मुद्दा |दलितों को गले लगा लो अन्यथा... | एल एस हरदेनिया
मुद्दा
दलितों को गले लगा लो अन्यथा...
एल एस हरदेनिया
भोपाल से
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य के दिनांक 11 जनवरी 2009 के
अंक में ''क्रिसमस के दिन एक हजार परिवारों की घर वापसी'' शीर्षक से एक
समाचार छपा है जिसमें बताया गया है कि एक हजार परिवारों के पांच हजार सदस्य ईसाई
धर्म त्यागकर पुन: हिन्दू धर्म में वापिस आ गए.
समाचार में आगे बताया गया है कि इन सभी ने गंगा स्नान कर सामूहिक यज्ञ एवं भोज के
साथ अपने मूल धर्म को स्वीकार कर लिया है. ''घर वापसी'' कार्यक्रम में बड़ी संख्या
में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी व कार्यकर्ता
उपस्थित थे. जिनकी ''घर वापसी'' हुई थी, उन सभी हिन्दुओं, विशेषकर हिन्दू समाज के
वंचित वर्ग को, लोभ, लालच, छल-छद्म, धोखे और दिखावे के द्वारा ईसाई मिशनरियों ने
ईसाइ बनाया था.
''घर वापसी'' कार्यक्रम के दौरान अनेक वक्ताओं ने यह आरोप लगाया कि धर्म परिवर्तन
करवाकर मिशनरियां अपने धर्म को मजबूत करती हैं और देश को कमजोर करती हैं. अब हिन्दू
समाज इस षड़यन्त्र को समझ चुका और उसके विरूद्ध एक हो गया है. इससे मिशनरियां बौखला
गई हैं और दुष्प्रचार के साथ ही हिंसा के मार्ग पर चल पड़ी हैं, जिसका ज्वलंत उदाहरण
है उड़ीसा में स्वामी लक्षमानंद जी की हत्या.
उत्तरप्रदेश के बदायूं नगर में क्रिसमस यानी 25 दिसम्बर के दिन आयोजित इस कार्यक्रम
में अनेक बातें कही गईं परन्तु इस बात पर प्रकाश नहीं डाला गया कि वंचित वर्ग के
लोग हिन्दू धर्म को अलविदा क्यों कह रहे हैं. कार्यक्रम के वक्ताओं ने उन व्यक्तियों
को, जिन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, वंचित वर्ग तो कहा परन्तु यह आश्चर्य की बात
है कि वंचित वर्ग को दलित क्यों नहीं बताया. वक्ता यह बताना भी भूल गए कि यह वंचित
वर्ग इसलिए हिन्दू धर्म छोड़ देता है क्योंकि उसे हिन्दू समाज में अपमान का घूंट
पीकर रहना पड़ता है.
दलितों को किस तरह व किस हद तक अपमानित किया जाता है, उसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश
के छतरपुर जिले का है. छतरपुर जिले की बकस्वाहा तहसील के ग्राम सुनवाहा में दलित
युवक गणेश अहिरवार की शादी थी.
बुंदेलखंड में शादी के एक दिन पूर्व गांव में राछ फिराई की रस्म होती है. इस रस्म
के दौरान दूल्हे को जब घोड़ी पर बैठाकर गांव में घुमाया जा रहा था, उसी दौरान गांव
के दबंगों ने दूल्हे को घोड़ी से उतारकर उसके एवं उसके परिजनों के साथ मारपीट की.
दबंगों का कहना था कि सवर्ण बाहुल्य इस गांव में दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं बैठने
दिया जाएगा. दलितों ने इसकी शिकायत दूसरे दिन बकस्वाहा थाने में दर्ज कराई. 15
दिसम्बर को पुलिस के पहरे में दलित समाज का विवाह कार्यक्रम संपन्न कराया गया.
इस मामले में पुलिस ने 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. घटना के बाद सभी आरोपी
फरार हो गए. बाद में फरार आरोपियों ने एक बार फिर गांव में घुसकर दहशत फैलाई और
दूल्हे के परिजनों के साथ मारपीट कर हवाई फायर किए. आरोपियों का कहना था कि जितनी
जल्दी हो सके दलित गांव छोड़ दें नहीं तो उन्हें जिंदा जला दिया जाएगा.
दबंगों की इस धमकी से घबराए गांव के करीब डेढ़ सौ दलित बक्स्वाहा के तहसील कार्यालय
के सामने धरने पर बैठ गए. दलितों ने राज्यपाल डॉ बलराम जाखड़ के नाम तहसीलदार को दिए
ज्ञापन में कहा है कि दलित होने के नाते आए दिन उन्हें सवर्ण समाज का अत्याचार झेलना
पड़ता है. हिंदू समाज में रहते हुए अब उनका दम घुटने लगा है. यदि जल्दी ही दबंगों को
गिरफ्तार नहीं किया गया तो पूरे गांव के दलित, हिन्दू धर्म त्यागकर कोई दूसरा धर्म
स्वीकार कर लेंगे.
संघ परिवार को मालूम होना चाहिए (हमारी मान्यता है कि उन्हें मालूम है) कि इस तरह
की अपमानित करने वाली घटनाओं से परेशान होकर ही दलित हिन्दू धर्म त्यागते हैं.
छतरपुर एक ऐसा जिला है जहां संघ परिवार की जबरदस्त मौजूदगी है. स्पष्ट है कि इतना
सब होने के बाद भी संघ परिवार द्वारा इन दलितों की कोई सहायता नहीं की गई और इसलिए
उन्हें तहसील मुख्यालय पर आकर आंदोलन करना पड़ा.
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स्वामी विवेकानन्द ने चेतावनी दी थी कि
''उठो! आगे बढ़ो! और दलितों को गले लगा लो अन्यथा वे तुम्हारी लाशों पर नाचेंगे.'' |
जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है, दलितों ने साफ-साफ कहा है कि यदि उन्हें न्याय नहीं
मिलेगा तो वे सब हिन्दू धर्म त्यागकर कोई अन्य धर्म स्वीकार कर लेंगे. संघ परिवार
अपने आप को हिन्दू धर्म का संरक्षक मानता है और कहता है कि ''गर्व से कहो हम हिन्दू
हैं'' तो उसे उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनके चलते एक दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार
हो जाता है तो उसे घोड़ी से उतारकर नीचे पटक दिया जाता है, दलितों को उस कुएं से पानी
नहीं लेने दिया जाता है जिससे सवर्ण पानी भरते हैं, यदि गांव का कोई नाई किसी दलित
की दाढ़ी बना देता है तो गांव के सारे सवर्ण उसका बहिष्कार कर देते हैं, यदि किसी
दलित को सरकारी जमीन मिल जाती है तो गांव के दादा उसे उस जमीन पर खेती नहीं करने
देते, यदि वह मरे पशुओं की लाश ठिकाने नहीं लगाता तो उसके साथ मार-पीट की जाती है,
दलित बच्चों को स्कूलों में सवर्ण बच्चों से अलग बैठाया जाता है, यदि किसी दलित
महिला ने स्कूल में दोपहर का भोजन पका दिया तो गांव के सवर्ण बच्चे उस भोजन को खाने
से इंकार कर देते हैं. इस तरह कदम-कदम पर दलितों को अपमानित एवं जलील किया जाता है.
स्वामी विवेकानन्द, जिनसे बड़ा हिन्दू कोई हो ही नहीं सकता, और जिनका नाम संघ परिवार
दिन-रात जपता रहता है, ने चेतावनी दी थी कि ''उठो! आगे बढ़ो! और दलितों को गले लगा
लो अन्यथा वे तुम्हारी लाशों पर नाचेंगे.'' क्या हम स्वामी विवेकानंद की इस चेतावनी
की आज तक उपेक्षा नहीं कर रहे हैं?
इसी तरह, देश के एक और महान हिन्दू, महात्मा गांधी ने दलितों को समान अधिकार दिलाने
के लिए हर संभव प्रयास किए. यहां तक कि उन्हें हरिजन अर्थात हरि (ईश्वर) के जन का
ओहदा दिया. अनेक अन्य महान हिन्दुओं, जिनमें डॉ अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले आदि शामिल
हैं, ने भी दलितों के उन्नयन के लिए कार्य किया. जब डॉ अम्बेडकर को अपने प्रयासों
में सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अंतत: हिन्दू धर्म को त्याग दिया. हम सबको यह सोचना
होगा कि कैसे इस तरह के प्रयास किए जाएं जिससे दलितों को कोई अन्य धर्म गले न लगाना
पड़े.
15.01.2009,
04.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित