पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >मुद्दा > Print | Share This  

नोटवापसी की बहस प्रधानमंत्री के लिए

विचार

 

नोटवापसी की बहस प्रधानमंत्री के लिए

अनिल चमड़िया

modi


नोटबंदी को घर वापसी की तरह नोट वापसी के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए.प्रधानमंत्री द्वारा नोट वापसी का ऐलान संसद सत्र के शुरू होने के लगभग हफ्ते भर पहले किया गया.संसदीय व्यवस्था नियमावलियों से ज्यादा परंपराओं और लोकतंत्र के मूल्यों के आधार पर ही मजबूत होती है. 

इसंसदीय नियमावली में दस से ज्यादा प्रावधान है जब संसद सदस्य या संसदीय पार्टी किसी महत्वपूर्ण विषय को सदन में उठा सकती है.काम रोको प्रस्ताव उनमें एक है और विपक्ष इसका यदा कदा ही इस्तेमाल करता है और वह भी जब कोई विषय जनमानस पर गहरा असर डालता हो. यदि चौहदवी लोकसभा के उदाहरण से इसे समझें तो लोकसभा में काम रोको प्रस्ताव के लिए 163 बार नोटिस दी गई लेकिन महज सात नोटिस स्वीकृत हुई और उसके तहत 38 घंटे पचास मिनट तक चर्चा हुई.लेकिन दूसरी तरफ उसी लोकसभा में नियम 193 के तहत 58 बार बहस की स्वीकृति दी गई.

तकनीकी तौर पर समझे तो एक प्रस्ताव पर बहस और एक विषय पर बहस होता है. प्रस्ताव का मतलब उसे पारित करना व खारिज करने के लिए मतदान करना होता है जबकि विषय पर बहस में इसकी जरूरत नहीं होती है.

8 नवंबर की रात प्रधानमंत्री की 500 और 1000 के नोट की वापसी का ऐलान हर खास और आम को गहरे तौर पर प्रभावित कर रहा है. अपने पैसा बैंकों से लेने के लिए कई दर्जन लोगों को मौत का सामना करना पड़ा
है.मनमोहन सिंह के आकलन को माने तो प्रधानमंत्री के इस फैसले से सकल घरेलू उत्पाद 2 प्रतिशत कम हो सकता है.नोट वापसी की परिस्थितियों ने हर जन प्रतिनिधि पर दबाव बनाया है.

इस अनुमान के बारे में यहां बातचीत का कोई संदर्भ नहीं है कि नोट वापसी से काले धन बनने के स्रोत को कितना नष्ट करेगा. तात्कालिक विषय है कि प्रधानमंत्री ने नोट वापसी का श्रेय खुद लिया है और उसकी वजह से
रोजमर्रे की आम जिंदगी प्रभावित हो रही है.ऐसे में संसदीय लोकतंत्र के तहत सदन का सत्र चालू हो तो क्या किया जाना चाहिए.

नोट वापसी का विषय का इतना दबाव हैं कि सभी विपक्षी पार्टियां ही नहीं बल्कि सत्ताधारी समूह के सदस्य दल भी एकजूट हो गए हैं. विपक्ष की संसद में मांग क्या है-क) सदन में प्रधानमंत्री बहस के दौरान हाजिर हो 2) काम
रोको प्रस्ताव के तहत लोकसभा में बहस हो और 3) संयुक्त संसदीय समिति यानी लोकसभा और राज्यसभा के विभिन्न पार्टियों के सदस्यों की एक समिति का गठन किया जाए. सत्ताधारी पार्टी इन मांगों को स्वीकार नहीं कर
रही है.

वास्तव में प्रचार और वास्तविकता के बीच खाई चौड़ी होती चली गई है. संसदीय लोकतंत्र में परंपरा, मूल्य बनाम संचार तकनीक वाली स्थिति देखने को मिल रही है. लोगों के बीच तकनीकी साधनों के जरिये प्रचार को
वास्तविकता के रूप में ले जाने को ज्यादा महत्व राजनीतिक पार्टियां नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से देने लगी है.

नई आर्थिक नीति देशकाल की वास्तविकता से तालमेल नहीं बैठा सकती लिहाजा उस नीति के लिए प्रचार का महत्व ज्यादा हो जाता है. नोट वापसी को काले धन को ही समाप्त करने से नहीं जोड़ा जा रहा है बल्कि उससे
आंतरिक सुरक्षा और असामाजिक कार्यों को भी खत्म करने के प्रयास के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन दुनिया भर में नोट वापसी के कई कई अनुभव हमारे सामने है.काला धन अवाध गति से पूरी दुनिया में बढ़ा है.

सरकार कह रही है कि विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा है और विपक्ष अपनी शर्तों प्रधानमंत्री की मौजूदगी, काम रोको प्रस्ताव और संयुक्त संसदीय समिति के गठन के साथ सदन चलनी चाहिए. सत्ता पक्ष ये कह रहा है कि
प्रधानमंत्री के नोट वापसी के ऐलान का 90 प्रतिशत लोगों का समर्थन है. यानी वह सर्वे के जरिये समर्थन दिखा रही है और दूसरी तरफ विपक्ष बैंकों के आगे लंबी लंबी कतारें और घरों में परेशानियों के हमले को प्रदर्शित कर
रही है.

जन समर्थन किसके साथ है इस मसले को भी यहां छोड़ दें. मसला सिर्फ सदन के चलने से जुड़ा है. ये तो तथ्य सामने आ चुका है कि नोट वापसी का फैसला रिजर्व बैंक का नहीं था.वित्त मंत्री की भी उसमें हिस्सेदारी नहीं थी
और यह प्रक्रिया पिछले छह महीने से चल रही थी और उसकी खबरें भी आ चुकी थी.यानी प्रधानमंत्री अकेले काले धन को समाप्त करने के अपने चुनावी ऐलान की इसे एक कड़ी के रूप में पेश उस समय भी लोगों के बीच
जाकर कर रहे हैं जबकि सदन का सत्र चालू हैं.

संसदीय परंपरा ये कहती है कि सत्र के दौरान सरकार को सदन के जरिये ही बातचीत करनी चाहिए. नोट वापसी के विषय पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री का संसद के अंदर बैठने के मांग असंसदीय नहीं है और इस तरह की
मांग नहीं के बराबर होती है. जब होती है तो इसका मतलब ये निकाला जाता है कि स्थितियां सभी स्तरों पर भिन्न है. एकजूट विपक्ष का स्वर ये नहीं है कि प्रधानमंत्री अपने ऐलान को वापस लें.

संसदीय लोकतंत्र में ये आवाज ज्यादा से ज्यादा सुनाई देने लगी है कि विपक्ष सदन को चलने नहीं दे रहा है. दरअसल सदन का चलना अब तो कतई सदन में तय नहीं होता है.संसदीय व्यवहार हर स्तर पर परिवर्तित हो चुके है
और संसद सदस्य अपने आप में स्वतंत्र नहीं रह गया है.इसीलिए सदन से पहले सरकार और सदन में विपक्ष की पार्टियों के बीच एक समझौता होता है.संसदीय परंपरा में ये माना जाता है कि सदन को चलाने की प्राथमिक
जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की ही होती है.

संसद के पिछले सत्र को यदि याद करें तो उस दौरान सरकार के कई फैसलों के साथ विपक्ष ने अपनी सहमति जतायी. सदन का चलने का यह कतई अर्थ नहीं है कि सदस्य एक जगह जमा हो जाए.संसद का चलने का अर्थ
लोगों की भावनाओं को प्रतिबिंबित करना होता है. संसद की बहस में प्रधानमंत्री की आम सभाओं की तरह एकतरफा संवाद संभव नहीं होता है बल्कि प्रधानमंत्री को अपनी जवाबदेही पर भी खरा उतरना होता है. जवाब देना
होता है.

जवाहर लाल नेहरू ने विपक्ष की भूमिका को लेकर कहा था कि मजबूत आलोचको, उसके द्वारा तगड़े विरोध का सामना करने वाली सरकार में मैं पूरी तरह विश्वास करता हूं. बिना आलोचना के लोग और सरकार निष्क्रिय हो
जाते हैं. सरकार की पूरी संसदीय व्यवस्था ऐसी ही आलोचना पर निर्भर है. संसद के चलने और न चलने को महज प्रचार की सामग्री बनाने से लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है.

28.11.2016 11.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in