सृजन | एक अबाधित कल्पना शक्ति का सृजन संसार | शंपा शाह
सृजन
एक
अबाधित कल्पना शक्ति का सृजन संसार
शंपा शाह,
भोपाल से
यदि
कालीपद कुम्भकार को किसी जादू के ज़ोर से आईआईटी, क़ानपुर में पढ़ने का मौका मिला होता
तो बहुत संभव है कि आज हमारे देश में कुम्हारों के काम को एक नई दिशा मिल गई होती,
घर घर में फिर से मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल हो रहे होते, हम दुनिया के सबसे बड़े
टेराकोटा एक्सपोर्टर होते और भी न जाने क्या कुछ हो सकता था.
अब यह अटकलबाजी तो है ही कि यदि ऐसा हुआ होता तो उसका परिणाम वैसा होता. लेकिन
हमारे पास और उपाय ही क्या है? क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था में रातों-रात
कोई आमूल-चूल परिवर्तन आ जाये कि जिससे सचमुच में गाँवों में अपनी समस्याओं से
जूझ रहे खाँटी दिमाग को हमारे राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों में जौहर दिखाने का
मौका मिले, इसकी तो दूर-दूर तक कोई संभावना दीखती नहीं. और फिर जब गणित जैसा
महाविज्ञान शून्य और अनंत जैसी धारणाओं यानी 'मान ली गई' सत्ताओं के सहारे ही
अपना महल खड़ा करता है तो भईया हमने क्या बिगाड़ा है?
हम भी यह खयाली पुलाव क्यों न बनायें कि यदि मणिमाला चित्रकार बड़ौदा कॉलेज ऑफ
आर्ट्स में पढ़ाने लगे तो आने वाले समय में हमारी आधुनिक चित्रकला में कौन से अनजाने
मोड़ आयेंगे? या जैसा कि मैंने ऊपर प्रस्तावित किया “ क्या होता जो कालीपद कुम्भकार
अथवा सहदेव राणा को कानपुर आईआईटी में दाखिला मिला होता?”
पश्चिम बंगाल के बाँकुरा जिले के छोटे से गाँव बाँकी संदरा के श्री कालीपद कुम्भकार
से मेरा परिचय 1992 में मिट्टी के पारंपरिक काम पर आयोजित एक राष्ट्रीय शिविर में
हुआ था. उस शिविर में देश भर से अनेक कुम्हार अपने पारंपरिक चाक, अपने इलाके की
मिट्टी आदि लेकर आये थे.
हमारे यहाँ के पारंपरिक कुम्हार के चाक में आमतौर पर बीच में एक छोटा गोल पटा होता
है जिससे चार बाँस जुड़े रहते हैं. इन बाँसों के बाहरी छोरों से परिधि बनाता फिर एक
बाहरी घेरा होता है जो बाँस, लोहे के तार, रस्सी आदि पर मिट्टी थाप कर बनता है. इसी
वजनी और बड़े घेरे के कारण कुम्हार का चाक एक बार घुमाने पर बड़ी देर तक चलता रहता
है.
लेकिन इस भारी भरकम चाक को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल है इसलिये
ज्यादातर कुम्हार बीच का ढाँचा लाते हैं और बाहर का घेरा हर बार नये सिरे से बनाते
हैं. लेकिन इस घेरे के बनने, सूख कर मजबूत होने में टाइम लगता है.
कालीपद जी शिविर के बाद घर लौटकर गए तो उन्होंने इस समस्या पर मनन किया और गजब
का सरल हल ढूंढ़ निकाला. दर्जी के पास जा उन्होंने मजबूत कपड़े की एक गोल टायर
टयूब जैसी थैली सिलवाई. अगली बार जब वे आये तो चाक के लिए उन्होंने मिट्टी की
जगह एक बोरा रेत माँगी. अपने झोले में से कपड़े की टयूब निकाली, उसमें रेत भरी,
उसे चाक के बाहरी घेरे पर जमा कर अच्छी तरह से रस्सी से बाँध दिया. और बस चाक
तैयार था!
शिविर के समाप्त होने पर थैली में से रेत खाली की, फिर मोड़कर अपने झोले में रखी और
अब चाक इतना हलका कि उसे बच्चा भी उठा सकता था!
इसी तरह से कालीपद जी ने मिट्टी की बनी चीज़ों को पकाने के तरीके में भी ज़बरदस्त
परिवर्तन किया है. उनके बाप-दादे कोयले से बर्तन पकाया करते थे पर कालीपद के
जीवनकाल में कोयला महँगा हो चला था. इसलिये कालीपद ने दूसरा उपाय खोज निकाला.
उन्होंने कोयले की जगह लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल शुरू किया.
बुरादा न केवल सस्ता पड़ता है बल्कि इससे आंच भी ज्यादा तेज पैदा होती है. सिर्फ एक
ही मुश्किल है कि भट्टी गरम हो जाये तब एक आदमी को लगातार दो घण्टे तक आग में बुरादा
फेंकना होता है. इसके लिए उन्हें भट्टी की संरचना में बदलाव करना पड़ा. भट्टी के
मुहाने तक एक चौड़ी नाली जैसी खोदनी पड़ी, जिसमें बैठकर व्यक्ति आग में बुरादा झोंक
सकता है. इस विधि से मिट्टी की चीज़ें ज्यादा मजबूत पकती हैं और समय भी कम लगता है.
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यह
तो रही तकनीक को विकसित करने के सिलसिले में उनके दिमाग की एक बानगी. अब यदि
पारंपरिक रूपाकारों में नये रूपाकार जोड़ने की हम बात करें तो यहाँ उनकी अबाधित
कल्पना शक्ति का विस्फोट देखते ही बनता है.
आज
से कोई 27 वर्ष पूर्व कुछ संथाली युवक अठारह किलोमीटर का पैदल रास्ता पार कर
कालीपदजी के पास आये. वे अपने बोंगादेव को प्रसन्न करने के लिये एक मिट्टी का हाथी
चढ़ाना चाहते थे और वही लेने की गरज से कालीपद कुम्भकार के पास आये थे.
कालीपद जी ने उन्हें हाथी के तीन चार प्रकार, जो वे सामान्यत: बनाते थे दिखाये.
लेकिन संथाली युवक कुछ और ही चाहते थे; जिस तरह लक्ष्मी को चढ़ाने के लिये खास
लक्ष्मी हाथी होता है, मनसादेवी को चढ़ाने के लिये मनसा हाथी, उसी तरह बोंगा देव
के लिये एक अलग बोंगा हाथी होना चाहिये.
“ ये बोंगादेव दिखते कैसे हैं? क्या करते हैं? कहाँ रहते हैं?” कालीपदजी ने उन
संथाल युवकों से पूछा.
वे बोले “ बोंगादेव का चेहरा तो आज तक किसी ने नहीं देखा पर जब जंगल में आग लगती है
तो हमारे बुज़ुर्ग कहते हैं कि बोंगादेव की सवारी जा रही है. जहाँ तक करने की बात है
तो वे हमारे बड़े देवता हैं, सब कुछ कर सकते हैं.”
बात पक्की कर, संथाल युवक एक महीने बाद हाथी लेने के लिये दुबारा आने का कहकर अपने
घर वापस चले गये. पर कालीपद जी की तो रातों की नींद उड़ गई. उन्हें इस बात का पूरा
अंदाज़ा था कि संथाली युवकों ने कितनी बड़ी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी. उन्हें ऐसा
हाथी बनाना था जिसे प्राप्त कर बोंगादेव प्रसन्न हो जायें. बोंगा प्रसन्न होंगे तो
खेतों में फसल अच्छी होगी, गाँव से रोग-शोक भागेगा.
कालीपद जी ने मन ही मन बोंगादेव का आह्वान किया और उनके ज़हन में यह बात आई कि यदि
बोंगा देव का चेहरा किसी ने नहीं देखा है तो फिर उनके हाथी का भी अलग से चेहरा नहीं
हो सकता.
मिट्टी तैयार कर वे काम में जुट गये. हाथी का शरीर, पाँव इत्यादि तो बनाये पर अलग
से सिर नहीं बनाया. इस नये हाथी का शरीर ही आगे को झुकता हुआ सूँड में तब्दील हो गया
और सूँड पर ही छोटी-छोटी तिरछी ऑंखें बना दी गईं. जब इस सूंड के किनारे से पंखनूमा
कान और पीछे हवा में लहराती छोटी-सी पूंछ लगी तो उस हाथी में न जाने क्यों जंगल की
आग और उसमें बोंगादेव की रवानगी समा गई. एक महीने बाद संथाली युवक आये और बोंगा हाथी
को देख इतने प्रसन्न हुए कि दुगने दाम देकर गये.
इस बोंगा हाथी पर ही कालीपद जी को बंगाल का पहला राज्य पुरस्कार तथा 1989 में
राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ. कालीपद जी शायद एक मात्र कलाकार होंगे जिन्हें
बारह बार अलग-अलग कृतियों पर राज्य पुरस्कार प्राप्त हुआ.
एक बार वे राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल में मनसा स्थान के लिये मनसा घट (जिसमें
सर्प देवी मनसा को जल चढ़ाया जाता है) बना रहे थे. उन्हें काम करते बीस एक दिन हो
चुके थे पर वे हर दिन एक नए प्रकार का मनसा घट तैयार करते थे. मैंने पूछा, “ आपको
कितनी तरह के मनसा कलश आते हैं?”
वे बोले-“अपने डायरेक्टर से जाकर कहिये मुझे हमेशा के लिये यहाँ रख लें, मैं अपने
अंतिम दिन तक रोज़ एक नया मनसा कलश बनाया करूंगा!” ऐसा निर्भीक जवाब कदाचित एक परंपरा
में पगा हुआ दिमाग ही दे सकता था.
कालीपद जी कोई आठ बरस के थे तब उन्होंने अपने पिता के साथ मिट्टी का काम शुरू किया
था. उनसे छोटे अन्य दो भाइयों ने बीए तक पढ़ाई की और सरकारी नौकरी में लग गये.
कालीपद जी और उनकी पत्नी शैफाली कुम्भकार को इस बात का कोई दुख नहीं रहा कि उन्हें
सारी ज़िन्दगी मिट्टी में खटना पड़ा. अलबत्ता उनके बेटे सपन के मन में कभी-कभी यह बात
ज़रूर आती है कि सरकारी नौकरी में यदि पिता भी होते तो परिवार ज्यादा आराम से रहता.
हालाँकि सपन को इस बात का भी अहसास है कि इस मिट्टी के काम ने ही उनके पिता तथा पूरे
परिवार को यश दिलवाया और देश-दुनिया देखने के अवसर प्रदान किये. मिट्टी के अलावा
कालीपद जी का मन संकीर्तन में भी खूब रमता था. उनकी अपनी कीर्तन मंडली थी जो
रात-रात भर कीर्तन किया करती थी. स्वयं कालीपद जी हारमोनियम बजाने, ढोल-माँदल बजाने,
मूल गायन में निपुण थे. अस्सी पार करने के बाद भी संक्राति जैसे त्यौहार के अवसर पर
वे गाँव की टोली में शामिल हो कीर्तन करते निकल पड़ते थे.
पिछले बरस कालीपदजी नहीं रहे-ऐसा समाचार आया. वे कोई 85-86 बरस की पूरी ज़िन्दगी
जीकर विदा हुए और अपने अंतिम दिन तक मिट्टी में काम करते हुए, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा
से सतत होड़ लेते रहे. उन्होंने अपनी परंपरा से जो कुछ भी लिया था,
उसे कई गुना कर लौटाया. वे उन कलाकारों में से हैं जो परंपरा की धारा को
क्षीण नहीं होने देते, जो उसमें नित नई चेतना, नई ऊर्जा उड़ेलते हैं.
15.01.2009,
03.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित