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बाज़ार भरोसे खेती नहीं दुगनी करेगी आय

विचार

 

बाज़ार भरोसे खेती नहीं दुगनी करेगी आय

देविंदर शर्मा


इस वक्त जब किसान की आय दोगुनी करना आम जुमला बन गया है, तो नीति आयोग, नाबार्ड, कृषि विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां और यहां तक कि कृषि से दूर का संबंध रखने वाला भी इस पर चर्चा कर रहा है.
 

किसान

इजहां किसान की आय दोगुनी करने पर होने वाले सेमिनार व सम्मेलनों की संख्या पिछले कुछ माह में दोगुनी हो गई है, वहीं किसान उत्तरोत्तर नुकसान के दुश्चक्र में फंसता चला जा रहा है. दो साल पहले आए लगातार दो सूखे, नोटबंदी से घटी आय, अनुमान के मुताबिक आमदनी में खासतौर पर सब्जी उगाने वाले किसानों की आय में 50 से 70 फीसदी कमी आई है.

मजे की बात है कि मैं जिन बहस व चर्चाओं में शामिल हुआ उनमें दलीलें अपरिहार्य रूप से उन्हीं सिद्धांतों के आसपास घूमती हैं- फसलों की उत्पादकता बढ़ाना, सिंचाई का विस्तार करना, फसल बीमा और इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चरल मार्केट प्लेटफॉर्म (ई-नाम) को मजबूत बनाना. भारत में सिर्फ 1.3 फीसदी आबादी वेतन पाती है, जिसमें निजी क्षेत्र भी शामिल है. इसके विपरीत 52 फीसदी से अधिक आबादी यानी मोटेतौर पर 60 करोड़ लोग कृषि पर आधारित हैं. इस क्षेत्र में काम करने वालों को भारतीय श्रम सम्मलेन 1957 की सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम मजदूरी मिलती है.

उस हिसाब से न्यूनतम मजदूरी न्यूनतम मानवीय जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए, जिसके लिए कुछ मानदंड तय किए गए हैं : एक, आदर्श कार्यशील परिवार में कमाने वाले एक व्यक्ति पर तीन व्यक्तियों की निर्भरता. इसमें महिला, बच्चों व किशोरों की कमाई को ख्याल में नहीं लिया गया है. दो, मध्यम दर्जे की क्रियाशीलता वाले औसत वयस्क के लिए 2,700 कैलोरी कुल दैनिक आहार. तीन, प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति 18 यार्ड कपड़ा.

चार लोगों के औसत खेतिहर परिवार के लिए 72 यार्ड कपड़े की जरूरत है. चार, सब्सिडी प्राप्त औद्योगिक अावास योजना के तहत कम आमदनी वाले समूहों को उपलब्ध कराए जाने वाले न्यूनतम क्षेत्र के मुताबिक आवास किराया. पांच, ईंधन, रोशनी तथा अन्य मदों पर खर्च कुल न्यूनतम आय का 20 फीसदी.

बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1991 में जारी आदेश में न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए छह मानदंड तय किए गए : बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा जरूरतें, त्योहार, समारोह सहित न्यूनतम मनोरंजन, विवाह तथा वृद्धावस्था के लिए प्रावधान, जो मजदूरी का 20 फीसदी होना चाहिए. आदेश में महंगाई भत्ते को शामिल करने को भी कहा गया है.

दूसरे शब्दों में इन मानकों से सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी न्यूनतम मासिक आमदनी तय होती है. अजीब बात यह है कि इन्हीं मानकों पर अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और योजनाकारों को निश्चित आय होती है लेकिन, जब वे आमदनी दोगुनी करने की चर्चा में इनकी पूरी तरह उपेक्षा कर देते हैं तो दोहरे मानदंडों की गंध आती है. अपने वेतन को तो मानकों का संरक्षण देना, जबकि बहुसंख्यक आबादी को बाजार की दुश्वारियों के हवाले कर देना.

छत्तीसगढ़ में बम्पर फसल के बावजूद हाल ही में टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने वाले किसानों से पूछिए कि बाजार की तानाशाही का क्या मतलब होता है. कर्नाटक व उत्तरप्रदेश में गन्ना किसानों के उन परिवारों से बाजार का मतलब पूछिए, जिन्होंने महीनों तक गन्ने की बकाया राशि के भुगतान का इंतजार करते हुए अाखिरकार खुदकुशी की है.

प्राथमिकता तो घोर असमानता के मौजूदा स्तर से निपटने की है, जो आर्थिक नीति से और गंभीर हुई है और जिसका फसलों की उत्पादकता से कोई संबंध नहीं है. बरसों से मैं किसानों के लिए पृथक आमदनी आयोग की मांग कर रहा हूं ताकि वह किसानों को हर माह निश्चित आमदनी सुनिश्चित कर सके.

यदि उत्पादकता खेती के संकट का कारण होती तो पंजाब के किसानों द्वारा बड़ी संख्या में खुदकुशी का कोई कारण नहीं है. प्रति हैक्टेयर 45 क्विंटल गेहूं और 60 क्विंटल चावल के साथ पंजाब वैश्विक चार्ट में शीर्ष पर है. 98 फीसदी सुनिश्चित सिंचाई के बावजूद शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब किसान वहां अात्महत्या नहीं करता.

इसलिए 1991 के सुप्रीम कोर्ट के मानकों और सम्मानजनक जीवन जीने के 1957 के मानकों को इस्तेमाल करते हुए हम कुछ अर्थशास्त्री, शोधकर्ता और कृषि कार्यकर्ता दिसंबर में हैदराबाद में आयोजित वर्कशॉप में जुटे ताकि किसानों के लिए सुरक्षित आय का कोई मॉडल तैयार किया जा सके.

इसके बाद जनवरी के पहले हफ्ते में केरल में एक और वर्कशॉप हुई, जिसमें दस अर्थशास्त्रियों और नीतिगत शोधकर्ताओं ने खेती करते समय किसान जो इकोसिस्टम संरक्षण सेवाएं देता है, उसका भुगतान तय करने का प्रयास किया, जिसका किसान हकदार है. संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में ग्रीन इकोनॉमी के संदर्भ में ईकोसिस्टम सेवाओं का आकलन अब वैश्विक चलन है.

किसान व कई नागरिक संगठन स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट लागू करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें किसान को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने की सिफारिश है. इसमें यह ध्यान नहीं रखा गया है कि केवल 6 फीसदी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का फायदा मिलता है और शेष 94 फीसदी को सहायता देने का कोई तरीका नहीं है.

एमएसपी निश्चित ही किसानों को सुनिश्चत आय देने का एक तरीका होगा, लेकिन हमें शेष किसानों को निश्चित आय देने का तरीका खोजना होगा. जब निचले स्तर के कर्मचारी के लिए 18 हजार रुपए की न्यूनतम मासिक आय और गैर-कृषि मजदूर के लिए 351 रुपए की न्यूनतम दैनिक मजदूरी तय की गई है तो अन्नदाता को कर्ज के दुश्चक्र में फंसाने वाली आय के साथ नहीं छोड़ा जा सकता.

हमारे अनुमानों के मुताबिक किसान सस्ता अनाज मुहैया कराने की बड़ी कीमत चुकाता है, जो प्रतिवर्ष 12 लाख करोड़ रुपए है. यदि किसान की जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की सेवाएं ध्यान में लें उसे प्रति हैक्टेयर न्यूनतम 14 हजार रुपए का भुगतान जायज है.

यह तो सीमित आकलन है और किसान की आय दोगुनी करने की चर्चा में इसे आधार बनाना चाहिए. समय आ गया है कि किसान की आमदनी दोगुनी करने के लिए उत्पादकता, अनुबंध पर खेती और मार्केटिंग के निजीकरण के परे सोचना होगा. दुर्भाग्य से अर्थशास्त्रियों ने खेती में सार्वजनिक व निजी निवेश को आमदनी समझ लिया है

14.02.2017 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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