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भारतीय न्यायपालिका के अंतर्विरोध | कनक तिवारी | kanak tiwari

विचार

 

भारतीय न्यायपालिका के अंतर्विरोध

कनक तिवारी

 

 

भारतीय न्याय व्यवस्था अंगरेजों की देन है. जाहिर है जैज संगीतकारों से भारतीय शास्त्रीय गायन की जानकारी की अपेक्षा तो नहीं की जा सकती थी. अंगरेज चले गए लेकिन अपनी भाषा, न्यायपालिका, संसद और नौकरशाही छोड़ गए. ऐसे में यक्ष प्रश्न अट्टहास करता है, 'तो अंगरेज गए कहाँ? भारतीय संविधान की उद्देशिका में लोकतंत्र, सर्वप्रभुत्व सम्पन्नता, समाजवाद और पंथ निरपेक्षता के पायों को मजबूत करने के लिए व्यक्ति की गरिमा बनाये रखने के उद्देश्य से आर्थिक और सामाजिक न्याय करने का हम भारत के लोगों ने संकल्प व्यक्त किया है. आदर्श राज्य व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य आम आदमी को मिले न्याय में ही साकार होता है. उद्देशिका में कानून सम्मत न्याय की कल्पना की गई है.

उच्चतम न्यायालय


कार्यपालिका और विधायिका के साथ न्यायपालिका को त्रिभुज की समान भुजा माना गया है जिसके बिना लोकतंत्र का त्रिकोण नहीं बनता. विधायिका का कार्य विधायन अर्थात् कानून रचने से है. कार्यपालिका कानून के अनुपालन करने से संलग्न होती है. यह न्याय पालिका का कार्य है कि वह देखे कि कानून के अनुसार कार्यपालिका कार्य कर रही है अथवा नहीं. उसे यह भी देखना होता है कि रचा गया विधायन संविधान की मंशाओं के अनुरूप है अथवा नहीं बल्कि यह भी देखना होता है कि संविधान के मूलभूत ढांचे को क्षति पहुंचाने वाले कानून और स्वयं संविधान के संशोधन किस हद तक रद्द किये जा सकते हैं.

उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च न्यायपालिका है. राज्य के स्तर पर उच्च न्यायालय अत्यंत महत्वपूर्ण न्याय केन्द्र हैं. उन्हें परमादेश निकालने की उच्चतम न्यायालय के बराबर अधिकारिता है और वह भी ज्यादा व्यापक आधारों पर. उच्च न्यायालय के तहत कार्यरत जिलास्तरीय न्यायपालिका है जिसके न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य शासन द्वारा की जाती है. जिला स्तर की अथवा कनिष्ठ उपनाम से प्रसिध्द न्यायपालिका को न्याय व्यवस्था का असल बोझ उठाना पड़ता है. सिविल और दांडिक प्रकरणों में संवैधानिक पेंच नहीं होते और न ही ज्यादा विधिक दार्शनिकता होती है. गवाही के आधार पर तय किये जाने वाले ऐसे मामलों में न्यायाधीशों का हाथ बंधता जाता है. राज्य की शासन व्यवस्था भी बहुत अधिक कारगर नहीं होती. इसलिए ऐसे प्रकरणों की संख्या लाखों करोड़ों में अनगिनत और कठिनतर चुनौतियों में बदल जाती है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.

केन्द्रीय बजट में न्यायपालिका का व्यय स्थायी योजना मद में नहीं है. आवश्यतानुसार उसके लिए राशियों का आवंटन किया जाता है. इस बात की सुनिश्चितता है कि 545 सदस्यों की भरी पूरी लोकसभा बनेगी. वरिष्ठ नौकरशाही के सिनेमाघर में 'हाउसफुल' का बोर्ड लटका होता है. राज्यपाल, कुलपति, आयोग जैसे पद करीब करीब भरे होते हैं. मुम्बई और कोलकाता में शेरीफ जैसे पद हैं जिनका अर्थ निन्नानबे प्रतिशत लोग नहीं जानते. नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं. देश के करोड़ों नौजवान बेकार घूम रहे हैं. लेकिन न्यायपालिका है कि तिहाई पद अब भी खाली पड़े हुए हैं.

असल में नेता-सचिव युति जब तक न्यायिक संस्थाओं को अधूरा, आंशिक और अल्पकालीन रखेगी, उसकी तूती बोलती रहेगी. कनिष्ठ न्यायपालिका की नियुक्तियां राज्य सरकारों के जिम्मे हैं. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्तियों में मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों की चलती ही चलती है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का देश में अकेला पद है, जिसके लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं होती. सिफारिश भी तब पता चलती है, जब नियुक्ति हो जाती है. इंग्लैंड में लेकिन न्यायाधीशों की नियुक्तियां बाकायदा समय पर हो रही हैं. अंगरेज जिस तरह फोर्ड, आस्टिन और शेवरले मोटरें छोड़ गया है, वैसे ही अपनी व्यवस्थाएँ. भारतीय बाजार में उनके स्पेयर पार्ट्स भी कहाँ मिलते हैं?

यह न्यायपालिका के लिए सुखद संकेत है कि राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, उद्योगपतियों और डॉक्टरों तथा इंजीनियरों के मुकाबले न्यायाधीशों की बेहतर विश्वसनीयता कायम है. न्यायिक फैसलों को लेकर यही आम धारणा होती है कि न्यायाधीश ने उचित फैसला ही किया होगा. भले ही बहुतेरे फैसले न्यायपूर्ण नहीं होते होंगे. अपने पद और कार्य की विश्वसनीयता को बनाये रखना आज न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. यह अलग बात है कि उच्चतम न्यायालय से लेकर कनिष्ठ न्यायपालिका तक कई ऐसे न्यायाधीश ख्यातनाम हुए हैं जिनकी वजह से हाल के वर्षों में न्यायपालिका का अवमूल्यन भी हुआ है.

अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद न्यायमहल की बुनियाद पूरी तरह चट्टानी नहीं रह गई है. उसकी कुछ चूलें हिलने लगी हैं और जगह-जगह पलस्तर उखड़ गया है. लगभग दो दर्जन ऐसी पुस्तकें खुद शीर्ष न्यायाधीशों ने लिखी हैं जिनमें न्यायपालिका के कार्यों की खुली आलोचना की गई है. दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मुखर्जी सहित पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, लखनऊ, कोलकाता, राजस्थान आदि उच्च न्यायालयों से उमड़ते सवाल कई न्यायाधीशों के चरित्र को लेकर राष्ट्रीय चिंता का कंटूर उकेरते हैं.

अपनी बेबाक टिप्पणी में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस.पी. भरूचा ने न्यायाधीशों के सम्मेलन में कटाक्ष किया था कि उच्च न्यायालयों में हर पांचवा न्यायाधीश भ्रष्टाचार से युक्त है. भरूचा का कथन सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त शिकायतों के तथ्यात्मक अनवेषण की रिपोर्ट पर आधारित था. उसका खंडन करने की हिम्मत देश में किसी को नहीं हुई. एक अनुमान के अनुसार इस समय सुप्रीम कोर्ट में हजारों, उच्च न्यायालय में लाखों तथा कनिष्ठ न्यायपालिका में पूरे देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं. इनमें से सुप्रीम कोर्ट हर वर्ष लगभग उतने मुकदमे निपटा देता है जो एक साल में पैदा होते हैं. उच्च न्यायालय उन पर प्रतिवर्ष लदते तिहाई मामले ही निपटा पाते हैं और अधीनस्थ न्यायालय भी लगभग उतने ही. जिस देश में न्यायपालिका में करोड़ों मामले लंबित हों तब न्यायदान की पध्दति पर सवालिया निशान लग जाता है.

न्यायपालिका की एक बड़ी चुनौती उसमें व्याप्त होते भ्रष्टाचार को लेकर है. कोई भी व्यवस्था दूध की धुली नहीं होती. इसका आशय यही है कि यदि अपुष्ट प्रकरणों को भी शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या कम से कम दो गुनी तो हो ही जाती है. यदि हर तीसरा न्यायाधीश संदेह के घेरे में हो तो न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता कैसे कायम रह पायेगी.

मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की न्यायपालिका में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर खुली चिंता जाहिर की है. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर शासन से पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का तर्क भी साथ-साथ रखा. देश के सर्वोच्च संविधान पुरुष पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी न्यायदान की बदहाली पर अपना असंतोष व्यक्त किया है. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका केन्द्र के विचार और विचार के केन्द्र में है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

singh (sandeepmaurya93@gmail.com) varansi

 
 बस नाम और कागज़ के पन्नों पर ही ये व्यवस्था अच्छी लगती है. वक्त आ गया है कि अब एक नई व्यवस्था की स्थापना की जाए जिसमें आधुनिक साइंस की तरह 1-1% पर खरा उतरा जाए.  
   
 

hari ram tripathi (triveninews@gmail.com) lucknow

 
 this article is eye opener,mind shaker,thought provoking & excellent.
09415020402
 
   
 

दीपक शर्मा (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 न्यायपालिका के खिलाफ़ जनता या पत्रकार कोई खुलकर बोलने कि हिम्मत नही कर सकता क्योकि कोर्ट की अवमानना का डर बना रहता है शायद इसलिये दिखने मे यह लगता है कि लोगो को न्यायपालीका मे पूरा भरोसा है. यह वास्तव मे भरोसा है या भय है ये सोचने की बात है.

आज भी अमीर लोग मंत्री नेता और रसुखदार लोग बडी आसानी से सुनवाई की तारीख आगे पे आगे बढा कर न्यायिक प्रक्रिया को लंबी कर देते है. और जब अखिरकार निर्णय का समय आता है तब उस निर्णय का कोई मतलब नही रह जाता "justice delayed is justice denied " वकील मोटी फ़ीस के एवज मे सच को झुठ और झुठ को सच कर देते है इन सब के समाधान के लिये वकीलो के निजी प्रेक्टिस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये और शासन की तरफ़ से मानदेय दिया जाना चाहिये इससे कुछ हद तक कानून की दलाली पर प्रतिबंध लग सकता है हमे अपने संविधान पर पुनर्विचार की आवश्यकता है !!
 
   
 

afsar ali (afsar_chrm@yahoo.com) chirmiri dist-koria cg

 
 भारत के न्यायिक ढांचे को अब बदलने की ज़रूरत है. निचली अदालतों में कार्यरत कौन न्यायाधीश यह नहीं जानता कि उसकी नाक के नीचे बैठा बाबू हर दिन पेशी की तारीख बढ़ाने के लिए पक्षकारों से पैसा लेता है. ऐसे में पक्षकार उस अदालत से न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है.  
   

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