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जीएसटी से लगेगा जोर का झटका

विचार

 

जीएसटी से लगेगा जोर का झटका

देविंदर शर्मा


यदि आपको याद हो तो कुछ साल पहले टीवी पर एक विज्ञापन आता था. इस विज्ञापन में आने वाले फिल्मी सितारे गोविंदा यह संदेश देते थे, ‘जोर का झटका धीरे से.’ वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को अमल में लाने की योजना बनाते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी यही रणनीति बनाई और यह काम कर गई.
 

gst

जीएसटी लागू होने के दो दिन बाद वित्तमंत्री ने विभिन्न शहरों में व्यापारियों के विरोध पर अचरज जताया. नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘ ट्रेड में लोग क्यों शिकायत कर रहे हैं, ट्रेड को अपनी जेब से पैसा नहीं देना है, वह तो कंज्यूमर पर लगता है.’ हालांकि, जेटली कह रहे हैं कि कंज्यूमर शिकायत नहीं कर रहे हैं, क्योंकि सरकार ने तर्कसंगत दरें तय की हैं. साफ है कि सरकार ने बहुत चतुराई से यह सुनिश्चित किया है कि ‘जोर का झटका धीरे से लगे.’

सच तो यह है कि उपभोक्ता को तो जीएसटी का दंश भी महसूस नहीं हो रहा है. एेसा इसलिए है कि वित्तमंत्री ने लोगों को जीएसटी की ऊंची दरें बर्दाश्त करने के लिए सर्विस टैक्स बढ़ाकर तैयार कर लिया था. उन्होंने 2015 के बजट में सेवा कर 12.36 से 14 फीसदी तक बढ़ाया जो 2016 में 15 फीसदी कर दिया गया. 2015 में जब सेवा कर 12.36 से 14 फीसदी किया गया था तो कोई हल्ला नहीं मचा. इसे 0.5 फीसदी और बढ़ाया. नाम दिया गया ‘स्वच्छ भारत’ शुल्क. फिर कृषि शुल्क के नाम पर 0.5 फीसदी और बढ़ाया गया. क्रमश: और चरणबद्ध रूप से जैसे सेवा कर बढ़ाया गया उससे उपभोक्ता करों के अतिरिक्त बोझ को सहन करने के लिए तैयार हो गया. विचार यही था कि आम आदमी को धीरे-धीरे बड़ी दरों से एडजस्ट करने के लिए तैयार किया जाए.

सिर्फ आपको एक दृष्टिकोण देने के लिए बताएं कि सेवा कर से ही पिछले वित्त वर्ष में 40 हजार करोड़ रुपए मिले. उसके बाद यदि हम 2015 से उत्तरोत्तर सेवा कर वृद्धि पर विचार करे तो लोगों को यह अहसास ही नहीं है कि वे पहले ही करीब 1 लाख करोड़ रुपए जीएसटी की तैयारी में ही दे चुके हैं. चूंकि 81 फीसदी सेवाएं 18 फीसदी या इससे नीचे की दरों के दायरे में आती हैं तो ग्राहकों ने स्वेच्छा से कीमतों में वृद्धि को स्वीकार किया है. हालांकि 3 फीसदी की वृद्धि को वृहत्तर कल्याण के लिए बहुत छोटा त्याग बताया जा रहा है लेकिन, कुछ महीनों बाद उन्हें इसका अहसास होगा जब जीएसटी सुधार का पूरा बोझ सुविधानजक ढंग से उन पर डाल दिया जाएगा. जैसे इतना ही काफी नहीं था, जो वित्तमंत्री अंतत: 12 और 18 फीसदी की दरों के विलय की संभावना देख रहे हैं.

स्वाभाविक है कि जो आइटम आज 12 फीसदी स्लैब में हैं उन्हें धीरे से 18 फीसदी की श्रेणी में डाल दिया जाएगा. दूसरे शब्दों में जीएसटी सुधारों की पूरी लागत ग्राहक को ही वहन करनी है. इस सुधार से जिन दो तबको को लाभ होना है- कॉर्पोरेट जगत और सरकार, वे दोनों बिना कुछ चुकाए बच निकले हैं. आजाद भारत में जीएसटी अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है. इसके लिए ‘एक देश – एक टैक्स’ का स्लोगन देश की तस्वीर बयां करता है. लोगों को इसमें परेशानियां दिख रही हैं फिर भी वे इसे किसी तरह समझने व समायोजित करने में लगे हैं. कुछ व्यापारियों व कुछ दूसरे वर्गों में हिचक है, फिर भी कंज्यूमर जीएसटी के साथ चलना सीख रहे हैं. जीएसटी के बाद ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक और कंज़्यूमर गुड्स मैन्युफैक्चर सेक्टर से आ रही अच्छी खबरों को थोड़ी बहुत राहत से ज्यादा मान लेना ठीक नहीं होगा.

जो कीमतें कम हुई हैं, उसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि जीएसटी के कारण सभी चीज़ों में कीमतें कम होंगी. जैसे ही जीएसटी के अनुसार बाजार में कामकाज होने लगेगा, कीमतें फिर बढ़ेंगी. इसके लिए वैश्विक स्तर पर जो अनुभव हुए हैं, उन्हें देखना ठीक रहेगा.

पेट्रोलियम, इलेक्ट्रिसिटी, रियल एस्टेट, अल्कोहल जीएसटी के दायरे से बाहर हैं. सरकार के लिए पेट्रोलियम और अल्कोहल टैक्स रेवेन्यू जमा करने का सबसे बड़ा स्रोत हैं, जिसमें सीधा 29 फीसदी अप्रत्यक्ष कर राजस्व के रूप में सरकार को मिलता है. इस तरह सभी तरह के करों से मिलने वाला 41.8 फीसदी रेवेन्यू सरकार को जीएसटी से मिल जाएगा. जीएसटी के 5 स्लैब – 0,5,12,18 और 28 फीसदी दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में 7 स्लैब हैं, उसमें सोने पर 3 फीसदी और अनगढ़ हीरे पर 0.25 फीसदी है. कुछ प्रोडक्ट में सेस लगाया गया है, जो स्लैब की लिमिट से भी ऊपर है. आने वाले दिनों में जैसे ही यह लॉबी सक्रिय होगी, इस तरह के करों की दर और अधिक बढ़ सकती है.

ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि यह गंभीर आघात अति लघु और लघु सेक्टर पर प्रहार करेगा. अंतरराष्ट्रीय अनुभव तो यह बताता है कि जीएसटी वास्तव में बड़े बिज़नेस को बाजार पर अपने नियंत्रण को मजबूत करने में मदद करता है और इस तरह छोटे उद्योग बाजार से बाहर हो जाते हैं. अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला फिर ध्यान दिलाते हैं कि कैसे भ्रष्ट बैंकरों ने पुरानी करंसी की जगह नई करंसी लाकर नोटबंदी को निरर्थक कर दिया. वे खेद जताते हुए कहते हैं कि इसी तरह कई बड़ी कंपनियों के लिए सेल्स टैक्स के दो और एक्साइज के एक अधिकारी की बजाय जीएसटी के एक अधिकारी से सेटिंग करना आसान होगा.

वैट लागू करते समय यही कहा गया था. राज्यसभा के तब के सांसद और अब राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद के वैट संबंधी एक प्रश्न पर तब के वित्त राज्यमंत्री एसएस पालानिमनिकम ने कहा था, ‘वैट बहुत सरल, पारदर्शी, बहु-चरण वाला टैक्स है, जिसमें टैक्स कैडिट का इनपुट है. इससे कई स्तरों पर करारोपण की स्थिति दूर हो जाती है और जिसके कारण कीमतें बढ़ने का जोखिम नहीं रहता.’

रामनाथ कोविंद ने 1 अप्रैल 2005 को वैट लांच होने के एक माह बाद प्रश्न पूछा था. मजे की बात है कि जीएसटी के बारे में पूछे गए प्रश्न पर भी वही उत्तर मिलेगा. जीएसटी के पीछे का आर्थिक तर्क कोई अलग नहीं है. जिस तरह से इसे बनाया गया है उसमें ‘जुगाड़’ का सारा कौशल दिखता है. मुझे खुशी है कि नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबराय ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि जीएसटी से देश के जीडीपी के 1-1.5 फीसदी बढ़ने की बात बकवास है. उन्होंने यह भी एकदम साफ कर दिया है कि जीएसटी 6-7 से ज्यादा देशों में लागू नहीं है

07.07.2017, 15.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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