उड़ रहा है काज़ीरंगा का रंग
उड़ रहा
है काजीरंगा का रंग
दिनकर कुमार
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बढ़ता जा रहा है शिकारियों
का खौफ |
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भारत में गैंडों की लगभग 70 फीसदी आबादी काजीरंगा और इसके आसपास के
जंगलों में बसती है. काजीरंगा में गैंडों के संरक्षण के लिए शुरु
की गई योजना को भी सौ साल हो गए लेकिन शिकारियों के कारण इन गैंडों
पर लगातार खतरा मंडराता रहता है. |
मार्च 2007 की कोई
तारीख़
असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में गैंडों की संख्या बढ़ रही है.
1980 में यहां 939 गैंडे बचे थे, 2006 में इनकी संख्या 1860 के आसपास पहुंच
चुकी है.
गैंडों के शिकार में भी कमी आई है.
मार्च 2008 की कोई तारीख़
असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में गैंडों की संख्या तेजी से घट रही है.
साल भर पहले के जो आंकड़े थे, उनमें भारी कमी की आशंका है.
वन विभाग के अफसरों तक जो आंकड़े पहुंच पाए हैं, उनके अनुसार 2007 में 22 गैंडों
को शिकारियों ने मार डाला.
इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि साल भर में ऐसा क्या हो गया कि काजीरंगा
का पूरा दृश्य ही बदल गया है. लेकिन काजीरंगा का रंग उतर रहा है, इससे किसी को
इंकार नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गैडों के सींग की क़ीमत लगभग 35 हज़ार
डॉलर है और ये सींग ही गैंडों की जान के दुश्मन बन गए हैं.
भारत में गैंडों की लगभग 70 फीसदी आबादी काजीरंगा और इसके आसपास के जंगलों में
ही बसती है. काजीरंगा में गैंडों के संरक्षण के लिए शुरु की गई योजना के सौ साल
से अधिक हो गए हैं. यूनीसेफ ने इस पार्क को विश्व धरोहर सूची में शामिल कर रखा
है. लेकिन जिन गैंडों के कारण काजीरंगा को जाना जाता था, उन पर ही अब ख़तरा
मंडरा रहा है.
पिछले 20 जनवरी को असम के सभी समाचार पत्रों में छपी एक तस्वीर को देखकर
राज्यभर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई. तस्वीर एक मादा गैंडे की थी, जिसे गोली
मारकर घायल करने के बाद शिकारियों ने जीवित अवस्था में ही उसका सींग काट लिया
था और खून की धारा बह रही थी.
इस घटना के बाद अखिल असम छात्र संघ ने गैंडों की हत्या के लिए सीधे तौर पर
राज्य के वन मंत्री रकीबुल हुसैन को दोषी ठहराते हुए उनको हटाए जाने की मांग
की. कई गैर सरकारी संगठनों ने काजीरंगा में असुरक्षित गैंडों की सुरक्षा की
मांग को लेकर आंदोलन शुरु करने की चेतावनी दी. विपक्ष ने भी सरकार को घेरा और
अंततः वनमंत्री ने पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की घोषणा की.
राज्य के वन अधिकारी हमेशा से सुरक्षाकर्मियों की कमी का रोना रोते रहे हैं.
उनका कहना है कि पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मी उपलब्ध नहीं होने के कारण
गैंडों के सींग के तस्कर गैंडों का शिकार करने में कामयाब हो जाते हैं. पहले से
जो सुरक्षाकर्मी तैनात हैं, उनमें से अधिकांश की उम्र 40 से ऊपर है, जिनमें से
आधे से अधिक सुरक्षाकर्मी अक्सर बीमार ही रहते हैं.
इसके अलावा अत्याधुनिक हथियारों से लैश गैंडों के शिकारियों के मुकाबले इन
सुरक्षाकर्मियों के पास के हथियार बेहद पुराने हैं. हालांकि इसके बाद भी
सुरक्षाकर्मियों ने शिकारियों का मुकाबला किया है. 1985 से अब तक सुरक्षाकर्मियों
के साथ हुई मुठभेड़ में कुल 96 शिकारी और तस्कर मारे जा चुके हैं.
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गैंडों के सींग की भारी कीमत के कारण शिकार करने
वालों की संख्या में कमी नहीं आ रही है. |
लेकिन गैंडों के शिकार की बढ़ती घटनाओं के मुकाबले इस तरह
के मुठभेड़ में लगातार कमी आ रही है. इसके पीछे एक बड़ा कारण काजीरंगा में काम
कर रहे अस्थाई कर्मचारियों को हटाने के निर्णय को माना जाता है.
ये अस्थाई कर्मचारी जंगली इलाकों में ही बसने वाले लोग
थे, जो जंगल को बेहतर जानते थे. जंगल के दूसरे कामों के अलावा शिकारियों के
आने-जाने की सूचना भी ये अस्थाई कर्मचारी उपलब्ध करवाते थे. माना जा रहा था कि
इन अस्थाई कर्मचारियों को आने वाले दिनों में स्थाई कर्मचारी का दर्जा दिया
जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
इन कर्मचारियों को स्थाई करने के बजाय इन्हें काम से ही बाहर कर दिया गया.
इलाके को जानने वाले मानते हैं कि अपनी रोजी रोटी से हाथ धो चुके ये अस्थाई
कर्मचारी अब शिकारियों और तस्करों के जाल में फंसे हुए है. शिकारियों को भी अब
ऐसे मार्गदर्शक मिल गए हैं, जो जंगल के चप्पे-चप्पे को पहचानते हैं.
ज़ाहिर है, इन हालात में गैंडों के शिकार पर रोक लगा पाना असंभव न हो तो भी
मुश्किल तो है और इस मुश्किल से निबटने की चिंता कम से कम अभी तो कहीं नज़र
नहीं आती.
04.05.2008, 00.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित