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बदलाव का मौका फिर खोया

विचार

 

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

मुकेश भूषण


विश्व के सबसे पहले लोकतंत्र अमेरिका और सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हाल की घटनाओं से ऐसा लगता है कि दोनों देशों के मिजाज में कुछ ऐसी गड़बड़ी हो रही है, जिसे बॉलीवुड की भाषा में ‘केमिकल लोचा’ कहा जा सकता है. .

india america


‘अमेरिका’ नामक विचार के खिलाफ वहां नस्लीय हिंसा बढ़ी है जो उनलोगों को परेशान कर रही है जिन्हें ‘अमेरिका’ पर नाज रहा है. हमारे यहां भी कथित ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का बढ़ता प्रभाव उन लोगों को बेचैन कर रहा है जिन्हें ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ पर ऐतबार रहा है, जो ‘भारत’ नामक विचार के केंद्र में है.

दोनों देशों में यह बदलाव ‘ग्लोबलाइजेशन’ का ‘आफ्टर इफेक्ट’ माना जा रहा है. लंबे समय तक चली विश्व बाजार व्यवस्था ने दुनिया में भूख, बेरोजगारी और गरीबी को बढ़ाया है. इससे दोनों देशों में समाज नया राजनीतिक नेतृत्व खोजने को विवश हुआ. पर यह नया नेतृत्व दोनों स्थानों पर कर क्या रहा है?

अमेरिका में यह नेतृत्व जहां अपने आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर नस्ल और क्षेत्र आधारित हिंसा को बढ़ा रहा है. वहीं, यहां भारत में यह भारतीय राष्ट्रवाद के स्थान पर हिंदू राष्ट्रवाद की स्थापना के प्रयासों में असली समस्याओं की गंभीरता गुम कर रहा है.

दोनों नेतृत्व की सफलता-विफलता का आंकलन तो भविष्य में होगा, फिलहाल इनके कारण जो दोनों की शान को बट्टा लग रहा है, क्या उसकी भरपाई भविष्य में हो पाएगी?

अमेरिका के कंसास में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास कुचीबोतला की हत्या और अन्य भारतीयों को अमेरिका छोड़कर जाने की मिल रही धमकियों से वैसे भारतीयों की नींद उडी हुई है जिनके निकट संबंधी वहां रह रहे हैं.
इनमें मोदीभक्ति (इनदिनों देशभक्ति का पर्यायवाची) के आनंद में डूबे वे लोग भी शामिल हैं जो नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप में बेहतर ‘केमिकल इक्वेशन’ की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

ऐसे लोगों में मानवीय संवेदनशीलता यदि हो तो वे अल्पसंख्यक वर्ग के उस ‘भय के मनोविज्ञान’ को समझने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे समझाने का प्रयास ‘भारत’ नामक विचार में हमेशा किया जाता रहा है.
इसीलिए अपने पतनशील अवस्था में भी यहां भारतीय राष्ट्रवाद जगाने के प्रयास ही किए गए, हिंदू राष्ट्रवाद के नहीं. हिंदू राष्ट्रवाद का सफाया तो सम्राट अशोक ने अपने कार्यकाल में ही कर दिया था, जिसके ‘स्वर्णकाल की गाथाएं’ उग्र राष्ट्रवादी गाते नहीं अघाते.

भारतीय राष्ट्रवाद की स्थापना के लिए विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी व खान अब्दुल गफ्फार खान तक सबने अपना योगदान दिया, जिनका जीवनदर्शन वैदिक, सनातनी, इस्लामी, बौद्ध, जैन या कोई अन्य था.
भारत ने अंग्रेजों की दासता से मुक्ति पाई तो इसी भारतीय राष्ट्रवाद के कारण, हिंदू राष्ट्रवाद की वजह से नहीं. अब अगर भारतीय राष्ट्रवाद राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ता दिख रहा है तो इसके लिए हिंदू राष्ट्रवादियों की खूबियों से ज्यादा उस कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराना उचित होगा जिसने कभी भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का राजनीतिक नेतृत्व किया था.

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, राष्ट्र-राज्य की शत्रुता और धर्म-जात-नस्ल आधारित नफरत में यदि उन्हें कोई फर्क समझ आता तो वे दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर की वैचारिक परिपक्वता को समझ पाते जिसमें, उसने कहा था कि, ‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा’.

बात-बात में किसी समूह या संप्रदाय को देश से भगा देने की धमकी देनेवाले हरियाणा के मंत्री अनिल विज जैसों के लिए इस ‘नफरत और युद्ध’ के रिश्ते को समझ पाना उतना ही मुश्किल है जितना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए.  उनके लिए तो आरएसएस नेता डॉक्टर कुंदन चंद्रावत द्वारा केरल के मुख्यमंत्री विजयन का सिर काटकर लानेवाले को इनाम देने की घोषणा और इस्लामी आतंकवादियों द्वारा सिर कलम करने में कोई समानता खोजना भी उतना ही मुश्किल है.

लेकिन, सबकुछ समझकर भी मासूम बने रहने का गुण कोई नरेंद्र मोदी से सीख सकता है, जो अपने भक्तों को समझाने के लिए उचित राजनीतिक मौके की प्रतीक्षा में हैं. वह मौका पांच राज्यों में हो रहे चुनाव के बाद शायद उन्हें मिल जाए.

भारत-अमेरिका में हिंसक घटनाओं या हिंसक विचारों की अभिव्यक्ति से ऐसा लगता है कि वैश्वीकरण और राष्ट्रवाद दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं. इसीलिए राष्ट्रवाद का उबाल ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ जंग का ऐलान समझा जाता है. यह गलत भी नहीं है. पर अब दुनिया जिस वैचारिक स्थान पर खड़ी है, वहां से न तो हम दुनिया से कटकर रह सकते हैं और न ही अपने देश को भूल सकते हैं.

विपरीत होने के बावजूद, वैश्वीकरण और राष्ट्रवाद दोनों साथ-साथ चल सकते हैं. बशर्ते उन्हें ‘गांधी दर्शन’ को केंद्र में रखकर चलाया जाए. जिसका मूलमंत्र है- आर्थिक प्रगति लेकिन, लालच पर नियंत्रण. हितों की रक्षा पर, नफरत से परहेज. स्वाभिमान जरूरी मगर, दूसरों का अपमान कभी नहीं. तभी तो राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व करने के बावजूद गांधी को विश्व ने अपना नेता माना.

यह सम्मान उसी नेता को मिल सकता है जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन करते समय भी मानचेस्टर में बेरोजगार हो रहे कामगारों के प्रति चिंतित हो रहा हो. अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी युद्ध लड़ते हुए भी सहज मानवीय प्रेम बरकरार रखना कोई गांधी से सीख सकता है.

इस दर्शन के बगैर दोनों को साथ-साथ चलाने की कोशिश सिर्फ एक छलावा ही हो सकती है. दुनिया इसकी शिकार हुई है. ऐसा लगता है कि अमेरिकी अब उस छलावे से बाहर आने को बेताब हो रहे हैं जिससे, वे पूरी दुनिया को ठगते रहे हैं.

यही वजह है कि पूरी दुनिया को ग्लोबलाइजेशन और उदार आर्थिक नीतियों का पाठ पढ़ाने के बाद अब वे राष्ट्रवादी कवच में अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं (पहले भी एकहद तक ऐसा करते रहे हैं).

यह कमोवेश वैसा ही है जैसा भारत सरकार मध्यम वर्ग को देशभक्ति और धार्मिक गौरव का परम आनंद प्रदान करते हुए उच्च वर्ग के आर्थिक हितों को सुरक्षा-कवच दे रही है.

भारत में देशभक्ति का आभासी उबाल और अमेरिका में नस्लीय हिंसा की छिछोरी अभिव्यक्ति के बीच यही समानता है. इस समानता में मोदी और ट्रप के ‘केमिकल इक्वेशन’ को भी परखा जा सकता है.

फर्क सिर्फ इतना है कि ट्रंप स्वयं वाचाल बने हुए हैं जबकि मोदी ने अपने भक्तों को वाचाल होने की छूट दे रखी है. पर इसके लिए सिर्फ भगवा ब्रिगेड को दोष देना उचित नहीं है.

भारत में भी हिंदू राष्ट्रवाद का विचार दम तोड़ सकता था, यदि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय से अल्पसंख्यक वोटबैंक को राजनीतिक खिलौना समझने का सिलसिला शुरू नहीं होता.

कांग्रेस की इस चूक ने ही देश में हिंदू राष्ट्रवाद की जमीन तैयार कर दी. बाद में बढ़ती आर्थिक असमानता ने समस्याओं का समाधान अतीत के गौरव और धार्मिक पलायन में खोजना शुरू कर दिया. इसने हिंदू राष्ट्रवाद की फसल उगा दिया.

बहरहाल, हम उस समय का तो इंतजार कर सकते हैं जब पता चलेगा कि अमेरिका कितना ‘अमेरिका’ बचा रहा? लेकिन, क्या हम उस समय का इंतजार करते रह सकते हैं जब हमें पता चले कि भारत कितना ‘भारत’ बचा?

05.07.2017, 01.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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