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सच हुआ बेमतलब

विचार

 

सच हुआ बेमतलब

सत्येंद्र रंजन


हाल ही में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने “post-truth” को 2016 का वर्ड ऑफ द ईयर यानी साल का सबसे प्रचलित शब्द घोषित किया. इस शब्दकोश के संपादकों के मुताबिक इस वर्ष इस शब्द के इस्तेमाल में 2,000 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई. .

post truth


शब्दकोश के मुताबिक यह विशेषण उन परिस्थितियों को व्यक्त करता है, जब जनमत का निर्माण करने में वस्तुगत तथ्य- भावनात्मक अपील और निजी विश्वासों से कम प्रभावशाली हो जाएं. इस शब्द का उपयोग ब्रिटेन में ब्रेग्जिट और अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप की बढ़ती लोकप्रियता के साथ तेजी से बढ़ा.

पश्चिमी दुनिया की विकासशील देशों में ज्यादा रुचि नहीं रहती. वरना, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के संपादकों की नजर भारत में नरेंद्र मोदी अथवा फिलीपीन्स में रोद्रिगो दुतेर्तो की जीत से जुड़ी परिस्थितियों पर भी गई होती. इन दोनों देशों की आम भाषा अंग्रेजी नहीं है, इसलिए मुमकिन है कि यहां उन परिस्थितियों को व्यक्त करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ हो. मगर यहां के हालात भी काफी कुछ ब्रेग्जिट या ट्रंप परिघटना जैसे ही थे.

बहरहाल, इन्हीं रूझानों को देखते हुए जानकारों ने इस युग को पोस्ट ट्रूथ राजनीति का दौर कहा है. इस शब्द का हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास करें, तो उचित शब्द संभवतः “उत्तर सत्य” होगा. धारणा बनी है कि इस दौर में अपनी पसंद के आंकड़ों को चुनना, मनमाना निष्कर्ष निकलना और उन्हें आबादी के एक बड़े हिस्से में स्वीकृत बनवाना आसान हो गया है.

तथ्यात्मक रूप से निराधार ऐसे निष्कर्षों को इस दौर में अक्सर उपयुक्त चुनौती नहीं मिली है. या उन्हें चुनौती देने की कोशिशें नाकाम रही हैं. इसीलिए ऐसे निष्कर्षों से जनमत तथा चुनाव परिणामों को अपनी तरफ मोड़ने में जनोत्तेजक नेताओं (Demagogue) को स्पष्ट सफलताएं मिली हैं.

इस परिघटना को समझने के लिए आवश्यक है कि हम ‘वस्तुगत’ या ‘सत्य’ को समझने का प्रयास करें. इन दोनों शब्दों का संबंध आधुनिक विज्ञान से है. विज्ञान असल में वह प्रक्रिया है, जिसमें परिकल्पना को गढ़ने और उसे स्वरूप देने के बाद उसके सही या गलत होने का परीक्षण किया जाता है. समाज विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे परीक्षण उपलब्ध तथ्यों, ऐतिहासिक दृष्टांतो और तर्कों के आधार पर किए जाते हैं.

इस विश्लेषण से निकले नतीजों को समकक्ष विद्वानों की समीक्षा के लिए प्रस्तुत किया जाता है. अगर सभी- या अधिकांश विद्वान उस तथ्य की पुष्टि करें, तो उसे वस्तुगत या सत्य कहा जाता है. दरअसल, तमाम मानवीय ज्ञान ऐसी ही बौद्धिक प्रक्रिया का परिणाम है. मानव सभ्यता का विकास-क्रम ऐसी ही प्रक्रियाओं और परिघटनाओं से आगे बढ़ा है.

सभ्य समाजों में बौद्धिक वर्ग की उपस्थिति को इसीलिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उन्हें सत्य और वस्तुगत जीवन मूल्यों का पहरेदार समझा जाता है. वैसे इतिहास में कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जिसे पूर्ण सत्य का युग कहा जाए. पोस्ट ट्रूथ शब्द से जिन स्थितियों की अभिव्यक्ति होती है, वे मानव इतिहास में हर जगह, हर समय मौजूद रही हैं.

सुदूर अतीत में तो तथ्यों के वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रभावी परंपरा की तलाश कर पाना कठिन है. वैसी परंपरा होती, तो लोकतंत्र एवं सार्वभौम मानव अधिकारों की अवधारणा के उदय लिए मानवता को आधुनिक काल का इतंजार नहीं करना पड़ता. जिसे आज ट्रूथ या सत्य कह रहे हैं, वह असल में आधुनिक समय में लोकतंत्र एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं के अस्तित्व में आने के बाद ही प्रभावी हुआ. वह भी पूर्ण रूप से हुआ, यह कहने का कोई ठोस आधार नहीं है.

फिर भी यह कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं थी कि इस काल में ज्ञान महज अनुभव-जन्य नहीं रहा. बल्कि उसे रूप देने में तथ्य, तर्क और समकक्ष समीक्षा की निर्णायक भूमिका हो गई. यह चलन स्थापित होने से पहले के समय को हम चाहें तो प्री-ट्रूथ (सत्य-पूर्व) कह सकते हैं. वह स्थिति संवाद एवं संचार के उस समय उपलब्ध माध्यमों के अनुरूप थी. दरअसल, सार्वजनिक बहस, प्रतिवाद और समकक्ष समीक्षा के क्रम में ऐसे माध्यम बेहद अहम हैं. ऐसे नए माध्यमों के उदय के साथ हमेशा ही तत्कालीन स्थितियों में परिवर्तन आया है. प्रिटिंग प्रेस, रेडियो या टीवी इसके उदाहरण हैं.

वर्तमान में इंटरनेट और सोशल मीडिया के उदय एवं प्रसार ने एक बार फिर चीजों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है. सोशल मीडिया ने न सिर्फ हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है, बल्कि अपनी मनपसंद चर्चा में शामिल होने, अपने अनुरूप तथ्यों या आंकड़ों को चुनने और मनमाफिक नतीजे निकालने में भी इसने उन्हें सक्षम बना दिया है.
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