भारतीय न्यायपालिका के अंतर्विरोध | कनक तिवारी | kanak tiwari
विचार
भारतीय
न्यायपालिका के अंतर्विरोध
कनक तिवारी
भारतीय न्याय व्यवस्था अंगरेजों की देन है. जाहिर है जैज संगीतकारों से भारतीय
शास्त्रीय गायन की जानकारी की अपेक्षा तो नहीं की जा सकती थी. अंगरेज चले गए लेकिन
अपनी भाषा, न्यायपालिका, संसद और नौकरशाही छोड़ गए. ऐसे में यक्ष प्रश्न अट्टहास करता
है, 'तो अंगरेज गए कहाँ? भारतीय संविधान की उद्देशिका में लोकतंत्र, सर्वप्रभुत्व
सम्पन्नता, समाजवाद और पंथ निरपेक्षता के पायों को मजबूत करने के लिए व्यक्ति की
गरिमा बनाये रखने के उद्देश्य से आर्थिक और सामाजिक न्याय करने का हम भारत के लोगों
ने संकल्प व्यक्त किया है. आदर्श राज्य व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य आम आदमी को मिले
न्याय में ही साकार होता है. उद्देशिका में कानून सम्मत न्याय की कल्पना की गई है.
कार्यपालिका और विधायिका के साथ न्यायपालिका को त्रिभुज की समान भुजा माना गया है
जिसके बिना लोकतंत्र का त्रिकोण नहीं बनता. विधायिका का कार्य विधायन अर्थात् कानून
रचने से है. कार्यपालिका कानून के अनुपालन करने से संलग्न होती है. यह न्याय पालिका
का कार्य है कि वह देखे कि कानून के अनुसार कार्यपालिका कार्य कर रही है अथवा नहीं.
उसे यह भी देखना होता है कि रचा गया विधायन संविधान की मंशाओं के अनुरूप है अथवा नहीं
बल्कि यह भी देखना होता है कि संविधान के मूलभूत ढांचे को क्षति पहुंचाने वाले
कानून और स्वयं संविधान के संशोधन किस हद तक रद्द किये जा सकते हैं.
उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च न्यायपालिका है. राज्य के स्तर पर उच्च न्यायालय अत्यंत
महत्वपूर्ण न्याय केन्द्र हैं. उन्हें परमादेश निकालने की उच्चतम न्यायालय के बराबर
अधिकारिता है और वह भी ज्यादा व्यापक आधारों पर. उच्च न्यायालय के तहत कार्यरत
जिलास्तरीय न्यायपालिका है जिसके न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य शासन द्वारा की जाती
है. जिला स्तर की अथवा कनिष्ठ उपनाम से प्रसिध्द न्यायपालिका को न्याय व्यवस्था का
असल बोझ उठाना पड़ता है. सिविल और दांडिक प्रकरणों में संवैधानिक पेंच नहीं होते और
न ही ज्यादा विधिक दार्शनिकता होती है. गवाही के आधार पर तय किये जाने वाले ऐसे
मामलों में न्यायाधीशों का हाथ बंधता जाता है. राज्य की शासन व्यवस्था भी बहुत अधिक
कारगर नहीं होती. इसलिए ऐसे प्रकरणों की संख्या लाखों करोड़ों में अनगिनत और कठिनतर
चुनौतियों में बदल जाती है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.
केन्द्रीय बजट में न्यायपालिका का व्यय स्थायी योजना मद में नहीं है. आवश्यतानुसार
उसके लिए राशियों का आवंटन किया जाता है. इस बात की सुनिश्चितता है कि 545 सदस्यों
की भरी पूरी लोकसभा बनेगी. वरिष्ठ नौकरशाही के सिनेमाघर में 'हाउसफुल' का बोर्ड लटका
होता है. राज्यपाल, कुलपति, आयोग जैसे पद करीब करीब भरे होते हैं. मुम्बई और कोलकाता
में शेरीफ जैसे पद हैं जिनका अर्थ निन्नानबे प्रतिशत लोग नहीं जानते. नौकरियां
उपलब्ध नहीं हैं. देश के करोड़ों नौजवान बेकार घूम रहे हैं. लेकिन न्यायपालिका है कि
तिहाई पद अब भी खाली पड़े हुए हैं.
असल में नेता-सचिव युति जब तक न्यायिक संस्थाओं को अधूरा, आंशिक और अल्पकालीन रखेगी,
उसकी तूती बोलती रहेगी. कनिष्ठ न्यायपालिका की नियुक्तियां राज्य सरकारों के जिम्मे
हैं. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्तियों में मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय
मंत्रियों की चलती ही चलती है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का देश में अकेला पद है,
जिसके लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं होती. सिफारिश भी तब पता चलती है, जब
नियुक्ति हो जाती है. इंग्लैंड में लेकिन न्यायाधीशों की नियुक्तियां बाकायदा समय
पर हो रही हैं. अंगरेज जिस तरह फोर्ड, आस्टिन और शेवरले मोटरें छोड़ गया है, वैसे ही
अपनी व्यवस्थाएँ. भारतीय बाजार में उनके स्पेयर पार्ट्स भी कहाँ मिलते हैं?
यह न्यायपालिका के लिए सुखद संकेत है कि राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, उद्योगपतियों और
डॉक्टरों तथा इंजीनियरों के मुकाबले न्यायाधीशों की बेहतर विश्वसनीयता कायम है.
न्यायिक फैसलों को लेकर यही आम धारणा होती है कि न्यायाधीश ने उचित फैसला ही किया
होगा. भले ही बहुतेरे फैसले न्यायपूर्ण नहीं होते होंगे. अपने पद और कार्य की
विश्वसनीयता को बनाये रखना आज न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. यह अलग बात
है कि उच्चतम न्यायालय से लेकर कनिष्ठ न्यायपालिका तक कई ऐसे न्यायाधीश ख्यातनाम
हुए हैं जिनकी वजह से हाल के वर्षों में न्यायपालिका का अवमूल्यन भी हुआ है.
अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद न्यायमहल की बुनियाद पूरी तरह चट्टानी नहीं रह गई
है. उसकी कुछ चूलें हिलने लगी हैं और जगह-जगह पलस्तर उखड़ गया है. लगभग दो दर्जन ऐसी
पुस्तकें खुद शीर्ष न्यायाधीशों ने लिखी हैं जिनमें न्यायपालिका के कार्यों की खुली
आलोचना की गई है. दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मुखर्जी सहित पंजाब, हरियाणा,
जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, लखनऊ, कोलकाता, राजस्थान आदि उच्च न्यायालयों से उमड़ते सवाल
कई न्यायाधीशों के चरित्र को लेकर राष्ट्रीय चिंता का कंटूर उकेरते हैं.
अपनी बेबाक टिप्पणी में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस.पी. भरूचा ने न्यायाधीशों के
सम्मेलन में कटाक्ष किया था कि उच्च न्यायालयों में हर पांचवा न्यायाधीश भ्रष्टाचार
से युक्त है. भरूचा का कथन सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त शिकायतों के तथ्यात्मक अनवेषण
की रिपोर्ट पर आधारित था. उसका खंडन करने की हिम्मत देश में किसी को नहीं हुई. एक
अनुमान के अनुसार इस समय सुप्रीम कोर्ट में हजारों, उच्च न्यायालय में लाखों तथा
कनिष्ठ न्यायपालिका में पूरे देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं. इनमें से सुप्रीम
कोर्ट हर वर्ष लगभग उतने मुकदमे निपटा देता है जो एक साल में पैदा होते हैं. उच्च
न्यायालय उन पर प्रतिवर्ष लदते तिहाई मामले ही निपटा पाते हैं और अधीनस्थ न्यायालय
भी लगभग उतने ही. जिस देश में न्यायपालिका में करोड़ों मामले लंबित हों तब न्यायदान
की पध्दति पर सवालिया निशान लग जाता है.
न्यायपालिका की एक बड़ी चुनौती उसमें व्याप्त होते भ्रष्टाचार को लेकर है. कोई भी
व्यवस्था दूध की धुली नहीं होती. इसका आशय यही है कि यदि अपुष्ट प्रकरणों को भी
शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या कम से कम दो गुनी तो हो ही जाती है. यदि हर तीसरा
न्यायाधीश संदेह के घेरे में हो तो न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता कैसे कायम रह
पायेगी.
मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की न्यायपालिका में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर खुली
चिंता जाहिर की है. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर शासन से
पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का तर्क भी साथ-साथ रखा. देश के
सर्वोच्च संविधान पुरुष पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी न्यायदान की बदहाली पर
अपना असंतोष व्यक्त किया है. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में न्यायपालिका की सक्रिय
भूमिका केन्द्र के विचार और विचार के केन्द्र में है.
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देश की संविधान जनित संस्थाओं में लेकिन न्यायपालिका अब भी सबसे ज्यादा पारदर्शी और
जवाबदेह लोगों को लगती है. पता नहीं क्यों देश की जनता का उस पर टिकाऊ विश्वास है.
राममंदिर, गुजरात और शंकराचार्य जैसे विवादास्पद साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर लगा
कि न्यायपालिका ने धर्मनिरपेक्षता का झंडा थामा है. न्यायपालिका के कारण देश के
जंगल बहुत तेजी से नहीं कट पा रहे हैं और पर्यावरण की चिंताओं को सम्मान मिला है.
राजनीतिज्ञों के अतिरिक्त भ्रष्ट नौकरशाहों और उद्योगपतियों को भी कुछ न्यायाधीशों
ने उन्हें हाशिये पर खड़ा कर दिया है.
1967 में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बैरिस्टर गोविन्ददास ने 'जस्टिस इन
इंडिया' नाम की एक दुर्लभ किताब लिखी थी. उसके अनुसार गंगा में टेम्स का पानी बहाए
जाने की कोशिश ने गंगा को प्रदूषित कर दिया है. लेखक के अनुसार भारतीय अदालतों में
मामलों का निपटारा होता है, न्याय नहीं मिलता. एक ढीले ढाले लोकतंत्र में व्यवस्था
यदि लक्ष्य पर हावी हो तो और लोक पर तंत्र, तो पथ अनन्त होगा और पाथेय मृगतृष्णा की
तरह झिलमिलाता रहेगा. अब मोरध्वज नहीं हो सकते जो अपने बेटे को आरी से चीर दें.
विक्रमादित्य भी नहीं जिनके पास सिंहासन बत्तीसी हो. जहांगीर तक के दरबार में एक
किस्से के अनुसार बैल को भी न्याय मिला था.
भारतीय न्यायाधीश भारतीय व्यवस्था की पैदाइश तो नहीं ही हैं. बल्कि डेनियल की कथा
के वंशज भी नहीं. उनमें भी राजनीति कूट कूटकर भरी हुई है. जिस देश की विधायिका में
लगभग एक तिहाई सदस्य घोषित या आरोपित अपराधी हों, वहां दोष रहित प्रणाली की वकालत
कैसे हो सकती है. अंग्रेज एक घातक हथियार हमारे लिए छोड़ गया है. उसमें अंग्रेज की
कुटिल बुध्दि का बारूद ही बारूद भरा है. हालांकि यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए
कि अंग्रेज कौम विचार, चरित्र और कर्म के क्षेत्र में दुनिया में अद्वितीय है. यदि
अंग्रेजों की यह न्याय प्रणाली नहीं होती तो उसका विकल्प ढूंढ़ने में भारतीय मनीषियों
को पसीना आ जाता. देश की न्यायपालिका को और अधिक सशक्त, कार्योन्मुख, पारदर्शी और
चरित्रवान बनाए जाने के लिए जनहित में विधायिका को ही पहल करनी होगी.
यह जानने में अटपटा लगता है कि देश के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को छोड़कर ऐसा
कोई पद नहीं है जिस पर नियुक्तियां केवल राजनेताओं और वरिष्ठ नौकरशाहों की सिफारिशों
पर होती है. इस सिलसिले में ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव की ताईद भी करनी
होगी जिसमें यह मांग की गई है कि न्यायाधीशों और वकीलों का काला चोगा अब उतार दिया
जाए और उसके बदले श्वेत वस्त्र पहने जाएं और यह भी कि न्यायालयों में इतनी अधिक
छुट्टियां होती हैं जितनी तो बिचारे किंडर गार्टन में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी
नहीं होतीं.
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सरकारें
विधायिकाओं में यह क्यों नहीं बता सकतीं कि न्यायपालिका की बुनियादी जरूरतों को
पूरा करने के लिए कुल कितने वित्तीय संसाधनों की जरूरत है और इसे पूरा करने में
क्या कठिनाइयाँ हैं?
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न्यायपालिका की अगली चुनौती न्याय की गुणवत्ता को लेकर है. देश के हर बौध्दिक
क्षेत्र में हाल के वर्षों में तेजी से गिरावट आई है. न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं
है. ऐसे कई न्यायाधीश हैं जो प्रकरण के दस्तावेजों को ठीक से पढ़े बिना ही भावना अथवा
अन्य कारणों से तत्काल फैसला करने को तैयार दिखायी देते हैं. न्यायाधीश को तो तूफान
के बीच चट्टान की तरह खड़े होकर पहचान बनानी चाहिए. न्यायाधीशों को समझना चाहिए कि
वे सरस्वती के मंदिर के पुजारी हैं. उन्हें भौतिक समृध्दि के बदले नैतिक उपलब्धि से
सरोकार रखना चाहिए. यह केवल अध्यवसाय, अध्ययन और लगनशीलता से ही सम्भव है. 'त्वरित
न्याय' भारतीय न्यायपालिका का आप्त वाक्य है. इसके बरक्स भारत में दुनिया के सबसे
ज्यादा लंबित मुकदमे हैं, यद्यपि दुनिया के सबसे ज्यादा वकील भारत में ही हैं.
न्याय और विधि की प्रक्रिया इतनी ढीली ढाली और खर्चीली है कि गरीब यदि न्यायालय में
आ गया तो उसके लिए वापस जाने के दरवाजे भी बंद हो जाते हैं.
राजनीति में वंशवाद का आरोप तो खूब फल फूल रहा है लेकिन नौकरशाही और न्यायपालिका
में क्या यही नहीं हो रहा है? बहुत बड़े पिताओं की सन्तानों को नियुक्तियों और
पक्षकार मिलने की अतिरिक्त सुविधाएँ क्या नहीं हैं? कितने अल्पसंख्यकों, आदिवासियों,
अनुसूचित जातियों और महिलाओं की नियुक्तियाँ उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय
में हो पाई? दस प्रतिशत हिस्सा भी इन अपेक्षाकृत कमजोर वर्गों को नहीं मिला. क्या
इन वर्गों में योग्य व्यक्ति नहीं हैं?
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद पर विख्यात विधिशास्त्रियों को भी संविधान के
अनुसार योग्य माना गया है. लेकिन एकाध अपवाद को छोड़कर केवल उच्च न्यायालयों के
न्यायाधीशों को पदोन्नत करने की परम्परा बदस्तूर जारी है! क्या भारत में पिछले पचास
वर्षों में योग्य विधिशास्त्री ही नहीं हुए? मुकदमे हैं कि आबादी, मच्छर और बेकारी
की तरह बढ़ रहे हैं. रटे रटाए उत्तर आते हैं, ''न्यायाधीशों की कमी है. लोग आपस में
लड़ते बहुत हैं. न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है. कमेटियां बन गई हैं.
रिपोर्ट जल्द आ जाएगी. अगले सत्र में विधेयक लाया जा रहा है.'' न्यायिक प्रशासन के
पूरे उत्तारदायित्व को अमली जामा पहनाने के लिए क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट के पास सभी
वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते? देश और प्रदेश की सरकारें विधायिकाओं में यह
क्यों नहीं बता सकतीं कि न्यायपालिका की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कुल
कितने वित्तीय संसाधनों की जरूरत है और इसे पूरा करने में सरकारों को क्या कठिनाइयाँ
हैं?
भारतीय न्यायपालिका को उन बहुत सी अवधारणाओं और मिथकों को भी तोड़ना होगा जो ब्रिटिश
न्याय व्यवस्था ने हमें दी हैं. अमूमन यह मानना कि लोकसेवक ने कानून सम्मत आचरण ही
किया होगा अथवा उनके निर्णय सद्भावनाजन्य ही होंगे-यह अब इतिहास की बातें हैं. अब
तो लोकसेवकों में ऐसे बहुसंख्यक नौकरशाह हैं जो जनसेवा के बदले अपना घर भरने की कला
में प्रवीण हैं. दूसरी अवधारणा भाषा को लेकर है. अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी में
न्याय करते हुए हमारे न्यायाधीश भविष्य की पीढ़ियों के लिए सोच विचार और संवाद की एक
ताजा तरीन भाषा गढ़ सकते हैं. यह भाषा देश की जनता के लिए न्याय का माध्यम होती है.
जरूरत इस बात की है कि अपनी कच्ची उम्र के बावजूद युवा न्यायाधीशों को पक्का संकल्प
लेना होगा, अन्यथा डूबते मूल्यों की इस दुनिया में न्यायपालिका की गाड़ी को ढलान पर
चलते रोकना किसी के लिए भी मुश्किल होगा.
कुछ न्यायाधीश सामाजिक होने में जबरिया परहेज करते हैं. न्यायाधीश का व्यक्तित्व तो
कमल की तरह होता है. वह सामाजिक विग्रह के कीचड़ में रहकर भी अपना यश बचाए रख सकता
है. यद्यपि ऐसा करना सरल नहीं है. अपने व्यक्तित्व का परिष्कार करने के लिए
न्यायाधीशों को निजी पुस्तकालय विकसित करते रहना चाहिए. उन्हें न्यायिक क्षेत्र में
किए जा रहे शोध कार्यों से परिचित होना चाहिए.
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कंप्यूटर और इंटरनेट के युग में ऐसा करना जरूरी है. वरिष्ठ न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं
तथा विधि के प्राध्यापकों से संपर्क रखना कनिष्ठ न्यायाधीशों के लिए उचित होगा. देश
में कई ऐसी बौध्दिक पत्रिकाएं हैं जो विधिक क्षेत्रों की रिपोर्टिंग भी करती हैं.
इसमें कई ऐसे डिस्पैच होते हैं जो न्यायाधीशों के काम के हो सकते हैं. आजकल तो
दूरदर्शन और आकाशवाणी भी ऐसे संस्कारों के लिए साधक बने हुए हैं.
इक्कीसवीं सदी न्याय व्यवस्थाओं की समीक्षा की भी सदी है. न्याय मिलना संविधान की
पहली प्रतिज्ञा है. 'हम भारत के लोग' संविधान के निर्माता हैं, अंकगणित की इकाइयां
नहीं हैं. पक्षकार को जितनी परेशानी अपने विरोधी पक्षकार से नहीं होती, उससे ज्यादा
न्याय व्यवस्था से हो रही है. 'शीघ्र न्याय, त्वरित न्याय', जैसे जुमले हवा में
आकाशवाणी की तरह लहराते रहें. 'द्वार पर न्याय की दस्तक' जैसे मुहावरे भी गढ़े जाएं.
द्वार पर दस्तक तो लेकिन भिखारी, पोस्टमैन और अब कोरियर वाले ही दे रहे हैं. पोलिस
अधिकारियों को नक्सलवादी मार रहे हैं. थानेदार के घर चोरी हो रही है. न्यायाधीश
महोदय लुट रहे हैं. मंत्री महोदय जेल जाकर फिर मंत्रिपरिषद में लौट रहे हैं. कैमरे
के सामने घूस खाकर भी देश के नेता बने हुए हैं.
मजिस्ट्रेट राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश का वारंट निकाले हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट
का हाईकोर्ट पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण (संविधान के अनुसार) नहीं है. अदालती सुधारों
पर राष्ट्रीय बहस चलाने में अवमानना अधिनियम का खतरा है. मुकदमों की पीढ़ियां बीत रही
हों. कातिल छुट्टा घूम रहे हों, भुक्तभोगी दुबके हुए हों. विधवाएँ, परित्यक्ताएँ,
बच्चे, अपाहिज, सेवानिवृत्त कर्मी दर दर की ठोकरें खाकर मामलों में केवल पेशियों की
मनका फेर रहे हों. सफेदपोश अपराधियों, ठेकेदारों, नेताओं, अफसरों के अपराध
मंत्रिपरिषद से खुले आम वापस लिए जा रहे हों-क्या इसी को भारत की इक्कीसवीं सदी कहते
हैं?
न्याय-माता की आंखों पर पट्टी बंधी है. न्यायाधीशों के सिर पर गांधी लटके हैं.
उन्हें नहीं दिखते लेकिन जनता से रूबरू होते हैं. ये सारे प्रतीक उन क्रांतिकारी जन
आकांक्षाओं के हैं जिन्हें अंगरेज अवधारित परम्पराओं ने नागपाश की तरह जकड़ लिया है.
पतलून-स्कर्ट, क्रॉकरी-कटलरी, पिजा-हैम्बर्गर, सॉरी-थैंक यू वगैरह अंगरेजी सभ्यता
के लाक्षणिक चोचले हैं. उसे केवल महिला आयोग, लोक अदालत, फास्ट ट्रैक कोर्ट, मानव
अधिकार आयोग, लोकायुक्त जैसे आनुषंगिक संगठनों के हवाले कर देने से जनवादी अधिकारों
की लड़ाई को मुकम्मिल मुकाम नहीं मिलता.
पिछली केन्द्र सरकार ने संविधान समीक्षा आयोग गठित किया. उसकी भारी भरकम रिपोर्ट
हजार रुपए से कम में नहीं खरीदी जा सकती. वह सरकारी गोदामों में दीमकों से संघर्ष
करने में जुट गई है. उस पर कोई बहस नहीं हो रही है. जनता के गाढ़े पसीने की कमाई
अगले किसी आयोग के गठन पर खर्च हो सकती है. इससे जनता का मनोरंजन होता रहता है. वह
भूख, दर्द और थकान को थोड़ी देर के लिए भूल जाती है.
न्याय बेचारा लखनऊ के इमामबाड़े की भूल भुलैया में फँसा रहता है. सरकार ने कहा कि
न्यायपालिका तय करेगी कि राम का मन्दिर था या नहीं. बड़ी अदालतें आदेश देती हैं कि
सी.बी.आई. इसकी जाँच करे. विधायिका के स्पीकर नाराज हो गए तो आदेश दे देते हैं कि
अमुक अधिकारी को हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद गिरफ्तार कर सदन में पेश किया
जाए. मंत्री यदि गलत भू आवंटन का आरोपी हो तो लोकायुक्त कहे-मुकदमा चलना चाहिए.
राज्यपाल कहे जरूर चलना चाहिए. मंत्रिपरिषद कहे कि इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती.
हाईकोर्ट कहे-ठीक किया. सुप्रीम कोर्ट कहे गलत हुआ. जन असंतोष भड़के तो जांच आयोग के
पास फाइल पहुंच जाए. जाँच आयोग कहे कि कार्यकाल बढ़ाओ क्योंकि जांच पूरी नहीं हुई.
पीड़ित पक्ष 'उगलत निगलत' का अर्थ शब्दकोश में ढूंढ़ता रहे.
न्याय मंदिर में वह सरग निसेनी है जिस पर चढ़कर पुनर्जन्म तक मय ब्याज हिसाब चुकाने
के किस्से घुट्टियों में पिलाए गए हैं. घुट्टी हिन्दुस्तानी है-भूख विदेशी है. पाचन
शक्ति हिन्दुस्तानी है-दवा विदेशी है. बीमारी हिन्दुस्तानी है-इलाज अंगरेजी है. खत
हिन्दुस्तानी है-लिफाफा अंगरेजी है. मजमून मादरी जुबान में है-उच्चारण विदेशी है.
समस्या हिन्दुस्तानी है-समाधान विदेशी है. प्रजा हिन्दुस्तानी है-राजा अब भी
अंगरेजी है. मन्दिर में घंटे, घड़ियाल, शंख, मंजीरों की अलग अलग ध्वनि मिलकर संगीत
की सृष्टि करती है. भक्त भाव में डूब जाते हैं. जो मिल जाता है वह ईश्वर के न्याय
का प्रसाद होता है. मुकदमा तो नारियल की तरह है. ठोंक बजाकर, हिला हिलाकर खरीदें तब
भी कई बार सड़ा निकल जाता है, कई बार अच्छा. प्रसाद तो दोनों स्थिति में खाना पड़ता
है. जीवन में सुख मिले, न मिले, मरने के बाद पुण्य मिल जाए-यही भारतीय परिकल्पना तो
अंगरेज को मालूम थी. तब ही तो वह अब भी राज कर रहा है.
यही वजह है कि गांधी ने 'हिन्द स्वराज' में ब्रिटिश न्यायप्रणाली की फजीहत की है.
अंग्रेज ने पूरा विधायन अपनी सत्ता और सुविधा के लिए रचा था. औपनिवेशिक प्रकृति की
यह न्यायप्रणाली भारत जैसे देश के गरीब लोगों के लिए अनिवार्य या इकलौता विकल्प
नहीं है. निचली अदालतों में लाखों स्त्रियां और बच्चे परित्यक्तता और बेसहारा होने
का अभिशाप ढोते वर्षों तक न्यायालयों की देहरी पर नाक रगड़ते हैं. ताकतवर और मालदार
मुलजिम मूंछें ऐंठते न्यायालयों में जाते हैं. उनको देखकर सरकारी गवाह या तो चूहों
की तरह दुबकते हैं अथवा बेस्ट बेकरी की नायिका जाहिरा शेख की तरह आत्मसमर्पण कर
देते हैं.
कोई भी अदना मजिस्ट्रेट किसी भी बड़े राष्ट्रीय ख्याति के संपादक को गिरफ्तारी वारंट
भेजकर बुलाने का न्यायोत्सव मानता है. हद तो तब हो गई थी जब गुजरात के एक
मजिस्ट्रेट ने भारत के राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश को तलब कर लिया था. यह
मुहावरा देश में क्यों मशहूर है कि यदि कातिल कोई बड़ा वकील कर ले तो उसे कभी सजा
नहीं हो सकती. यह भी उतना ही मशहूर है कि सिविल मामलों में दो-दो तीन-तीन पीढ़ी तक
फैसला होने का सवाल ही नहीं है. इस धमाचौकड़ी में वकीलों के वर्ग की प्रतिष्ठा
धूल-धूसरित हो रही है. पक्षकार उन्हें पेशी टरकाऊ बुध्दिजीवी मानते हैं, जिन्हें
मनुष्य की यंत्रणा में भी फीस लेना एकमात्र प्रयोजन दिखाई पड़ता है.
कई ऐसे कर्मठ और प्रसिध्द भी न्यायाधीश हुए हैं जो अपने दृढ़ संकल्प के चलते मुकदमों
में पक्षकारों को वांछित न्याय देने का इतिहास रचते हैं. ऐसे न्यायाधीश संख्या में
भले कम हों, न्याय प्रणाली की मशाल उनके ही हाथों में है. सामाजिक क्रांति का न्याय
व्यवस्था से सीधा रिश्ता है. यह बात प्रगतिशील न्यायपालिका को अच्छी तरह मालूम है.
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न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर और न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती दो ऐसे नाम हैं (कुछ और नामों
के अतिरिक्त) जिन्होंने भारतीय न्यायपालिका के चेहरे पर रोशनी का हाथ फेरा है.
उन्होंने न्याय प्रणाली की समझ और चेतना का इतना परिष्कार किया है कि भारतीय
न्यायपालिका का यश विदेशों तक विस्तृत हुआ है. कनिष्ठ न्यायपालिका में भी सामाजिक
मूल्यों का समावेश कर न्यायदान करने वाले कई अज्ञात कुलशील न्यायाधीश अब भी हैं.
लोग प्रतिष्ठा, गरिमा, विशेषाधिकार, अविश्वास के पचड़े से अलग थलग पड़े चातक की तरह
न्याय की बाट जोह रहे हैं. न्यायपालिका की जनोन्मुखी भूमिका के लिए दलगत भूमिका से
ऊपर उठकर प्रयत्न करने की जरूरत है. केंद्र के बुध्दि चपल कानून मंत्री और
मुख्यमंत्रियों से ज्यादा कौन फाइलों का रहस्य जानता होगा? यदि निर्धनों को मुफ्त
कानूनी सहायता के काम से सेवानिवृत्ता न्यायाधीश को ही जोड़ दिया जाए, तो क्या फर्क
पड़ता है? वैसे ही मौजूदा न्यायाधीशों के सिर पर काम का बोझ इतना है कि कंधे झुके जा
रहे हैं.
निर्धनों को मुफ्त कानूनी सहायता का सरकारी चोचला भी पुनर्विचार की वस्तु है. इसमें
दया करने की सामन्ती मुद्रा ज्यादा है, जनता के अधिकारों को पुख्ता करने के लिए
तेजाब भरने की भावना कम. ऐसे लोग इन कामों में ज्यादा जुड़े हैं जो न्याय प्रक्रिया
में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं. ये कल्याणकारी योजनाएँ यदि नीति निदेशक सिध्दांतों के
परिच्छेद से निकलकर मूलभूत अधिकारों के इलाके में पहुंचा दी जाएं तो शायद सार्थक
हों.
बयालीसवें संविधान संशोधन के जरिए 1976 में आपातकाल की मुद्रा में इन्दिरा गांधी के
नेतृत्व में धर्म निरपेक्षता, समाजवाद, सम्पत्तिा सम्बन्धी अधिकार, निर्धनों को
मुफ्त कानूनी सहायता जैसे जितने भी प्रावधान जोड़े थे, लगता है विपरीत विचारधारा को
उसमें राजनीति की बू आती है. संविधान समीक्षा आयोग के मत्थे वे सब प्रावधान थे
जिन्हें हटा देने से आपातकाल की याद को मिटाया जा सकता था. इनमें लेकिन गरीबों की
बेहतरी के सवाल शामिल नहीं किए गए. वे सब भी नहीं जिनका मूर्त रूप डॉ0 अम्बेडकर
देखना चाहते थे. न्यायपालिका वह दीवाने खास क्यों है जहाँ अभिजात्यों, कुलीनों के
लिए शास्त्रीय संगीत का आयोजन किया जाए बल्कि दीवाने आम क्यों नहीं है जिसकी लोक
संगीत में बढ़ती रुचि से जनमत के नये तेवर वक्त की दीवार पर उकेरे जा सकते हैं.
भारतीय संविधान संसार के उदारतम संविधानों में एक है. कई मूलभूत अधिकार तो संविधान
ने भारतीय नागरिकों के अतिरिक्त विश्व के हर व्यक्ति को दिए हैं जो उनका इस्तेमाल
करने भारत में उपस्थित हैं. अरुंधति भारत की नागरिक होने के अतिरिक्त अभिव्यक्ति की
लेखकीय आजादी से भी लैस हैं. उन्हें एक झूठे सिध्द हो गए आरोप के सिलसिले में नोटिस
भेजने के पहले प्रकरण दर्ज करने में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में भी चूक हुई. इस
चूक की भी अनदेखी सुप्रीम कोर्ट ने कर दी. अरुंधति के तर्क पूर्ण, साहसी और शोध परक
सवाल उसकी अभिव्यक्ति की आजादी के गले की हड्डी बन गए. इस प्रकरण में यदि सुप्रीम
कोर्ट ने शिकायत कर्ताओं की खबर लेते हुए अरुंधति के जवाबी हलफनामे को एक निर्दोष
लेखिका के रचनात्मक गुस्से का इजहार करार देने की क्षमाशीलता दिखाई होती तो वह
निर्णय ऐतिहासिक हो जाता. उसका निर्णय तकनीकी आधारों पर चाहे जितना सही साबित किया
जाए, जनतंत्रीय अवधारणाएं उसकी लगातार खोज खबर लेती रहेंगी.
भारतीय न्यायपालिका में अनेक प्रख्यात बुध्दिजीवियों के अनुसार 'अलबर्ट पिन्टो को
गुस्सा क्यों आता है' का भाष्य अभिनीत हो रहा है. न्यायपालिका संविधान रचित एक
उदारशीला मातृत्व भी है. विधायिका और कार्यपालिका के निर्णयों के विरुध्द वह रक्षक
लाठी है. उसकी गरिमा की गमक भारतीय वांगमय में सुगन्धि की तरह पसरी पड़ी है. जिस देश
के गांव गांव में पंच परमेश्वर होते रहे हैं, वहां का उच्चतम न्यायालय तो हमारे
संविधान निर्माताओं ने हमारे यश माथे पर चंदन की तरह लीपा है. श्रध्दा मन से उपजती
है, धमकी, क्रोध या सजा से नहीं. अन्यथा हमारा पूरा इतिहास अंग्रेज कौम के प्रति
सश्रध्द ही होता रहता.
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश बेहद सुरक्षित हैं. उनकी सेवा
शर्तें विश्व में सर्वोत्तम हैं. बर्खास्तगी, निलम्बन, प्रताड़ना वगैरह उच्च न्यायिक
सेवाओं के शब्दकोश में नहीं हैं. जिला न्यायालय तक तो खुद की अवमानना के प्रकरण बन
सकते हैं लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के विरुध्द अवमानना के
प्रकरण चल ही नहीं सकते. सुरक्षित मनोदशा में करुणा और क्रोध दोनों ही प्रश्नाशील
हो सकते हैं. अरुंधति ने बर्र के छत्तो में हाथ डाला. यक्ष प्रश्न यह है कि भारतीय
संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की आजादी के पंख क्या अवमानना का कानून कुतर सकता
है. अभिव्यक्ति की आजादी पर लगी बंदिशें भी वर्णित और स्पष्ट हैं. स्वयं सुप्रीम
कोर्ट ने इन्हें सुस्थिर किया है.
वह लक्ष्मण रेखा क्या है, जहां अभिव्यक्ति की आजादी अवमानना की परिधि की अन्या
क्रांति करती है. अरुंधति के प्रकरण में तो यह किस तरह हुआ है? 'अरुंधति के अनुसार
तो सजा नोटिस मिलने से ही शुरू हो गई! यात्रा, निवास, वकील और अन्य सभी तरह के खर्च
सिर पर पड़े. महीनों तक रहने वाला तनाव निरर्थक आरोपों के कारण शुरु हुआ. अपने
निर्दोष होने के हलफनामे में भाषा की बानगी अवमानना कानून की शिकार हो गई. क्या
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी बनाकर अरुंधति को बुलाने में आरोकर्ताओं पर विश्वास करने की
गलती नहीं की? आक्रमणकारी को सजा नहीं मिली, बचाव करने के प्रयास सजा के लायक समझ
लिए गए.
अरुंधति राय ने अपने मामले को प्रेस की अभिव्यक्ति की आजादी से भी जोड़ दिया. प्रेस
को दिन प्रतिदिन न्यायिक निर्णयों की जनहित में समीक्षा करनी पड़ती है. कई बार
निर्णयों के अतिरिक्त न्यायाधीश का आचरण और पृष्ठभूमि के कई तत्वों का निरूपण भी
करना होता है. प्रेस को लगातार दंडित भी होना पड़ा है. इस नाजुक संवैधानिक रिश्ते को
लेकर यह फैसला नये समीकरण लिखने को उत्सुक जान पड़ा.
अरुंधति राय के समर्थन में जेल से छूटते ही नर्मदा बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के
अतिरिक्त प्रख्यात पत्रकार एन राम, विनोद मेहता, प्रभाष जोशी वगैरह सामने आए. विधि
वेत्ता ए.जी. नूरानी, वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी, फली नरीमन, ललित भसीन आदि ने
भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रति असंतोष व्यक्त किया. प्रकाश कराट और ए.बी.
वर्धन जैसे राजनयिकों ने अरुंधति राय के समर्थन में वक्तव्य जारी किए. 'सहमत' और
राष्ट्रीय जनतांत्रिक महिला संगठन ने भी लेखिका का समर्थन किया.
महत्वपूर्ण और दिलचस्प तो यह है कि जिस भारतीय संसद ने अवमानना का कानून रचा, वहां
तो खामोशी रही लेकिन इटली के तीन सौ से ज्यादा सांसदों ने राष्ट्रपति के.आर.
नारायणन को संदेश भेजकर अरुंधति राय की राजनीतिक, नैतिक और साहित्यिक प्रतिबध्दताओं
का समर्थन किया. अमेरिका के लेखकों के समूह ने भी राष्ट्रपति को ऐसा ही सन्देश
भेजा. विख्यात विश्व-बुध्दिजीवी नोम चॉम्स्की ने इस भारतीय लेखिका के साहस की
प्रशंसा की. पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर इसे अभिव्यक्ति के खिलाफ प्रतिबंध
मानते हैं. मशहूर संविधानविद एस.पी. साठे अपनी ताजा पुस्तक में सवाल उठाते हैं
''क्या अवमानना के कानून को सामाजिक सक्रिय संगठनों द्वारा की जा रही आलोचना के लिए
ज्यादा सहिष्णुता प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए?'' उनके अनुसार ऐसा करने से जनआंदोलनों
की पृष्ठभूमि में अमल की जा रही बदुल रणनीति समझने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
आकलन करने में मदद मिलेगी.
23.12.2008,
15.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित