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संवैधानिक गणतंत्र के गिने-चुने दिन

विचार

 

संवैधानिक गणतंत्र के गिने-चुने दिन

सत्येंद्र रंजन


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा आते ही जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख उमर अब्दुल्ला ने ट्विट किया कि विपक्ष को अब 2019 को भूल कर 2024 की तैयारी करनी चाहिए. उनकी इस राय से इत्तेफ़ाक रखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं होगी. इसलिए कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम ने देश के राजनीतिक मानस पर एक खास प्रभाव डाला है.

तिरंगा


इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला तो यह कि ये चुनाव नोटबंदी की पृष्ठभूमि में हुआ. पिछले 8 नवंबर को घोषित नोटबंदी ऐसा फैसला था, जिससे प्रभावित हुए बिना शायद ही कोई रहा. भारी दिक्कतों, लंबे समय तक खिंची परेशानी, काम-धंधा चौपट होने, लाखों लोगों का रोजगार जाने और अर्थव्यवस्था पर बेहद खराब असर को देखते हुए यह अनुमान सहज ही लगाया था कि इसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को भुगतना होगा. लेकिन सामने यह आया कि उस फैसले का अगर कोई सियासी असर हुआ, तो वह भाजपा के फायदे में गया.


इस बात को सामान्य तर्क से समझना कठिन है. लेकिन निहितार्थ स्पष्ट है. नरेंद्र मोदी का आकर्षण बना हुआ है. असत्य बात को भी आबादी के एक बड़े हिस्से से सच मनवा लेने की उनकी क्षमता बरकार है.

दूसरा तथ्य भी कम चौंकाने वाला नहीं है. भाजपा ने 403 सदस्यीय उप्र विधानसभा में अपनी सहयोगी पार्टियों- अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी- के साथ मिल कर 325 सीटें जीतीं. इन तीन दलों ने 41.4 प्रतिशत वोट प्राप्त किए. उनमें अकेले भाजपा ने 39.7 फीसदी मत पाए.

हैरतअंगेज यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा गठबंधन के वोटों में सिर्फ लगभग दो फीसदी की गिरावट आई. यह आम रूझान के बिल्कुल खिलाफ है. लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र को छोड़कर बाकी जहां भी चुनाव हुए, भाजपा के वोटों में पांच से 14 प्रतिशत तक वोट घटे थे. इस बार उत्तराखंड में हालांकि भाजपा को 46.5 प्रतिशत मत मिले, लेकिन यह लोकसभा चुनाव की तुलना में तकरीबन साढ़े 9 फीसदी कम है. लेकिन उप्र के नतीजे तमाम रूझानों और अपेक्षाओं को धता बताने वाले हैं. नरेंद्र मोदी ने उप्र के चुनाव में खुद को दांव पर लगाया. ऐसा करके चुनावी कथानक को बदल देने का अद्भुत करिश्मा उन्होंने दिखाया.

इसे देखते हुए विपक्षी दलों का मनोबल टूटे, तो उसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं है. परंतु बात महज इतनी नहीं हैं. दरअसल, इन चुनाव नतीजों से भारत के वर्तमान संवैधानिक गणतंत्र के सामने पहले से ही मौजूद चुनौती कई गुणा बढ़ गई है. उप्र के चुनाव अभियान में भाजपा ने मुस्लिम विरोधी भावनाओँ को खुलकर हवा दी. शुरुआत किसी मुसलमान को भाजपा का टिकट ना देने से हुई. फिर बात श्मशान बनाम कब्रिस्तान और ईद बनाम दिवाली तक पहुंचा दी गई. मुसलमानों से कथित विशेष व्यवहार तथा उनसे हिंदू अस्मिता- आबरू को कथित खतरे की बात प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से फैलाई गई.

इसमें सोशल मीडिया- खासकर ह्वाट्सऐप ग्रुप्स का व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ. भाजपा ने अति पिछड़ी जातियों में यादव विरोधी और दलितों में जाटव विरोधी भावनाएं भड़का कर उनका भी चुनावी लाभ सफलतापूर्वक उठाया. भाजपा जिस राजनीति की नुमाइंदगी करती है, उसमें ऐसे तौर-तरीकों का अपनाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. अचरज सिर्फ यह है कि ये तरीके इस हद तक कामयाब हुए हैं.

इस सफलता का परिणाम होगा कि अब भाजपा बिना किसी रुकावट के अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनवा सकेगी. अगले कुछ वर्षों में राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जाएगा. मौजूदा सियासी माहौल बना रहा- जिसके कमजोर पड़ने की सूरत फिलहाल नज़र नहीं आती- तो 2019 के बारे में उमर अब्दुल्ला ने जो कहा, उसके सच होने की संभावनाएं काफी मजबूत हैं. इसमें फर्क सिर्फ तभी पड़ सकता है, अगर विपक्षी दल महागठबंधन के “बिहार मॉडल” को अपनाएं.

उसके तहत उप्र में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस हाथ मिलाएं और उसमें राष्ट्रीय लोक दल को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास करें. उस राष्ट्रीय गठबंधन में बिहार के महागठबंधन के अलावा तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, वाईएसआर कांग्रेस, एचडी देवेगौड़ा के जनता दल (एस), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी आदि को भी लाने की कोशिश हो. गौरतलब है कि इसके बावजूद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात जैसे राज्यों में भाजपा को कड़ी चुनौती देने की गुंजाइश कमजोर बनी रहेगी.

बहरहाल, ये संभव नहीं हुआ- अथवा संभव होने के बावजूद चुनाव मैदान में यह प्रयोग विफल हुआ, तो उसके बाद 1950 में स्थापित संवैधानिक गणतंत्र को वर्तमान रूप में बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा. पिछले पौने तीन साल में इस संविधान के रहते हुए भी नरेंद्र मोदी सरकार ने देश का विमर्श बदल दिया है. सत्ताधारी नेताओं के सार्वजनिक व्यवहार, राजनीतिक चर्चाओं और यहां तक कि प्रस्तावित कानूनों में भी बहुसंख्यक वर्चस्व की सोच खुलकर जाहिर हुई है. वैधानिक दायरे में एक खास मिसाल नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन विधेयक है.

यह अगर पारित हुआ तो भारत में नागरिकता तय करने का एक आधार धर्म भी बन जाएगा. समझा जा सकता है कि जब संसद के दोनों सदनों में भाजपा का अपेक्षित बहुमत हो जाएगा, तब इस विधेयक को पास होने से कौन रोक सकेगा? नागरिकता का सिद्धांत हमारे संवैधानिक गणतंत्र की बुनियाद है. इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव संभव हुआ, तो उसके बाद भारत को किस आधार पर धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र समझा जाएगा?

वैसे भी भाजपा जिस वैचारिक परिवार से आती है, धर्मनिरपेक्षता को खत्म करना उसके उद्देश्यों में एक रहा है. सिकुलर कहकर सेकुलर सोच के प्रति अपमान का भाव उनके समर्थक यूं ही नहीं दर्शाते हैं! ये वैचारिक परिवार कभी हमारे वर्तमान संविधान के प्रति भी उत्साहित नहीं रहा. बल्कि लंबे समय तक उससे जुड़े लोग इस पर एतराज जताते थे. अब जबकि सत्ता की चाबी उनके हाथ में है, तो वे इस दस्तावेज को अक्षुण्ण रहने देंगे, यह आशा सिर्फ अति-भोले लोग ही कर सकते हैं.
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