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हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

विचार

 

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

अनिल चमड़िया


भारत के नागरिक और पूर्व नौसैनिक कूलभूषण जाधव को पाकिस्तान की फौजी अदालत द्वारा 10 अप्रैल को मौत की सजा सुनाए जाने का बाद दो तरह की बातें सामने आई. एक तो पाकिस्तान का कहना है कि कूलभूषण जाधव पाकिस्तान में इलियास हुसैन मुबारक पटेल के नाम से सक्रिय थे और वे भारत में खुफिया एजेंसी रॉ के कर्मचारी है. दूसरा कि वे बलूचिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे है.
 

kulbhushan jadhav

दुनिया भर के देशों में ये देखा जाता है कि एक देश की खुफिया एजेंसी दूसरे देशों में अपने एजेंटों को भेजती है और खासकर वैसे देशों में जहां से उस देश के संबंध में तरह तरह की गतिविधियां चलती हो. भारत में भी भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट होने के आरोप में गिरफ्तारियां होती है.

पहली बात तो आरोपों की पुष्टि करने का पहलू सामने आता है और दूसरा उसकी एक न्यायिक प्रक्रिया होती है. फौज की हिरासत में बयान ले लेना कोई बड़ी बात नहीं है. ये तो महज अपने आरोपों और उसके बदले में सजा देने की प्रक्रिया को जायज करार देने की एक कोशिश होती है. लेकिन वैश्विक स्तर पर मान्य न्यायिक मानदंडों के अनुसार इस तरह की प्रक्रिया को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

मसलन भारत में भी जब फौज व पुलिस किसी के खिलाफ आरोप लगाती है तो उसे उस आरोप को अदालत में साबित करना होता है और आरोपित को भी अपनी बात कहने का मौका देने से ही न्यायिक प्रक्रिया को स्वभाविक माना जाता है. लेकिन जिस तरह की राजनीति और उससे निकली सरकारों का चरित्र होता है उसी के मुताबिक उस देश का ढांचा काम करता है.

पाकिस्तान की राजनीति निरंकुश मानी जाती रही है.धर्म और फौज की निरंकुशता सरकारी मकहमों को खुली छूट दे देती है. किसी को भी भी पकड़कर उसे वैसे देश का एजेंट करार दे देना जिससे वहां की घरेलू राजनीति परवान चढ़ती हो, यह आम घटना होती जा रही है. पाकिस्तान की राजनीति का खुराक भारत विरोध है. वह कुलभूषण के बारे में दावा कर रही है कि वह रॉ का एजेंट है लेकिन दूसरी तरफ भारत सरकार का भी दावा है कि उसे पाकिस्तान द्वारा ईरान से अपहरण किया गया.

सैनिकों द्वारा अपहरण सामान्य सी बात है और ऐसे लोगों को अपहृत कर उनका राजनीतिक व रणनीतिक इस्तेमाल करना भी आम बात हो गई है. सवाल इन तमाम बातों के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया का है. क्या पाकिस्तान ने जो आरोप लगाए हैं उनकी पुष्टि के लिए कोई ठोस प्रमाण है? क्या ये नहीं लगता है कि पाकिस्तान के शासकों ने कुलभूषण जाधव को अपना राजनैतिक खुराक बनाना है, ये पहले ही तय कर लिया था.

इसीलिए उन्हें पकड़ने के बाद सीधे मौत की सजा तक पहुंचा दिया. आखिर कुलभूषण जाधव के लिए महज एक न्याय संगत प्रक्रिया अपनाने की मांग को क्यों नहीं स्वीकार किया गया. कुलभूषण जाधव ने सेवा-निवृति के बाद ईरान में अपना व्यापार शुरू किया था.

भारत सरकार ने बार बार दोहराया है कि कुलभूषण का सरकार से कोई रिश्ता नहीं था.लेकिन एक भारतीय नागरिक होने के कारण सरकार का ये कर्तब्य बनता है कि वह अपने नागरिकों के लिए एक वैश्विक स्तर पर मान्य न्यायिक प्रक्रिया को बहाल करने की मांग करें.

आखिर पाकिस्तान की फौजी अदालत ने क्यों नहीं भारत सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार किया कि कुलभूषण जाधव का पक्ष और उसके समर्थन में प्रमाण पेश करने के साथ साथ पाकिस्तान की सरकार द्वारा लगाए गए आरोपों को खंडित करने और पाकिस्तान की सरकार द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों के झुठों पर उंगुली रखने का मौका दें.

पठानकोट में हमले के बाद पाकिस्तान की जांच टीम को आने का मौका दिया गया था.इस उम्मीद के साथ कि पाकिस्तान भी भारत सरकार की जांच टीम को वहां जांच की प्रक्रिया को समझने का मौका दिया जाएगा. यदि वास्तव में दोनों देश इस बात पर सहमत हो कि वे एक दूसरे के खिलाफ होने वाली गतिविधियों व कार्रवाईयों को स्वीकार नहीं करेगी तो पठानकोट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के रास्ते तैयार किए जाते.

लेकिन शायद पाकिस्तान के शासक नहीं चाहते है कि वे अपनी घरेलू राजनीति के लिए भारत शब्द का इस्तेमाल करने के हालात को खत्म करें. दरअसल जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में होने वाली घटनाओं के बाद पाकिस्तान के बलुचिस्तान में लोगों के बीच पनप रहे असंतोष की चर्चा की और वहां के लोगों की आकांक्षाओं को व्यक्त किया तब ये पाकिस्तान के लिए जरूरी हो गया था कि वह बलूचिस्तान में चल रहे जनांदोलनों और पनप रहे जनाक्रोश को विदेशी षडयंत्र का हिस्सा बताने के लिए घटनाओं की रचना करें.

सरकारें जन आंदोलनों को राष्ट्र विरोधी करार देने की कोशिशें करती है ताकि वे अपने नजरिये के प्रति संवैधानिक व्यवस्थाओं का इस्तेमाल कर सकें और लोगों का समर्थन हासिल कर सकें. बलुचिस्तान में असंतोष पाकिस्तान के बनने के साथ ही बना हुआ है लेकिन वहां की सरकार उसे भारत के षडयंत्र के रूप में पेश करने की कोशिश करती रही है.

खासतौर से जब प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उसकी चर्चा की तो पाकिस्तान द्वारा कुलभूषण जाधव द्वारा उसकी पुष्टि कराने की कोशिश दिखती है.लेकिन भारत सरकार पाकिस्तान की पूरी न्यायिक प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर रही है.हालांकि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ का कहना है कि 1952 के पाकिस्तान आर्मी एक्ट के प्रावधानों के तहत जाधव को 40 दिनों के भीतर तीन बार सजा के खिलाफ अपील करने का अधिकार था.लेकिन भारत सरकार ने कहा कि उसे अपील में शामिल होने का मौका ही नहीं दिया गया.

आखिरकार भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अपने वकील को भेजना पड़ा और पाकिस्तान से भी ये साफ तौर कहा कि वह कुलभूषण को फांसी देने के फैसले को हत्या की तरह लेगा.

वास्तव में फांसी की सजा हत्या ही होती है. कुलभूषण जाधव की मौत की सजा का मसला इसका राजनीतिक लाभ उठाने तक सीमित नहीं है बल्कि भविष्य में भी ऐसी मौतों को रोकने की एक आवाज के रूप में लेना चाहिए. भारत में नागरिक समूह कुलभूषण को फांसी की सजा दिए जाने का पूरजोर विरोध कर रहे है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान में भी फांसी की सजा को रद्द करने की मांग उठती रही है.

कुलभूषण जाधव जैसे भारतीय नागरिक पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के किसी भी देश में निरंकुश तरीके से हत्या के फैसले तक पहुंचाए जाते है तो भारत के हर अमन चैन पसंद नागरिक के बीच असंतोष बढ़ता है.पाकिस्तान को भी ये समझना होगा कि कुलभूषण जाधव की हत्या का फैसला लेकर वह न तो बलुचिस्तान में लोगों के असंतोष को दबा सकता है और ना ही भारत से उसके पक्ष में उठने वाली आवाज को ही रोक सकता है. हम कहते है कि हमारे कुलभूषण को छोड़ दो.उसकी मां उसका इंतजार कर रही है.

19.05.2017, 11.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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