12.2008,
13.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित